कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका

वाईएसआर रेड्डी
Image caption कांग्रेस इससे पहले माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट जैसे लोकप्रिय नेता को दुर्घटना में खो चुकी है.

वाईएस राजशेखर रेड्डी की असामयिक मृत्यु कांग्रेस पार्टी के लिए शायद राजीव गांधी की हत्या के बाद सबसे बड़ा झटका है.

राजीव की हत्या और उसके कारण कांग्रेस को हुई क्षति की तुलना तो किसी और के साथ ख़ैर कर ही नहीं सकते. पर हाल के वर्षों में जिन दो अन्य कांग्रेसी नेताओं कि अकस्मात मौत हुई है उनमें माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट का नाम एकदम से मन में कौंधता है.

दोनों ही अत्यंत लोकप्रिय, कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण और राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से काबिल नेता थे. दोनों का ही भविष्य उज्जवल था.

सिंधिया तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की तरह देखे जाते थे और गांधी परिवार के वफादार होने के कारण सोनिया शायद उन्हें वर्ष 2004 में यह उत्तरदायित्व सौंप भी सकती थी. पर यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हमेशा के लिए उस विमान दुर्घटना के मलबे में दब गया जिसमें माधवराव मारे गए थे.

पायलट भी कद्दावर नेता थे. देशभर में लोकप्रिय थे और कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए एक बार उन्होंने अपनी दावेदारी ठोक दी थी.

पर वाईएसआर से उनकी तुलना करना उचित नहीं होगा. वर्ष 2004 और फिर 2009 में लगातार दो बार कांग्रेस के नेतृत्व में अगर यूपीए की सरकार बनी है तो उसका बड़ा श्रेय वाईएसआर को जाता है.

वर्ष 2004 की जीत के लिए 2009 से भी ज्यादा. तब जब सबको लगता था कि वाजपेयी के नेतृत्व में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनेगी, आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की जीत ने दिल्ली में तख़्ता पलट दिया.

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आंध्र प्रदेश की अभूतपूर्व विजय के बिना 2004 में यूपीए सरकार बनना असंभव था और यह कोई विश्लेषण की बात नहीं है. यह एक ऐसा गणित है जिसे कोई भी साफ़ देख सकता है.

वर्ष 2009 में वाईएसआर ने 'रिपीट परफ़ार्मेंस' दी और कांग्रेस को 200 का आंकड़ा पार कराया. ऐसी हालत में जब सबका मानना था कि आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ होने का खामियाज़ा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है.

पर वाईएसआर हमेशा आश्वस्त रहे और कांग्रेस आलाकमान को भी उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह अच्छी संख्या में लोकसभा सीटें जीतेंगे और उन्होंने वही कर दिखाया.

क्षेत्रीय क्षत्रपों में कांग्रेस के पास उनसे बड़ा कोई नाम और चेहरा नहीं था. वाईएसआर को श्रेय जाएगा इस बात का भी कि उन्होंने कांग्रेस में एक बार फिर राज्य स्तरीय नेताओं की प्रासंगिकता और शक्ति को स्थापित किया और अपने कार्यक्षेत्र यानी आंध्र प्रदेश में पार्टी और सरकार में जो चाहा वही किया.

आंध्र प्रदेश के संदर्भ में वह काफ़ी निरंकुश थे और आलाकमान ने भी अपनी दूध देने वाली गाय को पूरी छूट दे रखी थी. अब यह अच्छा था या बुरा यह तो विश्लेषण का विषय है और इस बात पर निर्भर करता है कि आप वाईएसआर के बनाए हुए थे या सताए हुए. पर आंध्र प्रदेश कांग्रेस में होता वही था जो वाईएसआर चाहते थे और वह डिलीवर भी करते थे या नतीजे भी देते थे.

सिर्फ़ आंध्र प्रदेश में ही नहीं समग्र दक्षिण भारत में कांग्रेस को वाईएसआर की कमी अखरेगी क्योंकि वहाँ शायद पार्टी के सबसे मजबूत, लोकप्रिय और कद्दावर चेहरे वही थे.

तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक...कहीं भी पार्टी के पास वाईएसआर के आसपास फटकने वाला नाम नहीं है.

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