'राजनेता अपनों पर ही विश्वास नहीं करते'

जसवंत सिंह
Image caption जसवंत सिंह भाजपा से निकाले जाने के तरीके से नाखुश हैं

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. बीबीसी 'एक मुलाक़ात' में इस बार ख़ास मेहमान हैं जसवंत सिंह.

बचपन से शुरुआत करते हैं. बचपन कहां बीता, स्कूल कहां गए?

राजस्थान में जसौल मेरा गांव है. रेलवे स्टेशन भी कोई 12 मील दूर होगा. वहीं जन्म हुआ और बड़ा हुआ. पिताजी फौज में थे, परिवार बड़ा था इसलिए दादा और नाना के संरक्षण में बड़ा हुआ. प्राथमिक पढ़ाई गांव की पाठशाला में हुई. मुझे याद है कि सर मुंडा के सरस्वती पूजन होता था. हम नंगे पांव पाठशाला जाते थे. बालूराम हमारे मास्टर साहब हुआ करते थे. वो हमें स्लेट पर पढ़ाते थे. गणित के लिए पहाड़े कंठस्थ कराए जाते थे.

कोई ऐसी शैतानी जो आपको याद हो?

क्योंकि पिताजी साथ नहीं थे, इसलिए बहुत शैतानी करते थे. यहाँ से वहाँ कूदना, छलाँग लगाना. कई बार चोट लग जाती थी. आप निशान देख सकते हैं. तब टांके नहीं लगा करते थे. चोट लगने पर राख मल दी जाती थी. उससे घाव तो ठीक हो जाता था, लेकिन निशान रह जाता था.

गांव की पाठशाला से मेयो कॉलेज का सफ़र?

जब तक मैं 10 साल का था तो मुझे अंग्रेज़ी बिल्कुल नहीं आती थी. जब पिताजी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद घर लौटे तो उन्होंने मुझे मेयो कॉलेज भेज दिया. शुरू में मुझे बोर्डिंग स्कूल रास नहीं आया. वहाँ पहली बार अंग्रेजों से मुलाक़ात हुई. वहीं स्वतंत्रता, स्वाधीनता, विभाजन देखने को मिला. हमारे लिए विभाजन का बहुत ज़्यादा मतलब नहीं था. मेरा ननिहाल सिंध में था. दादाजी का सूमचे पश्चिमी राजस्थान में अच्छा रूतबा था.

लेकिन मेयो कॉलेज तो रईसों और बड़े आदमियों का स्कूल माना जाता था?

देखिए मैं राजकुमार नहीं था. आज भी जब लोग मुझे राजा साहब बुलाते हैं तो मैं उन्हें कहता हूँ कि मैं राजा नहीं हूँ. मेरी जेब एकदम खाली है. हाँ दिल का राजा हूँ.

जब फौज में था तो कोई अगर मुझसे 500 रुपये भी माँगता था तो मेरी जेब में पैसे नहीं होते थे पर मैं कैंटीन के बनिए से उधार लेकर लोगों को देता था.

फौज में जाने की कैसी सोची?

फौज में जाने का इरादा शुरू से नहीं था. सीनियर कैंब्रिज के इम्तहान खत्म हो गए थे. मेरी उम्र तब 15 साल की रही होगी. पिताजी ने फौज छोड़ दी थी. ज़मीन बहुत थी, लेकिन हम ज़मीन नहीं बेचते थे.

सीनियर कैंब्रिज के बाद पिताजी ने मुझसे पूछा कि आगे क्या करना है. मैंने कहा कि मैं यूनीवर्सिटी में पढ़ना चाहता हूँ. सीनियर कैंब्रिज में अच्छे नंबर आए थे. हिंदी, अंग्रेज़ी, गणित तीनों में डिस्टिंक्शन.

खैर भाषा पर तो आपकी महारत है?

मैं 10 साल की उम्र तक अंग्रेज़ी का एक लफ़्ज तक नहीं जानता था. मुझे याद है हम एक झोपड़े में रहते थे. बिजली नहीं थी. हम दीये की रोशनी में पढ़ते थे.

जब मैंने पिताजी से कहा कि यूनीवर्सिटी में जाना चाहूँगा तो कुछ देर सोचने के बाद पिताजी ने कहा कि पैसे नहीं हैं. मैंने किसी से कुछ नहीं पूछा. उन दिनों ज्वाइंट सर्विसेज विंग यानी जेएसडब्लू नाम से एक संस्था हुआ करती थी. मैंने उसका फॉर्म भर दिया. बुलावा आ गया. फिजीकल हो गया, इंटरव्यू के बाद सेलेक्ट हो गया. तब मैंने माताजी को ये बात बताई.

आप हमेशा फौज की बात करते हैं. हाल ही में आपने कहा कि न तो मैं आरएसएस का हूँ, न राजनेता हूँ, मूल रूप से मैं सैनिक हूँ?

मैं 15 साल की उम्र में कैडिट हो गया था. चार साल की ट्रेनिंग, उसके बाद कमीशन मिला. क्योंकि मैं फौज में पूरी इच्छा के साथ नहीं गया था. फिर 1962 और 1965 की लड़ाई लड़ी. 1966 में मैंने इस्तीफ़ा दे दिया. मैं पेंशनर नहीं हूँ.

मेरे पिता ने कहा कि क्या तुम्हे पागल कुत्ते ने काट लिया है. उस वक़्त मेरी उम्र 30 साल भी नहीं थी.

तो क्या सोचकर फौज से इस्तीफ़ा दिया था?

मैंने सोच लिया था कि राजनीति में जाऊँगा और लेखन करूँगा. राजनीति इसलिए कि हम दो लड़ाई लड़ चुके थे और बतौर सैनिक मैं चाहता था कि 1962 जैसा अनुभव दोबारा न हो तो अच्छा है. मैं युवा अफसर था, बहुत बोलता था और बात-बात पर गुस्सा आता था.

तब भैरों सिंह शेखावत जनसंघ के नेता थे. वो जोधपुर में डागाजी की हवेली में ठहरे हुए थे. मैं उनके पास गया और कहा कि चुनाव लड़ने के लिए मेरी कुछ आर्थिक सहायता कीजिए. पेंशन नहीं थी, ग्रेच्युटी नहीं थी. उन्होंने कहा कि आप जनसंघ में आ जाइए. मैंने कहा कि मुझे आपकी ये संस्था जंचती नहीं है. उन्होंने कुछ कहा नहीं, बुरा भी नहीं माना, लेकिन आर्थिक मदद भी नहीं की.

उन दिनों स्वतंत्र पार्टी बनी थी. मैं पोलो भी खेलता था. पूर्व राजमाता गायत्री देवी ने मुझसे कहा कि जयपुर में आकर मुझसे मिलो. स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी भी वहीं थे. जब मैं उनसे मिला तो मैंने कहा कि मैं स्वतंत्र पार्टी ज्वाइन नहीं कर सकता. तो निर्दलीय चुनाव लड़ा और जैसा कि तय था चुनाव हार गया.

राजनीति का आपको इतना लंबा अनुभव रहा है. राजनीति की सबसे अच्छी चीज़ क्या लगती है?

आप ऐसे वक़्त में ये सवाल पूछ रहे हैं जब काफ़ी चीजें अच्छी नहीं लग रही हैं. फिर भी मैं बताना चाहूँगा कि अटलजी के साथ काम करने का मौका मिला. जिन सपनों को लेकर फौज छोड़ी थी. वो साकार हुए. अटलजी ने एक के बाद एक काम दिए. इंफ्रास्ट्रक्चर, टेलीकॉम पालिसी बनाने का काम दिया.

पहला एनडीए जब बना तो अटलजी ने मुझसे कहा कि मैं संयोजक बनूँगा. तो मैंने कहा कि प्रधानमंत्री भी और संयोजक भी भाजपा का हो, ये ठीक नहीं है. इसलिए जॉर्ज फर्नांडीस को संयोजक बनाया जाना चाहिए.

Image caption जसवंत सिंह का कहना है कि फौज में रहने के बाद कुछ अलग आदतें पड़ जाती हैं

और राजनीति में सबसे खराब क्या लगता है?

फौज में रहने के बाद कुछ अलग आदतें पड़ जाती हैं. सिपाही मरने को क्यों तैयार होता है, क्योंकि उसे अपने अफसर पर भरोसा है. और अफसर भी अपने सिपाहियों के लिए जान देने के लिए तैयार रहता है. मैंने तो संसद में भी कहा कि अगर मेरे मंत्रालय में कुछ गड़बड़ी होती है, तो उसकी ज़िम्मेदारी मेरी है. और जो भी अच्छी बातें हैं उनका श्रेय अफसरों को दिया जाना चाहिए.

इतने साल राजनीति में रहने के बाद आप इस बिरादरी को लेकर क्या सोचते हैं?

हमें इस मसले पर बहुत गंभीरता से सोचना चाहिए कि राजनेता और राजनीतिक पार्टियां कहाँ पहुँच गई हैं. विचार और व्यवहार में भय आ गया है. राजनेता अपने ही दल के लोगों पर विश्वास नहीं करते.

तो क्या सफल राजनेता बनने के लिए खराब आदमी बनना ज़रूरी है?

आप ही बताएँ. अपराधियों को निकालकर आप चुनाव लड़ा रहे हैं तो क्या होगा. वोट और वैल्यू को एक ही तराजू में रखेंगे और हर बार वोट भारी रखेंगे तो फिर चाहे वैल्यू के पलड़े पर आप कितने ही बाट रख लें, कुछ नहीं होगा. जब तक वोट ही सब कुछ रहेगा, हम कुछ हासिल नहीं कर सकेंगे.

आज़ादी के बाद भारत ने लंबा रास्ता तय किया है. उसके बाद भी ये सब कुछ ?

ये हमारी विलक्षण प्रतिभा है, लोगों में गजब की योग्यता है. आर्थिक प्रगति हो रही है. जब अटलजी ने मुझे वित्त मंत्री बनाने की बात कही तो मैंने कहा कि मुझे कहाँ ये ज़िम्मेदारी दे रहे हैं. हमने कभी बही खाते भी नहीं रखे. यहाँ तो ये भी कहावत है कि राजपूत सुबह रुपया लेकर जाए और पावली लेकर लौटे तो वो भी बहुत है.

मैं वित्त मंत्री रह चुका हूँ तो कह सकता हूँ कि देश इसलिए आर्थिक प्रगति कर रहा है क्योंकि यहाँ के उद्यमी और लोग बहुत मेहनती और प्रतिभाशाली हैं.

गोल्फ और पोलो में आपकी दिलचस्पी कैसे हुई?

देखिए मैं गांव में बड़ा हुआ. हमारे परिवार ने कोई 650-750 साल पहले एक मेला शुरू किया था. जसौल से तिलवाड़ा. तिलवाड़ा मेला घोड़ों के लिए मशहूर था. वहाँ गायें नहीं बिका करती थी. तो घोड़ों और ऊँटों पर तो बचपन से ही बैठता रहा हूँ. मैंने तो हल भी चलाया है. तो पोलो तो अपने आप आ गया. रही बात गोल्फ की तो जब फौज में था तो वहाँ गोल्फ बहुत लोकप्रिय था. तब इसे आजमाया. मैं शतरंज भी खूब खेला करता था.

पढ़ने-लिखने का मुझे बहुत शौक है. ये मेरे रहन-सहन का एक अभिन्न अंग बन गया है. मैं अंग्रेज़ी नहीं जानता था. तो एक जिद्द थी, होड़ थी कि अच्छी अंग्रेज़ी बोलनी सीखनी है. ऐसी कि अंग्रेज से अच्छी हो. लिखूँ तो भी बेहतरीन हो. ये अहंकार नहीं था. इसे गलत अर्थों में नहीं लीजिएगा, लेकिन मैं जो कुछ भी हूँ अपने दम पर हूँ. मैंने जो कुछ पाया है, अपने बल बूते हासिल किया है.

लोग कहते हैं कि वाजपेयी जी आपके जिन गुणों पर आसक्त थे, उनमें से आपका भाषा ज्ञान भी था?

अटलजी के स्वभाव में कोई रश्क नहीं है. वो बहुत कृपालू रहे. हमने साथ-साथ बहुत काम किया. असम आंदोलन, त्रिपुरा, लाहौर बस में साथ-साथ गए थे.

तो अटलजी आपके पसंदीदा राजनेता हैं?

बिना किसी संदेह के. अटलजी ही मेरे पसंदीदा राजनेता हैं. ऋग्वेद का एक श्लोक है. मनस्तु महतस्तुते..... उनका मन सदैव से विशाल रहा है. उनकी बुद्धि बहुत पैनी थी. मन में संकीर्णता नहीं थी.

धर्मेत धियंता बुद्धि मनस्तु महतस्तुते.. धर्म में बुद्धि यानी विवेक को दृढ़ रखो. मन को विशाल रखना चाहिए. तो धर्म की परिभाषा ही भिन्न है.

आपके राजनीतिक जीवन में परिस्थितियां अब विपरीत हैं, चुनौतीपूर्ण हैं. तो इन हालात में आप इस तरह के श्लोकों को किस तरह आत्मसात कर पाते हैं?

दुख है मुझे कि 30 साल से जिस पार्टी में रहा. पार्टी ने कहा निष्कासित.. इतना बड़ा शब्द..उनका मुंह तो नहीं भर गया.

आपको कमज़ोरी तो महसूस नहीं होती?

मुझे तो कोई कमज़ोरी महसूस नहीं होती. रही बात पार्टी की तो आप उससे पूछ सकते हैं. सूरदास के दो पद बहुत अच्छे हैं. ‘हारिए न हिम्मत बिसारिए न हरिराम, तेहि विधि रहिए, जेहि विधि राखे राम.’ तो किस बात के लिए मुझे कमज़ोरी महसूस होनी चाहिए.

ऐसा कहा जाता है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक महिला होती है. आपका प्रेरणास्रोत कौन रहा?

मेरी सहचारिणी को विक्टोरिया क्रॉस मिलना चाहिए. मुझे सहने के लिए.

ऐसा क्या-क्या किया आपने जो उन्हें विक्टोरिया क्रॉस मिलना चाहिए?

कैसी-कैसी परीक्षाएँ दी हैं उन्होंने. सोचिए, मेरी कोई कमाई नहीं थी. कोई 2,700 रुपये का बैंक बैलेंस था. चुनाव लड़ा और हार गया.

मेरे छोटे बेटे को ग्लैंडुलर टीबी हो गया था. मैं अपने पिताजी से कोई सहायता नहीं लेना चाहता था. न ही काश्त के लिए ज़मीन ली थी. गाय रखी थी. जहाँ रहता था उससे 12 किलोमीटर दूर दूध लेकर जाता था. मेरे पास इलाज के पैसे नहीं थे. डॉक्टर की फीस 10 रुपये थी. डॉक्टर ने कहा कि बेटे को दूध, अंडा, डबलरोटी खिलाइए.

उन्हीं दिनों सेना के मेरे मित्र जोधपुर में तैनात थे, जो बाद में जनरल बनकर रिटायर हुए. उन्होंने मुझे 263 रुपये का चेक दिया. वो उधार मैं ज़िंदगी भर नहीं चुका सका.

आपको फ़िल्में देखने का शौक है?

बहुत नहीं है. कभी-कभार फ़िल्में देख लेता हूँ. दरअसल फ़िल्में देखने का मौक़ा ही नहीं मिलता. स्कूल के दिनों में मुग़ले आज़म देखी थी. एक फ़िल्म मुझे याद आती है महल. फिर जब नरगिस संसद में आईं तो हमारे साथ बैठती थी. जब उनका निधन हुआ तो मुझे बहुत दुख हुआ.

आपकी पसंदीदा अभिनेत्री कौन थी?

मीना कुमारी और नरगिस.

अगर आपको ज़िंदगी में एक चीज़ हटाने का मौका मिले तो क्या करेंगे?

ये सवाल बहुत कठिन है और ईमानदारी से देना चाहिए. लेकिन समूचे जीवन को निचोड़कर एक जवाब देना मुश्किल है. मैं इसका सही जवाब नहीं दे सकूँगा.

घूमने-फिरने का शौक है आपको?

हाँ बहुत. मुझे पहाड़ बहुत पसंद हैं. लेकिन अब शरीर इतना साथ नहीं देता, इसलिए जाना कम हो पाता है.

बालताल से बाईं तरफ़ की ऊंचाई पर झील. पहलगाम का इलाक़ा भी मुझे बहुत पसंद है.

खाने का शौक है आपको?

दरअसल, खाने को लेकर मैं हमेशा उदासीन रहा. पत्नी की हमेशा यही शिकायत रही कि कभी तो अपनी पसंद का खाना बता दिया करो.

पसंदीदा डिश क्या है?

दाल-रोटी. बाजरे की रोटी आज भी खाता हूँ. गेहूँ, चावल से कहीँ ज़्यादा पौष्टिक होता है बाजरा.

आज के युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?

अपनी आकांक्षाओं को कभी कम मत करो. जवान हो तो क्षितिज को पकड़ो और इंद्रधनुष के दोनों सिरों को पकड़ने का माद्दा रखो. अपनी वैचारिक आज़ादी को कभी मत छोड़ो. जिस दिन विचार नौजवानों का गुलाम हो जाएगा, उस दिन भारत फिर उन्हीं तंग गलियों में चला जाएगा, जहाँ हम अंग्रेज़ों के गुलाम थे.

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