इशरत को फ़र्जी मुठभेड़ में मारा गया

गुजरात सरकार को एक तगड़ा झटका देते हुए अहमदाबाद की एक मेट्रोपोलिटन अदालत ने कहा है कि वर्ष 2004 में इशरत जहाँ और तीन अन्य लोगों की फ़र्जी मुठभेड़ में हत्या की गई थी.

Image caption इशरत जहाँ को आतंकवादी बताया गया था

गुजरात पुलिस की अपराध शाखा ने 15 जून 2004 को अमजद, ज़ीशान, जावेद और इशरत जहाँ को मार दिया था. गुजरात पुलिस का दावा था कि ये चारों आतंकवादी थे और पुलिस ने इन्हें मुठभेड़ में मार दिया है.

लेकिन अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि ये फ़र्जी मुठभेड़ थी. ये लोग आतंकवादी नहीं थे. इशरत जहाँ तो मुंबई के एक कॉलेज में पढ़ती थी.

अहमदाबाद से वरिष्ठ पत्रकार अजय उमठ ने बताया है कि अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि इशरत और जावेद को गुजरात पुलिस की क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने मुंबई से अगवा किया और 12 जून 2004 को अहमदाबाद लेकर आए.

अदालत के मुताबिक़ 14 जून की रात को इन्हें मार दिया गया और 15 जून की सुबह पुलिस ने इसे मुठभेड़ का रूप दे दिया.

दावा

पुलिस ने उस समय दावा किया था कि उन्हें ख़ुफ़िया सूचना थी कि लश्कर-ए-तैयबा का आत्मघाती दस्ता मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से शहर में पहुँचा है.

पुलिस ने दावा किया था कि ये आतंकवादी शहर में घुस रहे थे तभी पुलिस ने इन्हें घेर लिया और फिर गोलीबारी शुरू हो गई और चार आतंकवादी मारे गए.

पुलिस ने यह भी दावा किया था कि इनमें से दो चरमपंथी पाकिस्तानी नागरिक थे. पुलिस की टीम का नेतृत्व डीजी वनज़ारा कर रहे थे. इस समय वे सोहराबुद्दीन फ़र्जी मुठभेड़ मामले में पुलिस हिरासत में हैं.

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि गुजरात पुलिस ने ये हत्या की है. अदालत ने अपनी कड़ी टिप्पणी में कहा कि इस हत्या में शामिल गुजरात पुलिस के अधिकारियों ने निजी लाभ के लिए ऐसा किया है.

ये पुलिस अधिकारी मोदी सरकार से प्रोमोशन और जनता से शाबाशी चाहते थे. वे आतंकवादियों को ये संदेश देना चाहते थे कि गुजरात में जो भी कुछ करने आएगा, उसका अंजाम ऐसा होगा.

अदालत ने कहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की वाहवाही लेने के लिए कुछ पुलिस अधिकारियों ने यह आपराधिक काम किया है.

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