मुसलमान और दत्तक संतान

शबनम और उनकी बेटी
Image caption शबनम हाशमी अपनी बेटी सहर हाशमी को क़ानूनी तौर पर गोद लेने की जद्दोजहद कर रही हैं.

दिल्ली की एक अदालत के इस फ़ैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं कि देश का प्रत्येक नागरिक चाहे उसके पर्सनल लॉ के प्रावधान कुछ भी हों, बच्चे को गोद ले सकता है.

कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस निर्णय का स्वागत किया है तो मुस्लिम उलेमा ने इस फ़ैसले की आलोचना की है और इसे ग़ैर-इस्लामी क़रार दिया है.

ग़ौरतलब है कि भारत में इस्लाम, ईसाई और पारसी जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ में गोद लेने का प्रावधान नहीं है.

कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना निज़ामुद्दीन का कहना है,"किसी दूसरे के बच्चे को गोद लेने से वे किसी की वास्तविक औलाद बन जाए, ये मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और क़ुदरती तौर पर सही नहीं है. इसीलिए इस्लाम में गोद लेने की मनाही है."

उनका कहना है कि इस्लाम में किसी दूसरे के बच्चे की किफ़ालत (परवरिश) की इजाज़त है, लेकिन वह औलाद की तरह क़ानूनी रूप से जायदाद का वारिस नहीं हो सकता है.

निज़ामुद्दीन ज़ोर देकर कहते हैं कि इस्लाम अनाथ बच्चों की देखभाल और परवरिश को प्रोत्साहित करता है.

मूलभूत अधिकार

पिछले हफ़्ते दिल्ली की एक अदालत ने एक मुस्लिम दंपती को एक दो वर्षीय बच्ची को गोद लेने की इजाज़त देते हुए कहा था, "भारतीय संविधान और बाल न्याय अधिनियम 2000 के तहत प्रत्येक नागरिक का मूलभूत अधिकार है कि वे किसी भारतीय बच्चे को गोद ले सकते हैं और इस मामले में पर्सनल लॉ आड़े नहीं आ सकता."

अदालत ने दंपती को ये भी निर्देश दिया कि गोद लेने के लिए वो ऐसा क़रार बनाए जिसमें गोद लिए गए बच्चे को वो ही अधिकार मिले जो उस औलाद को मिल सकते हैं जिसे उन्होंने जन्म दिया हो.

पिछले तेरह साल से गोद लेने की क़ानूनी लडा़ई लड़ रहीं सामजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी के अनुसार अदालत का फ़ैसला स्वागतयोग्य है.

वे कहती हैं, "ये बहुत अच्छा और प्रगतिशील फ़ैसला है, इससे उन लाखों माता-पिता को राहत मिलेगी जो बच्चे गोद लेना चाहते हैं, साथ ही उन लाखों बच्चों को घर मिलेगा जिन्हें छत और प्यार की आवश्यकता है."

शबनम ज़ोर देकर कहती है, "हमें एक भारतीय होने के नाते गोद लेने का अधिकार होना चाहिए और इसमें धर्म आड़े नहीं आना चाहिए."

शबनम ने बताया कि इस मामले में उन्होंने एक मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर रखा है और सुनवाई जारी है. लेकिन इस बीच एक अलग मुक़दमे में एक निचली अदालत का फ़ैसले गोद लेने के हक़ में आने से उनकी उम्मीदें बढ़ गई हैं.

उम्मीद

वो कहती हैं, "हमारी लड़ाई 13 वर्षों से जारी है और हमें आशा है कि फ़ैसला हमारे हक़ में आएगा."

उधर ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के महासचिव जॉन दयाल ने भी कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया है.

उनका कहना है, "ईसाई बच्चे को गोद लेने चाहते हैं और जो क़ानूनी रुकावटें हैं उसे दूर चाहिए. आज का ईसाई क़ानून में बदलाव का इच्छुक है. ये क़ानूनी रुकावट ग़ैर-ज़रूरी है, जो ढेड़ सौ साल पुराना है."

मामले की पेचीदगियों पर से पर्दा उठाते हुए जाने-माने क़ानूनी जानकार ताहिर महमूद का कहना है, "सच यह है कि सीधे तौर पर भारत में गोद के मामले में कोई क़ानून नहीं है, जिसकी वजह से मुसलमान, ईसाई और पारसी का पर्सनल लॉ इसमें आड़े आ जाता है."

ताहिर महमूद कहते हैं कि तुर्की और ट्यूनिशिया में गोद लेने की इजाज़त है, जबकि कुछ अन्य मुस्लिम देशों में भी गोद लेने में ढील दी गई है.

हालाँकि उनका कहना है कि भारत में मुसलमान बच्चे को क़ानूनी रुप से गोद तो नहीं ले सकते लेकिन कोई भी माता-पिता बिना किसी रुकावट के अपनी जायदाद का जितना भी हिस्सा चाहे परवरिश कर रहे बच्चे को हिबा (उपहार) के रुप में दे सकते हैं.

ताहिर महमूद का कहना है कि भारत में उलेमा किसी मुद्दे को जिस कठोरता के साथ उठाते हैं वास्तव में मामला उतना गंभीर नहीं होता और गोद लेने का मामला भी उस से अलग नहीं है.

महरम का सवाल

जब मैंने मौलाना निज़ामुद्दीन से उनके विरोध का कारण पूछा तो उनका कहना था, "मामला सिर्फ़ पालन-पोषण और विरासत में हिस्सेदारी का नहीं है बल्कि वास्तविक औलाद मानने से महरम का सवाल खड़ा हो जाता है और इस्लाम में गोद ली जानी वाली औलाद महरम नहीं हो सकती. (इस्लाम में महरम उसे कहते हैं जिससे शादी नहीं हो सकती)."

मौलाना निज़ामुद्दीन का कहना है कि वे फ़ैसले का अध्ययन कर रहे हैं और उसके बाद ही आगे की रणनीति तय की जा सकेगी.

निचली अदालत के फ़ैसले से गोद लेने वालों के हौसले बुलंद हैं और उनके चेहरे पर मुस्कान है. उनकी आशा भरी नज़रें सुप्रीम कोर्ट पर है. लेकिन दूसरी तरफ़ फ़ैसले के विरोधी भी अपनी रणनीति तय करने में लगे हैं. सवाल यही है कि फ़ैसला किसके हक़ में आता है, सूनी गोद वाले माता-पिता या पर्सनल लॉ के तरफ़दारों के हक़ में.

अब बस सबको इंतज़ार है.

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