हिंदी में सुनवाई हो, मी लॉर्ड

सुप्रीम कोर्ट
Image caption अब तक अदालतों में अंग्रेज़ी का ही प्रयोग होता है.

दिल्ली उच्च न्यायालय के वकीलों का कहना है कि उन्हें अपना मुक़दमा हिंदी में लड़ने की इजाज़त मिलनी चाहिए. अभी सिर्फ अंग्रेज़ी में अदालती कार्रवाई होती है.

वकीलों का कहना है कि ये ब्रितानी राज में शुरू की गई ऐसी परंपरा है जिसको तुरंत ख़त्म कर देना चाहिए.

वकीलों का एक समूह दिल्ली में अपनी इस मांग के समर्थन में लगभग तीन हज़ार हस्ताक्षर जुटा चुका है और इस बारे में सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को एक ज्ञापन देकर इस सुझाव पर तुरंत अमल करने का अनुरोध किया है.

इन वकीलों का कहना है कि उड़ीसा, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के वकीलों की अंग्रेज़ी उतनी दुरुस्त नहीं है. सिर्फ वकील ही नहीं, ज़्यादातर मुवक्किल भी हिंदी ही समझते हैं.

दिल्ली अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल का दावा है कि हिंदी में बोलने की इजाज़त देने से लगभग अस्सी प्रतिशत वकीलों और मुवक्किलों को फ़ायदा होगा.

‘अभी सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा में कार्रवाई का प्रावधान है तो न्यायाधीश उसका बहुत सख़्ती से अनुसरण करते हैं. दरअसल इसके पीछे एक वर्ग प्रधान मानसिकता है क्योंकि अंग्रेज़ी तो आम लोगों की भाषा है नहीं. ये तो अंग्रेज़ शासकों की भाषा थी और हमारा न्यायिक ढांचा अभी भी उसी परंपरा पर चल रहा है.’

लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि अंग्रेज़ी एक महत्वपूर्ण भाषा है जो ग़ैर- हिंदी भाषी लोगों को जोड़ती है, इसलिए इसको चलाए रखना लाज़मी है.

इसके अलावा अदालती फै़सलों का अंग्रेज़ी में लिखा जाना ज़रूरी है क्योंकि उनका असर देश भर के मुक़दमों पर पड़ता है.

हिंदी की मांग कर रहे वकील कहते हैं कि वे अंग्रेज़ी के ख़िलाफ़ नहीं हैं बस ये चाहते हैं कि हिंदी के उपयोग की इजाज़त मिल जाए.

हाल के सालों में वकीलों ने कई ऐसे मामले उठाए हैं जिसके लिए वे ब्रिटश राज को ज़िम्मेदार मानते हैं. जैसे भारत जैसे गर्म देश में काले कोट और गाउन पहनने की परंपरा या फिर न्यायाधीश को मुक़दमे के दौरान माई लॉर्ड कह कर संबोधित करना.

इन वकीलों का कहना है कि समय आ गया है कि व्यावहारिक क़ानून बनाए जाएं.

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