जनगणना में जाति जानकारी की माँग

जाति प्रदर्शन
Image caption जनगणना में जाति की जानकारी की मांग तेज़ होने लगी है.

भारत के क़ानून मंत्री वीरप्पा मोईली ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिख कर सुझाव दिया है कि 2011 में होने वाली जनगणना में लोगों की जाति संबंधी जानकारी को भी शामिल किया जाए.

कुछ रिपोर्टों के अनुसार यह मांग एक आधिकारिक रिपोर्ट में यह पाए जाने के बाद की गई है कि अन्य पिछड़ा वर्ग का जनसंख्या में प्रतिशत लगभग 38 प्रतिशत तक है.

जनगणना में जाति संबंधी जानकारी को यह कहते हुए हटा दिया गया था कि यह ब्रिटिश राज के दौरान की साम्राज्यवादी सोच से प्रेरित है और इससे समाज में विभाजन जैसी सोच पनपती है.

वीरप्पा मोईल ने इसके ख़िलाफ़ अपनी दलील में कहा है कि अगर हर जाति और ख़ासतौर पर पिछड़ी जाति के लोगों के बारे में जनगणना में विस्तृत जानकारी से इन तबकों की तरक्की के लिए सरकार की आरक्षण और दूसरी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने में मदद मिलेगी.

एक रिपोर्ट के अनुसार वीरप्पा मोईली ने कहा है कि जब वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समुदाय के बारे में जो सर्वेक्षण करवाया था उससे सरकार के कल्याण कार्यक्रमों को लागू करने और ज़रूरतमंदों को मदद पहुंचाने में मदद मिली थी.

राजनीति से प्रेरित

कुछ प्रेक्षक क़ानून मंत्री के इस प्रस्ताव को राजनीति से जोड़ कर भी देख रहे हैं और वो हरियाणा और महाराष्ट्र के आगामी चुनावों की ओर इशारा करते हैं. जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष और आरक्षण के प्रबल समर्थक शरद यादव का कहना है कि यह मांग कोई नई नहीं है और वीरप्पा मोईली ने अभी केवल सुझाव ही दिया है फ़ैसला नहीं किया है क्योंकि इस पर फ़ैसला गृह मंत्रालय को करना है. उनका कहना था भारत में अगर जाति व्यवस्था का निर्मूलन नहीं हुआ है तो इस सच्चाई को मानने में हर्ज़ क्या है.

मगर जाति प्रथा पर शोध करने वाले समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर दीपांकर गुप्ता का मानना है कि यह देश को जाति प्रथा से मुक्त कराने के अभियान के पूरी तरह विपरीत है.

प्रोफ़ेसर दीपांकर गुप्ता ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "जनगणना देश की सामाजिक और आर्थिक नीतियों के अनुसार होती है. पहले सिर्फ़ अनुसूचित जाति और जनजातियों के लोगों की जाति संबंधी जानकारी जुटाई जाती थी ताकि इनकी ग़रीबी को ख़त्म किया जा सके लेकिन अब हालात बदल गए हैं. अब राजनीतिक दलों की नीतियां अधिकाधिक जातिगत होती जा रही हैं और जाति की पहचान को अधिकाधिक रुप से मज़बूत किया जा रहा है."

जहाँ तक यह दलील है कि जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग की संख्या की जानकारी आने से उनकी सही संख्या निर्धारित की जा सकेगी, प्रोफ़ेसर दीपांकर गुप्ता सहमत नहीं है.

उनका कहना है, "अन्य पिछड़ा वर्ग दरअसल एक काल्पनिक वर्ग है. अगर इसके लिए कुछ करना हो तो ग़रीबी को मानदंड बनाना चाहिए. लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग में कई ऐसी जातियां शामिल हैं जो पारंपरिक तौर पर राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व रखती थीं."

"पिछले डेढ सौ सालों को देखा जाए तो इस वर्ग में नई जातियाँ शामिल होती गई हैं जिनके पास राजनीतिक प्रभाव था. मिसाल के तौर पर गुजरात के बनिए एक ज़माने में अपने आपको क्षत्रिय कहते थे और 1930 के बाद उन्होंने अपने आपको अलग जाति घोषित कर दिया."

सरकार की मौजूदा आरक्षण नीति में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है. पिछले साल राजस्थान के गूज्जर समुदाय के नेताओं ने अपने को अन्य पिछड़ा वर्ग से हटा कर अनसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग की थी और अनुसूचित जनजाति के मीणा समुदाय ने इसका जमकर विरोध किया था. अब लोग यह भी जानना चाहेंगे कि जनगणना में जाति संबंधी जानकारी को क्या आरक्षण के प्रतिशत को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा.