मीडिया का हिस्टीरिया

चीन की सेना
Image caption भारत-चीन सीमा पर तैनात सैनिकों के बीच किसी तरह का तनाव नहीं है

भारत-चीन संबंधों में एक अजीबोग़रीब दौर देखने में आ रहा है.

अगर आप किसी आक्रामक टेलीविज़न चैनेल को देखें या भारत-चीन संबंधों पर विशेषज्ञ माने जाने वाले लोगों के विचार पढ़ें तो ऐसा महसूस होगा जैसे दोनों देश एक दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं.

इन चैनेलों या विशेषज्ञों को भारतीय विदेश मंत्रालय, सीमा सुरक्षा बल और यहाँ तक कि वायुसेना के भी इन बयानों से कोई मतलब नहीं है कि न तो कोई संघर्ष हो रहा है और न ही भारतीय वायु सीमा के उल्लंघन की बात में कोई दम है.

विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को कहा, वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार से गोलीबारी में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के दो जवानों के घायल होने की ख़बर हमारे ध्यान में आई है. यह यथार्थ से एकदम परे है.

उधर, इसी घटना के बारे में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना है, "मैंने इस तरह की घटना के बारे में कुछ नहीं सुना. हाँ, मैंने यह ज़रूर देखा कि भारतीय मीडिया हाल ही में कुछ बेबुनियाद सूचनाएँ जारी कर रहा है. मुझे समझ में नही आ रहा है कि उनका इरादा क्या है".

लेकिन इस सब से भारतीय मीडिया का वह एक बड़ा हिस्सा क़तई प्रभावित नहीं है जो इस समय ज़बरदस्त चीन विरोधी मूड में नज़र आ रहा है. चीन से जुड़ी ऐसी कहानियाँ लगातार जारी है.

अपना नाम न देने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "दोनों देशों के बीच ज़मीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला है. मुझे इस उन्माद, इस हिस्टीरिया की वजह समझ में नहीं आ रही है".

चीन व्यापार के क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा पार्टनर है. वर्ष 2008 में दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात की राशि पचास अरब डॉलर को पार कर गई.

दोनों देश अपने दशकों पुराने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए हल ढूँढ रहे हैं और निकट भविष्य ही में इस प्रक्रिया के सकारात्मक परिणाम भी नज़र आने लगे हैं.

अब भी नहीं भूले

वर्ष 1967 के बाद से अपरिभाषित भारत-चीन सीमा के आसपास किसी के हताहत होने की एक भी घटना नहीं हुई है. लेकिन 1962 के युद्ध में चीन के हाथों हुई हार को कई भारतीय अब भी भुला नहीं पाए हैं.

एक तरह से देखा जाए तो 1962 का भूत अब भी कुछ मुट्ठी भर लेकिन प्रभावशाली रिटायर्ड जनरलों और राजनयिकों के मानस पर हावी है जो चीन को मज़ा चखाने की अभिलाषा रखते हैं.

पिछले दो दशकों में-यानी 1988 में राजीव गांधी की ऐतिहासिक बीजिंग यात्रा के बाद से-दोनों देशों के बीच अपने मतभेदों को दूर करने के प्रयास जारी हैं जो नज़र भी आ रहे हैं.

एक इस प्रकार की संहिता भी तय की गई थी कि दोनों देशों के गश्ती दलों का आमना-सामना हो जाए तो उन्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए. ऐसा हो भी रहा है और पिछले वर्षों में सब कुछ ठीकठाक चल रहा है.

लेकिन अब, भारत-चीन के स्थिर संबंधों को फिर ख़तरा पैदा हो रहा है-और वह सरकारों की ओर से नहीं बल्कि मीडिया के कुछ वर्गों को ओर से. अगर बड़े पैमाने पर निजी मीडिया (कृपया ध्यान रखें सरकारी नहीं)चीन को लेकर एक युद्धोन्माद की स्थिति से गुज़र रहा है तो अब चीन की ओर से भी इसकी प्रतिक्रिया होने लगी है.

चीन के सरकारी पत्र ग्लोबल टाइम्स के जून में छपे एक लेख में कहा गया, "भारत अपने निरंतर विकास की हेकड़ी दिखाता है लेकिन इस बात से चिंतित है कि चीन ने उसे पीछे छोड़ दिया है. भारत में चीन को एक ऐसे संभावित ख़तरे और प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा जाता है जिसे पछाड़ना ही है".

कुल मिला कर, यदि ग्लोबल टाइम्स के लेख को एक संकेत को तौर पर देखा जाए तो, कुछ भारतीय टेलीविज़न चैनेलों और अख़बारों के शुरू किए इस मीडिया युद्ध में अब चीनी मीडिया भी शामिल हो गया है.

राष्ट्रीय दैनिकों के संपादकों को जानकारी देते हुए एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने सुझाव दिया कि प्रेस को इस तरह का हिस्टीरिया दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं है.

लेकिन, लगता नहीं कि मीडिया से जुड़े कुछ लोग इस तरह के सुझावों पर अमल करने के मूड में हैं.

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