माओवादियों की सेना से अपील

नक्सली
Image caption माओवादियों ने वायु सेना की मांग पर ऐतराज़ किया

आत्मरक्षा में नक्सलियों पर हमला करने के लिए रक्षा मंत्रालय से भारतीय वायु सेना के अनुमति मांगने पर माओवादियों ने कड़ी टिप्पणी की है.

बीबीसी के साथ बातचीत में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य कोटेश्वर राव यानी किशनजी ने वायु सेना के जवानों से आग्रह किया है कि वे ऐसा क़दम उठाने से पहले तीन बार सोचें.

नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में वायु सेना के प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल पीवी नायक ने बताया कि वायु सेना ने रक्षा मंत्रालय से इस बात के लिए अनुमति मांगी है कि नक्सल प्रभावित इलाक़ों में काम कर रहे वायु सेना के जवानों पर अगर हमला होता है तो वे भी जवाबी कार्रवाई कर सकें.

हालाँकि रक्षा मंत्री एके एंटनी का कहना है कि अभी इस पर कोई फ़ैसला नहीं किया गया है.

सीपीएम (माओवादी) ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि जो हो रहा है वो ग़लत है. पोलित ब्यूरो के सदस्य किशनजी ने कहा, "हम न तो बाहर के आक्रमणकारी हैं और न ही आतंकवादी हैं. हम किसी साम्राज्यवादी देश के एजेंट भी नहीं हैं."

किशनजी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि सीपीएम (माओवादी) ग्रामीण इलाक़ों की ग़रीब जनता के लिए लड़ती है. उनकी लड़ाई उन करोड़पति, अरबपति राजनेताओं के ख़िलाफ़ है, जो विश्व बैंक और साम्राज्यवादी नीतियों पर चल रहे हैं.

दावा

उन्होंने कहा कि वायु सेना का हमला उन पर नहीं बल्कि ग्रामीण जनता पर होगा. उन्होंने दावा किया कि इस तरह की कार्रवाई से उन्हें हराया नहीं जा सकता.

Image caption पीवी नायक ने वायु सेना के फ़ैसले की जानकारी दी

किशनजी ने कहा, "मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि गत वर्ष अक्तूबर में छत्तीसगढ़ में चुनाव के समय वायु सेना के 13 हेलिकॉप्टर भिजवाए गए थे. तो हमने एक हेलिकॉप्टर मार गिराया. जिसमें एक पायलट की मौत भी हो गई."

एयर चीफ़ मार्शल पीवी नायक ने भी पत्रकारों से बातचीत में छत्तीसगढ़ की इस घटना का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जब तक सरकार नक्सलियों को देश का दुश्मन घोषित नहीं करती, वायु सेना उन पर हमला नहीं कर सकती. क्योंकि ऐसा कोई भी हमला अपने ही नागरिकों पर हमला माना जाएगा.

सीपीएम माओवादी ने तीन अक्तूबर को देशव्यापी बंद का आह्वान किया है. जिन मांगों पर देशव्यापी बंद का आह्वान किया गया है, उनमें माओवादियों के ख़िलाफ़ वायु सेना और थल सेना के इस्तेमाल के बारे में न सोचने की मांग भी शामिल है.

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