संकल्प लिया पर अमल नहीं किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों ने जनमत के दबाव में अपनी संपत्ति घोषित करने का सामूहिक संकल्प तो ले लिया है लेकन अभी उसको सार्वजनिक करने पर हिचक बरकरार है.

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल दिनेश गुप्ता ने फोन पर बताया कि बारह सितंबर को इलाहाबाद में फुल कोर्ट मीटिंग हुई थी जिसमे लखनऊ बेंच के भी कुछ जज आए थे. बैठक में जजों के अलावा कोई शामिल नही था.

बैठक में यह संकल्पित किया गया कि जज अपनी संपत्ति घोषित करेंगे.

हालांकि प्रस्ताव को औपचारिक रूप से सार्वजनिक नही किया गया, इसे पारित हुए लगभग तीन सप्ताह हो रहे हैं पर अब तक हाईकोर्ट की वेब साइट पर किसी जज की संपत्ति का विवरण प्रकाशित भी नहीं हुआ.

इन सबसे यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पहले की तरह सील बंद लिफ़ाफ़े में अपनी संपत्ति का ब्योरा चीफ जस्टिस को देंगे और वह उनके कार्यालय में ही रहेगा.

मैंने इस संबंध में चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति चन्द्र मौलि कुमार प्रसाद से बात की तो उनका कहना था कि प्रस्ताव में कोई नकारात्मक बात नहीं कही गई है.

इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि जज आगे हवा का रुख़ देख कर संपत्ति सार्वजनिक करने पर तैयार भी हो सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने 1998 में एक प्रस्ताव के ज़रिए अपनी संपत्ति की घोषणा का निर्णय किया था. लेकिन इस प्रस्ताव के तहत संपत्ति का विवरण चीफ जस्टिस को दिया जाता था.

जजों में मतभेद

हाल ही में संसद द्वारा सूचना का अधिकार कानून पारित होने के बाद केंद्रीय सूचना आयोग ने जजों की संपत्ति का विवरण देने को कहा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने मना कर दिया. मगर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि विवरण सार्वजनिक करना होगा क्योंकि चीफ़ जस्टिस का दफ्तर सूचना कानून के दायरे में आता है.

कर्नाटक हाईकोर्ट के एक जज शैलेंद्र कुमार ने भी खुले आम संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा का समर्थन किया और चीफ जस्टिस से असहमति प्रकट की. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जज के कानन ने अपनी संपत्ति इंटरनेट पर घोषित भी कर दी.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट,दिल्ली, पंजाब, हरियाणा,बॉम्बे और मद्रास हाईकोर्ट के जजों ने भी संपत्ति घोषित करने का सामूहिक फैसला किया.केरल देश का अकेला राज्य है जहां सभी जजों ने अपनी संपत्ति का विवरण हाईकोर्ट की वेबसाईट पर प्रकाशित कर दिया है.

पर माना जाता है कि अब भी जजों का एक बड़ा वर्ग संपत्ति का विवरण जनता को देने को तैयार नही है. इलाहाबाद हाईकोर्ट का प्रस्ताव भी इसी मनःस्थिति का परिचायक है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट देश का सबसे बड़ा हाईकोर्ट है. यहाँ जज के कुल 160 पद स्वीकृत हैं , हालाकि अभी केवल 84 जज ही कार्यरत हैं.

सूचना अधिकार के लिए संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे का कहना है “सार्वजनिक पदों पर कार्य करने वाले सभी लोगों को अपनी संपत्ति का विवरण हर साल देना चाहिए फिर वह चाहे विधायिका में हों, कार्यपालिका में या न्यायपालिका में.”

पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट गाज़ियाबाद प्रॉविडेंट फंड घोटाले के कारण चर्चा में था. हाईकोर्ट ने ही विजिलेंस जांच कराकर पुलिस में मुकदमा कायम कराया था कि गाजियाबाद ज़िला अदालत कर्मचारियों के नाम पर प्राविडेंट फ़ंड खातों से कई करोड़ की रकम निकाली गई.

बाद में एक मुख्य अभियुक्त कर्मचारी ने कोर्ट में बयान दिया कि इस रकम से जजों और उनके रिश्तेदारों को मंहगे सामान और नकद पैसा दिया गया. काफी ना नुकुर के बाद अंत में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपी.

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