इनसे भी पूछिए, सत्याग्रह के मायने

मुन्नालाल
Image caption पंद्रह साल से धरने पर बैठे हैं मुन्नालाल

न्याय की आस में मुन्नालाल आठ नवंबर, 1994 यानी 15 बरस से लखनऊ में विधानसभा के सामने धरनास्थल पर खुले आसमान के नीचे बैठे हैं. मुन्नालाल का मनोबल अभी तक नहीं टूटा है, यह एक बड़ी बात है.

उन्हें यह बताते हुए खुशी और गर्व है कि उन्होंने लंबे समय तक धरना देने का कटोरी देवी का रिकार्ड तोड़ दिया है. वह अपने को 'प्रथम धरनाकारी उत्तर प्रदेश' कहते हैं.

उनका दावा है कि उनसे ज़्यादा समय तक किसी ने धरना नहीं दिया इसलिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज किया जाए.

मथुरा की एक अध्यापक कटोरी देवी ने 14 साल, दो महीने तक विधानसभा के सामने सत्याग्रह किया, पुलिस की मार खाई. हाईकोर्ट से भी वह हार गईं.

फिर गवर्नर मोतीलाल वोरा ने वर्ष 1996 में नौकरशाही की आपत्ति नज़रंदाज करते हुए कटोरी देवी को न्याय दिलाया. कटोरी देवी की नौकरी बहाल हुई, आर्थिक मुआवज़ा मिला.

मुन्नालाल दलित बिरादरी के हैं. वर्ष 2007 में नई सरकार बनने पर मुन्ना लाल ने प्रेस को एक लिखित बयान दिया था कि मायावती के शासन काल में मांगें पूर्ण किए जाने का पूर्ण विश्वास... मगर इन सवा दो सालों में बहन जी से तो मिल भी नहीं सके.

फिर भी मुन्नालाल निराश नहीं हुए हैं. वो कहते हैं कि एक न एक दिन न्याय ज़रूर मिलेगा.

मुन्नालाल का कहना है कि वो 20 सितंबर, 1983 को सिंचाई विभाग के हैदरगढ़-बाराबंकी खंड में दैनिक वेतन टाइपिस्ट के पद पर नियुक्त हुए थे. आरक्षण कोटे में नियुक्ति नियमित कराने का प्रयास किया मगर 1989 में नौकरी से निकाल दिए गए.

उनका कहना है कि साथ के सभी 59 लोग बहाल हो गए हैं, अकेले वो ही सड़क पर हैं.

मुन्नालाल का परिवार हाथरस में गाँव में रहता है. कभी-कभी घर भी चले जाते हैं. पत्नी के अलावा तीन बेटियाँ और दो बेटे हैं. खानदान में और लोग भी हैं.

सबने मिलकर एक बेटी की शादी कर दी है. बच्चे बड़े हो गए हैं. कमा खा लेते हैं. मुन्नालाल दोस्तों और परिवार वालों की मदद से अपना ख़र्च चलाते हैं.

...और ये अकेले नहीं

मुन्नालाल लोकतंत्र में लोकतांत्रिक तरीक़े से लड़ने वाले और अपने साथ न्याय का इंतज़ार करने वाले अकेले सिपाही नहीं हैं.

ऐसी सूची में कितने ही नाम हैं. मसलन, एक लखनपाल परिवार की ही बात करें.

उमा अपने पति सुप्रिय लखनपाल और बेटे सौहार्द लखनपाल के साथ 12 बरस से विधानसभा के सामने धरने पर हैं. इसी चक्कर में बेटा स्कूल नहीं गया. बेटा 16 साल का हो गया है . वह रोज-रोज देखता है कि व्यवस्था से न्याय नहीं मिलता बल्कि उल्टे पुलिस की लाठी और जेल मिलती है.

सुप्रिय लखनपाल का कहना है कि हमारी तो सरकार से कोई पैसे या नौकरी की मांग भी नहीं है. हम तो सिर्फ हाईकोर्ट के आदेश का पालन कराने के लिए बैठे हैं.

उमा लखनपाल के पिता उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर संपूर्णानंद के निजी सचिव थे. उनका एक मकान है. वसीयत के मुताबिक दो भाइयों के साथ-साथ उमा लखनपाल को भी एक तिहाई हिस्सा मिलना था. पर आरोप है कि बड़े भाई ने पुलिस की मदद से उन्हें जबरन मकान से बेदखल कर दिया.

सुप्रिय लखनपाल का कहना है कि हाईकोर्ट एक दर्जन बार उनके पक्ष में आदेश दे चुका है कि प्रशासन उनको कब्जा वापस दिलाए और बिना किसी कोर्ट आर्डर के उन्हें बेदखल न किया जाए.

मगर प्रशासन यह आदेश लागू नहीं कराता. सुप्रिय लखनपाल कहते हैं, 'हम तो मजबूरी में यहाँ बैठे हैं क्योंकि हमारे पास और कोई जगह नहीं. सुप्रिय बरेली के एक अखबार के संपादकीय विभाग में नौकरी करते थे, इस संघर्ष के चलते वो नौकरी भी चली गई. पुलिस ने कई बार गिरफ्तार करके जेल भी भेजा.

सुप्रिय का कहना है कि धरना स्थल पर बैठना बड़ा मुश्किल काम है. न ठीक से बैठने कि व्यवस्था, न लैट्रिन की व्यवस्था और न नहाने की. कई बार जब पुलिस यहाँ प्रदर्शन करनेवालों पर लाठी चलाती है तो भगदड़ मच जाती है और उनका तख्त तम्बू उलटा-पुलटा हो जाता है. आम तौर पर तो अब कोई ज्ञापन लेने भी नही आता.

कबतक आख़िर...आख़िर कबतक

ऐसे कितने ही नाम हैं जिनका पता है लोकतंत्र में अपना विरोध जताने और हक़ मांगने के सत्याग्रही तरीके की यह जगह, जहाँ लोग धरने पर बैठते हैं.

सोलह साल के सौहार्द लखनपाल में मुन्नालाल या अपने माँ बाप जैसा धैर्य नही है है. उसकी तरुणाई को यह सब बर्दाश्त नहीं. वह कहता है, '' मै तो माओवादियों में शामिल हो जाउंगा. वे लोग हथियार लेकर जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं. 12 साल से लोकतांत्रिक लड़ाई लड़कर देख लिया.''

सौहार्द लखनपाल अकेला नहीं है. ऐसे बहुत से लोग हैं जो सोचते हैं कि अब आजाद हिन्दुस्तान में धरना प्रदर्शन और सत्याग्रह कारगर हथियार नहीं रहे.

गांधी जयंती की सुबह सात बजे धरनास्थल से लौटते हुए मै वापस घर आ रहा था. हजरतगंज चौराहे पर बड़ी तादाद में पुलिस तैनात थी. थोड़ी ही देर में हाकिम लोग गांधी जी पर एक बार फिर माला चढ़ाने आने वाले थे.

और पुलिस की ड्यूटी लगी है कि कोई मुन्नालाल, उमा लखनपाल, संजय मुखी, बाबा रजनीश या फिर शंभु दयाल जैसे आम आदमी अपनी फ़रियाद लेकर उनके पास न पहुँच जाएँ.

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