तथागत सतपति के साथ मुलाक़ात

तथागत सतपति
Image caption तथागत सतपति को गिटारिस्ट जिमी हेंड्रिक्स बहुत पसंद हैं.

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. बीबीसी 'एक मुलाक़ात' में इस बार ख़ास मेहमान हैं उड़ीसा के युवा सांसद तथागत सतपति से एक मुलाक़ात

आपकी मां और पिताजी राजनीति में थी तो क्या आप इसीलिए राजनीति में आना चाहते थे ?

मैं जिमी हैंड्रिक्स का फैन हूँ. कुछ दिनों के लिए ड्रम भी बजाया, लेकिन बाद में उसे भी छोड़ दिया. अब रॉक एंड रोल सुनता हूँ. अफसोस है कि मैं संगीतकार नहीं बन पाया. लेकिन जब भी समय मिलता है मैं संगीत सुनता हूँ.

ये कहना मुश्किल है कि अगर राजनेता नहीं बनता तो संगीतकार बनता. क्योंकि संगीत का हुनर मुझमें था ही नहीं, इसलिए संगीतकार बनना मुश्किल था. हाँ मिस्त्री ज़रूर बन जाता, क्योंकि ये थोड़ा आसान है.

जब आप बड़े हो रहे होते हैं तो अपने आसपास के माहौल से प्रेरित होते हैं. तो क्योंकि आपकी मां राजनीति में थी और उड़ीसा की मुख्यमंत्री थी और पिता भी सांसद थे तो इसने आपको राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया?

ये सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में है कि जो पेशा माता-पिता का होता है या जो माहौल घर का होता है, बच्चे भी उससे प्रभावित होते हैं. सिनेमा स्टार के बच्चे सिनेमा स्टार ही बनने की कोशिश करते हैं. ये अलग बात है कि कुछ फ़िल्म स्टार के बच्चों को हमने असफल होते भी देखा है. उद्योगपतियों के बेटे उद्योगपति ही बनते हैं. बाद में चाहे वो लड़े-झगड़ें, जो भी करें.

हालांकि अब लोग इस बात पर हंसते हैं कि नेता लोगों की सेवा करते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि राजनेता लोगों की सेवा करते हैं. उसके लिए ही तो उन्हें वोट मिलता है. तो जिसकी पृष्ठभूमि राजनीति की है, वो राजनीति में जाता है.

लेकिन राजनेता को बेटा को कोई परीक्षा तो पास करनी नहीं होती, उसे एमपी, एमएलए का टिकट मिल जाता है?

हाँ एक बार उसे वोट मिल सकता है, लेकिन अगली बार उसे अपनी काबलियत से जीतना होगा. मान लीजिए की देशभर में यूपीए की लहर चली तो ऐसा तो नहीं है कि यूपीए के सभी उम्मीदवार जीत जाएंगे. बिज़नेस, फ़िल्मों में आपको कई मौके मिल सकते हैं, लेकिन राजनीति में आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही मौका मिलेगा.

मैं आपको अपने राज्य का उदाहरण देता हूँ. आप कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को पहली बार इसलिए मौका मिला क्योंकि वो बीजू पटनायक के बेटे थे. लेकिन दूसरी बार उन्हें बीजू पटनायक के नाम पर नहीं, बल्कि उनके काम और उनकी व्यक्तिगत छवि पर जनता का विश्वास मिला.

अगर नवीन पटनायक, तथागत सतपति, राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दूसरे राजनीतिक परिवार इसी तरह काबिल निकलते रहे तो क्या देश में सिर्फ़ 500 परिवारों का राज हो जाएगा?

आपका कहना सही है. देश में सिर्फ़ कुछ परिवारों का राज नहीं होना चाहिए. लेकिन आप खुद देखिए कितने और कैसे लोग राजनीति में आ रहे हैं और जो आ भी रहे हैं वो इन्हीं की चमचागिरी कर रहे हैं.

मेरा मानना है कि 21वीं सदी के भारत का मतदाता ज़्यादा जागरुक है. वो राजनेताओं को अच्छी तरह पहचानते हैं. इंदिरा गांधी, संजय गांधी भी 1977 में हार गए थे. तो ये किसी के साथ भी हो सकता है.

आप 1990 में पहला चुनाव लड़े और अब तीसरी बार सांसद हैं. आप कह रहे हैं कि पब्लिक है सबजानती है’.तो क्या आपको लगता है कि भारत में राजनीतिक सोच, मतदाताओं की ताकत ये सब बदल रही है?

बिल्कुल बदल रहा है. मैं जब कॉलेज में जाता हूँ तो छात्र-छात्राएँ मुझसे कहते हैं कि ये ग्लोबलाइज़ेशन क्या है. इससे हमें फायदा होगा या ये हमारे लिए नुक़सानदेह होगा. शिक्षा के अधिकार पर मुझसे पूछा जाता है कि हमारे स्कूल में 150 बच्चे हैं और सिर्फ एक अध्यापक है, यहां ये अधिकार कैसे काम करेगा. तो इस तरह के सवाल लोगों के मन में आ रहे हैं. तो जो शासन कर रहे हैं, उनकी भी समझ में आ रहा है कि वे ज़मीनी हक़ीक़त से कितनी दूर हैं.

आपने शिक्षा के अधिकार की बात की तो आपने 2006 में संसद में भाषण दिया था जो बहुत क्रांतिकारी तो नहीं था, लेकिन ये लीग से हटकर था. आपका कहना था कि आरक्षण का फार्मूला कामयाब नहीं रहा है, इस पर विचार करने की ज़रूरत है. तो क्या आपको लगता है कि आजकल की राजनीति में इस तरह की बातें नक्कारखाने में तूती जैसी बात है?

मैं जहाँ तक जानता हूँ कि जब जा़र की हत्या की गई थी और लेनिन ने क्रांति की थी तो उनके साथ हज़ारों लोग नहीं थे. उनके साथ कुछ ही लोग थे और वो बदलाव लाने में कामयाब रहे. तो ये विचार की कि जो वंचित हैं वो कभी जाग सकता है, ये सबके दिमाग में है. तो जो आवाज़ आज नहीं सुनी जा रही है वो आज नहीं तो कल या फिर 10 साल बाद उसे कोई न कोई तो सुनेगा.

आप जिन वंचितों के बारे में बात कर रहे हैं. क्या आप भारत में भी कुछ इस तरह की समस्या देखते हैं. क्या वंचितों में अंदर ही अंदर कुछ सुलग रहा है. और क्या इसका डर संपन्न वर्ग में आ रहा है?

आना चाहिए. अगर नहीं आ रहा है तो मुझे उन पर तरस आता है. जो ये सोच रहे हैं उन्हें दबाने के लिए आप पुलिस, सीआरपीएफ भेज देंगे. आप कितनी गोली चलाएँगे, कितनों को मारेंगे. जिनको मारेंगे, वही तो पुलिस में हैं. तो अब चिंता करने का वक़्त आ गया है.

उड़ीसा में माओवाद चरम पर पहुँच रहा है. इसकी जड़ें बहुत मज़बूत हो रही हैं. मेरे संसदीय क्षेत्र के ढेंकानाल, अनगुण ज़िले माओवाद की चपेट में हैं. हालाँकि इसमें कुछ लोग हैं जो पहले चोरी, डकैती करते थे. अब उन्होंने माओवाद की चादर ओढ़ ली है, लेकिन उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो गरीबों के साथ हैं.

तो क्या आप वामपंथी विचारधारा के हैं या फिर इस तरह का माहौल देखकर ऐसी बातें कर रहे हैं?

मैं संसद में जहाँ बैठता हूँ वो सीट स्पीकर के ठीक सामने है. 383 नंबर की इस सीट के बायीं तरफ सत्तारूढ़ यूपीए है और दायीं तरफ एनडीए. तो मैं लगभग बीच में हूँ. तो विचारधारा भी लगभग मध्य में है. देश में संतुलित राजनीति की ज़रूरत है और मैं ज़मीनी हक़ीक़त देखने के बाद ऐसी बातें कर रहा हूँ.

राजनीति में आपका आदर्श कौन है?

चे ग्वेरा और महात्मा गांधी. चे ग्वेरा हिंसा में यकीन करते थे और गांधी अहिंसा में. चे ग्वेरा अपने शत्रुओं का दमन हिंसा से करना चाहते थे. महात्मा गांधी अपने शत्रुओं का दिल बदलना चाहते थे.

चे ग्वेरा ने दक्षिण अमरीका में जहाँ-जहाँ क्रांति में हिस्सा लिया, वहाँ आज भी उनकी विचारधारा कायम है.

हिंदुस्तान की बात करें तो महात्मा गांधी ने हमें दो बातें सिखाई सविनय अवज्ञा और अहिंसा. जहाँ तक मैंने उनके बारे में पढ़ा है, मैं उन्हें इन दो आंदोलनों से समझा हूँ. वो भारतीयों को बहुत अच्छी तरह समझते थे. दरअसल, हम भारतीय मिलकर हिंसा कर सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर हम अहिंसक हैं. दूसरा हम अनुशासित नहीं हैं. हम मानते हैं कि हम क़ानून से बंधे नहीं हैं.

आपने काफ़ी दुनिया घूमी है. 15-20 देशों का भ्रमण किया है. इनमें से सबसे अच्छी जगह कौन सी लगी?

बाली मुझे बहुत अच्छी लगी. इसके अलावा भारत में मुझे अंडमान बहुत पसंद है.

आपको भाषाओं का भी अच्छा ख़ासा ज्ञान है?

मैं पांडिचेरी गया था तो वहाँ शिक्षा का माध्यम फ्रेंच था इसलिए फ्रेंच सीखना ज़रूरी था.

आप अरविंदो कॉलेज में पढ़े, उसका क्या अनुभव रहा?

बहुत अच्छा अनुभव रहा. उससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. मैं पहली बार वहाँ छात्रावास में रहा. वहाँ सब कुछ खुद करना पड़ता था. दूसरा अंदरूनी जागरूकता बढ़ी. हालाँकि मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि मैं साधू हूँ या फिर धार्मिक व्यक्ति हूँ.

क्रिकेट का शौक है आपको?

नहीं. क्रिकेट का मुझे कतई शौक नहीं है. मुझे फ़ुटबॉल पसंद है.

आपने 1997 में शादी की. थोड़ी देरी से, नहीं?

हां 42 साल की उम्र में मुझे राइट मिसेज़ सतपति मिली. मुझे 6-8 महीने का इंतज़ार भी करना पड़ा, क्योंकि इसके बाद ही वो 18 साल की हो रही थी.

और आपकी पत्नी अभिनेत्री हैं?

उन्होंने शादी के बाद एक फ़िल्म में अभिनय किया. लेकिन ज़्यादा समय नहीं और अभिनय से ज़्यादा उन्होंने मुझे तरजीह देखना ठीक समझा.

तो 42 साल का इंतज़ार. फिर अचानक आपको अपनी मनपसंद लड़कि मिली. ऐसा कैसे हुआ?

दरअसल, हम बिज़नेस उड़ीसा नाम का एक टेलीविज़न प्रोग्राम बनाते थे. कई लोगों ने एंकर के लिए आवेदन दिया था. तो मेरा एक दोस्त था. उन्होंने मुझसे कहा कि जो असल में एंकर बनने लायक है, उसने तो आवेदन ही नहीं किया है. उन्होंने मुझे नंबर दिया. मैंने उनसे बात की और मिलने के लिए कहा. जब मैं उनसे मिला तो मुझे लग गया कि ये परफेक्ट एंकर ही नहीं मेरी परफेक्ट जीवनसंगिनी भी होंगी.

तो आपने सीधे उनके घरवालों से बात की?

मैंने पहले उनसे बात की. उनके घरवाले बहुत नाराज़ थे. शादी में कोई आया भी नहीं था. उम्र में इतना अधिक फासले से वो नाराज़ थे. लेकिन दो-तीन साल बाद उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया.

उड़ीसा भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है. आपका संसदीय क्षेत्र भी बहुत पिछड़ा हुआ है. युवा सांसद होने के नाते आपके मन में क्या आता है. आखिर क्या है इसका इलाज?

बिना सोचे समझे अगर ग़ैर राजनीतिक जवाब आपको चाहिए तो मैं कहूँगा कि हम ज़रूरत से ज़्यादा नौकरशाही पर निर्भर हैं. कई लोग कहते हैं कि नौकरशाही को हटा दो, लेकिन इसका अभी कोई विकल्प नहीं है.

जब मनमोहन सिंह ने पहली बार प्रधानमंत्री का पद संभाला था तो उन्होंने कहा था कि वो प्रशासनिक सुधार के लिए काम करेंगे. लेकिन वो कुछ नहीं कर पाए.

जो नौकरशाह है वो एक ही परीक्षा से आईएएस, आईपीएस, आईएफएस बन जाता है. नौकरशाही की ब्रिटिश मॉडल अब भी ज़िंदा है. नौकरशाह राजनेताओं या किसी की भी बात सुनने को तैयार नहीं होते. ऐसा नहीं है कि एमएलए, एमपी भगवान हैं. लेकिन कम से कम उनकी बात तो सुननी चाहिए. लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए.

आपका पसंदीदा पासटाइम?

थोड़ा बहुत फ़िल्में देख लेता हूँ. हाल ही में फ़िल्म क्वीन देखी. ये फ़िल्म डायना की मौत के बाद के हालात पर आधारित है.

इसके अलावा में एक अख़बार धरित्रि का संपादक हूँ और लिखता भी हूँ.

तो किस तरह के मुद्दों पर लिखते हैं?

मैंने हाल ही में रुख़साना पर एक संपादकीय लिखा था. मैंने लिखा था कि रुख़साना को भारत रत्न मिलना चाहिए न कि टाटा, अंबानी या किसी राजनेता को. जिस तरह से उसने आतंकवादी को मारा. उसे पहचान दी जानी चाहिए.

आप रोज लिखते हैं?

मैं हफ़्ते में चार दिन लिखता हूँ. तीन दिन सिंडिकेटेड कॉलम होते हैं. मैं अक्सर रात में ही लिखता हूँ. दिन भर तो लोगों से घिरा रहता हूँ.

तथागत सतपति को दो वाक्यों में कैसे बताएँगे?

आपने तो बाबा लोगों जैसा सवाल पूछ लिया कि तुम खुद का विश्लेषण करो कि तुम क्या हो. फिर मैं कहूँगा कि मैं सांसद हूँ, मैं संगीत पसंद करता हूँ. फिर आप पाएँगे कि आप तो कुछ नहीं हो, आप तो शून्य हो.

दरअसल, राजनेता मोटी चमड़ी का नहीं हो सकता. उसे बहुत ज़्यादा संवेदनशील होना पड़ेगा, नहीं तो वो अलग-थलग पड़ जाएगा.

अगर कोई युवा भारतीय राजनीति में आना चाहे, उसके लिए आप क्या देखते हैं?

इसमें भी संघर्ष है. लोगों के सुख-दुख में शामिल होना चाहिए. हो सकता है कि लोगों का ध्यान आपकी तरफ न जाय. लेकिन यही राजनीति है.

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