सुध तो आई...

Image caption कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपना खोया जनाधार पाने के लिए संघर्ष कर रही है

बड़े अरसे बाद इस गांधी जयंती पर दलितों की धूम रही.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेसियों का एक रात के लिए दलितों के साथ ठहरना या फिर शनिवार को आरएसएस सर संघचालक द्वारा जाति पंचायत की तर्ज पर आयोजित दिल्ली में सहभोज, यह गांधी जयंती जैसे जुड़े मुद्दों और राजनीति को समर्पित थे.

राहुल गांधी के एक इशारे पर चांद-सितारे तोड़ लाने को आतुर कांग्रेसियों को इस बार युवराज ने कुछ व्यवहारिक राजनीति का पाठ पढ़ाने की सोची. आदेश जारी हुआ कि यूपी में कांग्रेसी नेता एक रात किसी दलित परिवार के साथ बिताएँगे. खाना भी वहीँ होगा, सोना भी. साथ में पैकेज्ड फूड या मिनरल वाटर की बोतलें ले जाने पर पाबंदी लग गई.

सुनने-सुनाने के लिए तो कार्यक्रम अच्छा था, लेकिन एसी गाड़ियों में घूमने वाले, वातानुकूलित कमरों में रहने के आदी कांग्रेसियों को छुट्टी के दिन इस तरह की सज़ा की उम्मीद नहीं थी.

पर भला हो राहुल के आतंक का और कुछ पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का...अगर कोई कांग्रेसी इस निर्देश का पालन नहीं करता तो तय था कि उसका स्थानीय विरोधी सबसे पहले दौड़कर पार्टी आलाकमान तक पहुँचता.

फरमान

सभी कांग्रेसी नेता दो अक्तूबर की रात किसी दलित बस्ती या गांव में अपने लश्कर के साथ धमक गए.

कोई साथ पंखे, गद्दे और जेनरेटर लेकर पहुँचा तो कोई रसोइया. डिस्पोज़बल प्लेट और चम्मच तो सभी लेकर आए.

पीछे-पीछे मीडिया भी पहुँची. किसी सांसद को चिकन करी खाते दिखाया तो किसी को टैंट हाउस से लाए गए मखमली बिस्तरों पर आराम करते.

Image caption पिछले कुछ सालों में मायावती का दलित जनाधार तेज़ी से बढ़ा है

कुछ ‘कम बिगड़े’ हुए कांग्रेसी नेता भी पहुँचे. उन्होंने अपने मेज़बानों के यहाँ बनी खिचड़ी खाई. एक नेता अपने साथ खाने का सामान लेकर गईं और वहीँ भोजन बनाया और साथ में खाया.

पानी ज़्यादातर नेता अपने साथ लेकर गए थे. जो शर्मवश या भयवश पानी साथ नहीं लाए थे उन्होंने कम से कम या बिल्कुल पानी पिए बिना ही रात काटी.

ज़्यादातर मीडिया ने इस पूरी कवायद की खिल्ली उड़ाई. इस लेख का मूड भी अब तक कुछ मज़े लेने वाला ही ज़्यादा रहा है.

पर मैं इस पूरे किस्से को महज़ एक दिखावा, राजनीति से प्रेरित छलावा इत्यादि कहकर डिसमिस नहीं करना चाहूँगा.

हर कहानी के दो पक्ष होते हैं, हर सिक्के के दो पहलू. हर परिस्थिति को देखने, समझने का अलग नज़रिया.

कारण जो भी रहा हो और कई नेता कितने ही अनमने और ढोंग रचने के अंदाज़ में दलितों के बीच इस गांधी जयंती पर पहुँचे हों, लेकिन मन में उन सभी को यह तो समझ में आ ही गया कि सत्ता की चाबी अब भी देश के पिछड़े तबकों, निचले वर्ग, आम और ग़रीब व्यक्ति के पास है.

शक्ति का अहसास

Image caption राहुल गांधी का दलित परिवार के बीच रात गुजारना मीडिया में बेहद चर्चित रहा

स्वयं दलितों को इस पूरे घटनाचक्र से अपनी शक्ति का अहसास हुआ होगा. कुछ न कुछ तो उन दरिद्रों का भी उस रात हौसला बढ़ा होगा, जब उन्होंने महलों में और स्वयं पर राज करने वालों को अपनी बीच देखा होगा.

फिर सभी नेता ढोंगी हैं, ऐसा मैं नहीं मानता. कई कांग्रेसी नेताओं, युवा सांसदों और बड़े-बुजुर्गों ने भी उस रात असली भारत के करीब से दर्शन किए होंगे.

और अगर उनमें से एक के भी मन में अपने मेज़बानों की दशा देखकर दर्द भर आया होगा और कुछ करने का संकल्प जगा होगा तो मैं इस पूरी कवायद को एक सकारात्मक पहल की तरह देखूँगा.

हाँ यह सही है कि पूरा कार्यक्रम उत्तर में दलितों की राजनीतिक हित के लिए रिझाने-लुभाने के तहत चलाई जा रही मुहिम है.

लेकिन इसमें गलत क्या है. राजनीतिक दल राजनीति के बारे में नहीं सोचेंगे तो फिर कौन सोचेगा. ठीक इसी तरह से हम आरएसएस की भी आलोचना कर सकते हैं कि उनका शनिवार का सहभोज मात्र दलितों और पिछड़ों को हिंदुत्व के मोर्चे से जोड़ने की कोशिश है.

ठीक है तो हिंदुत्व तो आरएसएस का घोषित एजेंडा भी है. लेकिन अगर उनका कोई काम जातिवाद के विष को कम करने का प्रयास करता है तो कम से कम उसकी आलोचना तो न करें. उस प्रयास से अगर सांप्रदायिकता का ख़तरा बढ़ता है तो उससे ज़रूर जमकर जूझें.

खैर बात राजनीति की चल रही थी. तो सबसे ज़्यादा तो इस पूरे प्रकरण में धन्यवाद मायावती और उनके राजनीतिक गुरु कांशीराम को दिया जाना चाहिए कि इस गांधी जयंती पर रात को दलितों की सुध लेने का होश तो आया.

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