सेव द चिल्ड्रेन के सात सूत्री कार्यक्रम

बच्चा
Image caption पांच साल से कम आयु के बच्चों की मौत के मामले में भारत अव्वल नंबर है

अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी सेव द चिल्ड्रेन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष पाँच साल से कम उम्र के लगभग बीस लाख बच्चों की मौत होती है. यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले अधिक है.

पांच वर्ष से कम आयु में मृत्यु की दर को 2010 से 2015 के बीच आधा करने के लिए सेव द चिल्ड्रेन मिलेनियम डेवलप्मेंट गोल-4 लेकर आई है. इसके तेहत सेव द चिल्ड्रेन ने एक सात-सूत्री कार्यक्रम पेश किया है और विशेष रूप से भारत का ध्यान इन सात क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया है.

भारत से कहा गया है कि वह विश्वसनीय राष्ट्रीय योजना लागू करे. इसके तहत भारत 2011 तक माँ, नवजात शिशु और शिशु बचाव संबधी विशेष योजना पर अमल शुरू कर देगा जिस पर स्वास्थ और परिवार कल्याण, महिला और शिशु उत्थान, जल और शौच, नागरिक विकास मंत्रालय और नरेगा (एनआरईजीए) काम करेगा.

नवजात शिशु पर फ़ोकस- पचास प्रतिशत नवजात शिशु पहले महीने के अंदर ही मौत का शिकार हो जाते हैं इसके लिए उनके जीवित रहने के उपायों पर विशेष ज़ोर दिए जाने की सलाह दी गई है. चूँकि भारत में दो तिहाई प्रसव घरों में होते हैं इसलिए नवजात शिशु के लिए ज़रूरी देखभाल घर के साथ साथ अस्पताल और स्वास्थ केंद्रों में उपलब्ध कराई जाए जहां लोग आसानी के साथ उस सुविधा का लाभ उठा सकें.

नवजात की देख-रेख को प्राथमिकता दी जाए. इसमें माँ, नवजात, बच्चे के स्वास्थ, पोषण और अन्य संबंधी चीज़ों के बीच की दूरी को कम किया जाना शामिल है. इसके अलावा अमीर और ग़रीब, विशेषरूप से अधिकारहीन वर्ग के बच्चों के मृत्यु दर के बीच की दूरी को कम करना भी शामिल है.

Image caption भारत में दो तिहाई बच्चे घरों में पैदा होते हैं

अतिरिक्त संसाधन जुटाना- भारत को चाहिए कि 2015 तक स्वास्थ पर ख़र्च की जाने वाली जीडीपी की एक प्रतिशत को बढ़ा कर पांच प्रतिशत करे जो कि अंतरराष्ट्रीय औसत है. बच्चे के स्वास्थ, पोषण, पीने के पानी स्वास्थ विद्या, आजीविका और खाद्य सुरक्षा स्कीमों पर ख़र्च की जाने वीली रक़म को दोगुना करे

स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों को प्रशिक्षण- अतिरिक्त दिए गए पैसों में से कुछ हिस्सा हेल्थकेयर कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, उन्हें सामान देने और तैनात करने में ख़र्च किया जाए. भारत में प्रशिक्षित और उपकर्णों से लैस हेल्थकेयर कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि का लक्ष्य बनाया जाए. विशेष तौर पर सबसे ज़्यादा ग़रीब और अधिकारहीन वर्गों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए.

कुपोषण पर क़ाबू करें- पोषण को प्राथमिक्ता दी जानी चाहिए. पुष्टिकर अनुपूरक, विशेष स्तनपान कराने, पूरक खुराक और खाद्य किलाबंदी के साथ साथ प्रमाणित बचाव को उपायों को अपनाया जाए. इसके अलावा कैश ट्रांस्फ़र और सामाजिक सुरक्षा के कार्यकर्मों को सहायता प्रदान की जानी चाहिए.

आपातकाल की स्थिति में बच्चों पर ध्यान बढ़ाया जाए. भारत सरकार को चाहिए कि वह अपनी नेश्नल डिसास्टर रिलीफ़ योजना में माँ और बच्चों को भी शामिल करे. इस योजना में नवजात की देख-भाल की विशेष योजना है.

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