क्यों पिछड़ा हुआ है मेवात?

मेवात
Image caption मुस्लिम बहुल इलाक़ा है मेवात

दिल्ली से सटा हुआ गुडगाँव जैसे नए भारत की उभरती हुई तस्वीर जैसा है. चौड़ी-चौड़ी सड़कें हैं, ऊंची-ऊँची इमारतें, जिनमें शीशे लगे हुए हैं, नामी कंपनियों के दफ़्तर हैं, कॉलिंग सेंटरों के दफ़्तर हैं और फिर शापिंग मॉल और ना जाने क्या क्या.

गुड़गाँव से ही बीस या तीस किलोमीटर, लेकिन इसी से जुड़ा हुआ है मुस्लिम बहुल मेवात का इलाक़ा जहाँ तस्वीर बिल्कुल ही अलग है.

आने वाले चुनाव में सरकार किसी भी पार्टी की बने, नई सरकार के लिए मेवात का पिछड़ापन एक बड़ी चुनौती होगी.

पिछली यूपीए सरकार ने सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के बाद देश भर के 90 ज़िलों को विशेष रूप से विकसित करने की योजना बनाई थी, जहाँ अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी तादाद है. मेवात उन्हीं 90 ज़िलों में से एक है.

बहरहाल वापस आपको गुड़गाँव शहर की ओर लिए चलते हैं.

पी के जैन बड़े उद्योगपति हैं, दिल्ली में रहते हैं लेकिन उनका शानदार दफ़्तर गुड़गाँव में है. वो यहाँ सबसे पहले साठ के दशक में आए.

वो कहते हैं कि उस वक्त गुड़गाँव एक गाँव जैसा था जहाँ रबर का कुछ सामान या फिर घरों में काम आने वाले मिट्टी के सामान बनते थे. लेकिन संजय गाँधी ने जब यहाँ पर मारूति बनाने के लिए संयंत्र स्थापित किया, तभी से गुडगाँव बदलना शुरू हो गया.

पीके जैन कहते हैं, "आज देश का 90 प्रतिशत बारले मॉल्ट जिसका इस्तेमाल बियर बनाने के लिए होता है, वो अब ज़्यादातर गुड़गाँव से आता है, देश के लिए हर साल सात से आठ लाख कारें यहाँ बनती हैं, इसी तरह देश की सबसे ज़्यादा मोटरसाइकिलें यहाँ बनती हैं, फ़रीदाबाद और गुड़गाँव को मिलाकर देश के सबसे ज़्यादा ट्रैक्टर भी यहाँ से आते हैं. आसपास गाँवों में रहने वाले हज़ारों बच्चे यहाँ काम करते हैं. बिना गुड़गाँव के हरियाणा कुछ नहीं है."

क्या मिला?

हालांकि बहस ये भी है कि गुड़गाँव की वजह से हरियाणा में रहने वाले लोगों का कितना फ़ायदा हुआ है?

Image caption मेवात में स्कूलों की स्थिति काफ़ी ख़राब है

शिकायते हैं कि हरियाणा में बाहर से लोग आते हैं और काम करके चले जाते हैं, लेकिन पीके जैन जैसे उद्योगपति कहते हैं कि यहाँ किसानों ने अपनी ज़मीनें बेचकर करोड़ों रुपए कमाए हैं और शानदार गाड़ियों में घूम रहे हैं.

लेकिन ये बात भी सच है कि ऐसे भी कई लोग हैं जिन्होंने धन का भविष्य के लिए सही इस्तेमाल करने के बजाय उसे शानो-शौकत में खर्च किया.

गुड़गाँव से सटा हुआ है मेवात का इलाक़ा जिसे एक अलग ज़िला बना दिया गया है. यहाँ हालात एकदम उलट हैं. सड़कों के चारों ओर खाली ज़मीन या खेत, खराब सड़कें, किनारे छोटी-छोटी दुकानें जिसमें बैठे बूढ़े और बच्चे. ऐसे ही एक चाय की दुकान में हम पहुँचे जहाँ नासिर बैठे थे.

वो कहते हैं, "कोई एमएलए बन जाए, चाहे कोई सांसद, वोट लेने सब आते हैं लेकिन चुनाव जीतते ही या तो कोई गुड़गाँव में बैठ जाता है या फिर दिल्ली."

लोगों का कहना था कि दूसरे इलाकों जैसे रोहतक, हिसार या फिर नूह के लोगों को नौकरियाँ मिलती हैं लेकिन मेवात के लोगों को नहीं.

एक दूसरे व्यक्ति का कहना था, "स्वास्थ विभाग में कई लोगों की नौकरियाँ लगीं, लेकिन भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार ने मेवात से किसी को नौकरी नहीं दी. चुने हुए सारे लड़के हिसार या करनाल के थे. बसों के कंडक्टर या ड्राईवर की जो भी नौकरियाँ भी निकलती हैं, वो सब भी बाहर के लड़कों को दे दी जाती हैं."

भेदभाव

उनका कहा था कि यहाँ के लोगों के साथ जानबूझकर इस तरह का व्यवहार किया जाता है. लेकिन आखिर ऐसा क्यों?

19 साल के तैयब ने कहा कि उन्हें लगता है कि उनके साथ जाति को लेकर भेदभाव होता है. तय्यब कहते हैं, "हमारे यहाँ पढ़े लिखे लोगों की कमी नहीं है. यहाँ पर ज़्यादातर लोग मज़दूरी करते हैं, पहले पहाड़ पत्थर तोड़ते थे, अब वो काम भी मिलना बंद हो गया है. स्कूलों की हालत खस्ता है, अध्यापकों का कोई इंतज़ाम नहीं है. हरियाणा पुलिस में जाटों की भरमार है, लेकिन मेवात की किसी को कोई फ़िक्र नहीं है."

इन सब जवाबों के बावजूद सवाल फिर वही कि मेवात का ऐसा हाल क्यों है?

मेवात में पढाई की अच्छी सुविधाएँ नहीं हैं, स्वास्थ्य की सुविधाएं खराब हैं, पीने के पानी की दिक्कत है और सिचाईं के साधन भी ठीक नहीं हैं.

डॉक्टर सुभान खान मेवात के रहने वाले हैं, वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं और उन्होंने मेवात पर काफ़ी काम किया है. वो मेवात के पिछड़े होने की कई वजह मानते हैं.

वो कहते हैं, मेवात के पिछड़ेपन के ऐतिहासिक कारण हैं.

वो कहते हैं, "इस इलाके के लोग अनपढ़ होने के कारण अच्छा नेतृत्व पैदा नहीं कर पाए. और वो आज भी इसी वजह से पीछे हैं. यहाँ के लोग किसी हुनर में भी अपना नाम पैदा नहीं कर पाए. लोगों में जागरुकता नहीं है, वहाँ कई एजेंसियों ने करोड़ों रुपए खर्च किए लेकिन कामयाबी नहीं मिली. इसकी एक वजह ये भी थी कि इन कार्यक्रमों में लोगों की भागेदारी नहीं थी. 1980 में मेवात डेवलपमेंट बोर्ड का गठन किया गया, इसे भी करोड़ो रुपए दिए गए लेकिन उसका भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ."

सोहना विधानसभा क्षेत्र से, जिसमें मेवात का ताउड़ो इलाका आता है, वहाँ से धर्मवीर सिंह कांग्रेस के उम्मीदवार हैं. वो पिछड़ेपन की ज़िम्मेदारी पूर्व विधायकों पर डालते हैं, ना कि कांग्रेस की हरियाणा सरकार पर.

दूसरी ओर यहाँ के लोग कहते हैं उन्हें राजनीतिज्ञों से कोई खास उम्मीद नहीं है.

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