गूजरों के आरक्षण पर रोक

गूजरों का आंदोलन (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption गूजरों का आंदोलन हिंसक हो गया था और कई लोगों की जानें गईं थीं

राजस्थान में हाईकोर्ट ने गूजरों को आरक्षण पर रोक लगा दी है और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है.

इस नोटिस में कहा गया है कि राज्य सरकार यह स्पष्ट करे कि क्या यह आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन नहीं है, जिसके तहत 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता.

गूजरों के लंबे हिंसक आंदोलन के बाद गत जुलाई में गूजरों और सरकार के बीच एक समझौता हुआ था जिसमें गूजर और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों के लिए पांच प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था.

गूजरों को आरक्षण के लिए जो विधेयक लाया गया था उस विधेयक में आर्थिक रुप से पिछड़ी सवर्ण जातियों के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था.

लेकिन मंगलवार को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला और मनीष भंडारी के पीठ ने एक पत्र का संज्ञान लेते हुए गूजरों के आरक्षण पर रोक लगा दी है.

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि राज्य सरकार यह बताए कि क्या इससे सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन नहीं होता, जिसमें कहा गया है कि आरक्षण का कुल प्रतिशत 50 से अधिक नहीं होना चाहिए.

आर्थिक रुप से पिछड़ी सवर्ण जातियों के लिए आरक्षण से यह 50 प्रतिशत से अधिक हो जाता है.

विवाद

गूजरों को आरक्षण का मामला शुरु से विवाद में रहा है.

पहले मीणाओं की तरह आदिवासी वर्ग में आरक्षण देने की माँग को लेकर गूजरों ने आंदोलन किया था जो हिंसक हो गया था और कई लोगों की जानें गई थीं.

फिर गूजर नेताओं के साथ हुए समझौते के तहत वर्ष 2008 में भाजपा सरकार ने एक विधेयक पारित करके गूजर जाति के लिए पांच प्रतिशत और सवर्ण जातियों के निर्धन लोगो के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण की सिफ़ारिश की थी.

मगर राजभवन ने कुछ कानूनी अड़चनों का हवाला देकर इसे रोक लिया था.

इस लेकर गूजर समाज ने फिर आंदोलन शुरु कर दिया था और करौली जिले के पेंचला मोड़ पर पड़ाव दाल कर बैठ गए थे.

लेकिन बाद में राजभवन ने इसे मंज़ूरी दे दी थी. राजभवन ने देरी का कारण बताते हुए कहा था कि राज्यपाल ने इस विधेयक से जुड़े क़ानूनी पहलुओं पर विचार करने के लिए समय लगाया क्योंकि उन पर क़ानूनी सलाह लेने की आवश्यकता थी.

भाजपा आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस के इशारे पर राजभवन इस विधेयक को रोके हुए था.

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