तैयार नहीं हैं भारतीय सेनाएं

भारतीय सेना

भारत के लिए पाकिस्तान के साथ साथ अब चीन के साथ भी संबंधों की तल्खी चिंता का कारण बनता जा रहा है. यह मानना है भारत के पूर्व रक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र का.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि पड़ोस से भारत की चिंता और बढ़ी है.

उन्होंने कहा, "अभी तक के सभी युद्धों में भाग्यवश पाकिस्तान और चीन दोनों एकसाथ भारत के सामने नहीं खड़े थे. पर पिछले कुछ समय में पाकिस्तान के साथ साथ चीन का भी उग्र रवैया अच्छा संकेत नहीं है".

उन्होंने कहा कि चिंता इसलिए और भी बढ़ जाती है कि भारत एक मोर्चे पर भी मज़बूती से निपट पाने के लिए तैयार नहीं है.

ब्रजेश मिश्र ने कहा कि अगर अगले 4-5 साल के दौरान पाकिस्तान और चीन, दोनों ही ओर से भारत पर हमले की स्थिति बनती है तो भारत की स्थिति 1962 के हालात से भी बदतर होगी.

पिछड़ती कूटनीति

उन्होंने कहा कि भारत सामरिक ही नहीं, कूटनीतिक रूप से भी आज कमज़ोर नज़र आ रहा है.

ब्रजेश मिश्र ने कहा कि जहाँ एक ओर सेना को मज़बूत करने की ज़रूरत की अनदेखी हुई है वहीं कूटनीतिक स्तर पर कुछ हासिल कर पाने की स्थिति भी नज़र नहीं आती है.

एक और चिंता की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि कश्मीर के मसले पर चीन और अमरीका का दखल बढ़ना, मध्यस्थता के प्रस्तावों का इन देशों की ओर से भारत के सामने आना और फिर चीन के साथ पिछले दो बरसों में बढ़ी कड़वाहट... ये बड़े खतरे की ओर इशारा है.

वो कहते हैं, "कूटनीति वहाँ होती है जहाँ हमारे पास अपने पाले में कुछ हो, जिसके पास कुछ नहीं है, जो भीख मांगने निकला है, वो क्या कूटनीति करेगा और क्या हासिल कर पाएगा".

परमाणु कार्यक्रम के कमज़ोर पड़ने और उस दिशा में 1998 के बाद कुछ सार्थक न होने की भी बात ब्रजेश मिश्र कहते हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा कि इसके लिए राजनीतिक सत्ता और रक्षा क्षेत्र के लोग ज़िम्मेदार हैं.

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