कुरनूल में परिस्थितियां ख़राब

कुरनूल
Image caption शहर के कई हिस्सों में अभी भी भारी गंदगी है और ठीक से सफाई नहीं हो रही है. फोटो सौजन्य स्नैप्स इंडिया

आंध्र प्रदेश में गत एक शताब्दी के सबसे विनाशकरी बाढ़ को आए दो हफ्ते बीत चुके हैं लेकिन कुरनूल और उसके वासियों की कठिनाईयां और पीड़ा अब तक ख़त्म नहीं हुई है.

पहली नज़र में दस लाख की आबादी वाला यह शहर ऐसा दिखाई देता है जो हज़ारों टन कीचड़, कचरे और मलबे के नीच दफ़न हो गया हो और जिसकी चमक दम शायद कभी वापन न आ सके.

हालांकि राज्य सरकार ने बड़े व्यापक पैमाने पर कुरनूल में सफाई का अभियान चलाया है. इस के लिए ढाई हज़ार लोगों को राज्य के अन्य भागों से कुरनूल लाया गया है और सफाई के कामों में पैंतालीस इंजन, दर्जनों क्रेन, बुल्डोज़र्स और सैंकडों क्रेनों का उपयोग किया जा रहा है लेकिन अधिकारी मानते हैं की यह समस्या आसानी से सुलझने वाली नहीं है.

उनकी बात सही भी है क्योंकि एक अक्टूबर की रात तुंगभद्र और हुदरी नदियों में आने वाली बाढ़ ने अस्सी प्रतिशत नगर को पंद्रह से बीस फीट पानी में डुबो दिया था.

लोग अपनी जान बचाने के लिए बड़े भवनों की ऊपरी मंजिलों और छतों पर पनाह लेने पर विवश हो गए. परेशानी और बेबसी का आलम यह था कि जिन के पास भी बड़े बड़े टोकरे थे जिनका नाव के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता था उन्होंने पानी में फंसे परिवारों को दोनों हाथ से लूटा.

बंदीमत्ता इलाके़ की एक महिला शकुंतला ने बीबीसी को बताया, "मेरी बहू की डिलिवरी हुए सिर्फ बीस दिन ही हुए थे और हमें बच्ची की जान बचानी थी. टोकरे वाले ने हमें पानी से निकालने के लिए सोना माँगा. मैंने गले का मंगलसूत्र और दूसरे गहने देकर अपने परिवार को बचाया.उन्हों ने हर एक से ऐसा ही सलूक किया".

आपदा में भी लूट

एक ग़रीब युवा लड़की ने कहा, ‘‘ मैं और मेरा परिवार एक बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर थे और पानी दूसरी मंजिल तक आ गया था. मैंने टोकरे वाले को मदद के लिए बहुत पुकारा लेकन वो नहीं आया. वो पूछ रहा था की मेरे पास उसे देने की लिए क्या है.’’

ये लड़की उस रात को याद कर के फूट फूट कर रो पड़ी लेकिन उसके आंसू पोंछने कोई नहीं आया क्योंकि कुरनूल में लगभग हर घर की कहानी ऐसी ही है.

बाढ़ से पूरी तरह नष्ट होजाने वाले एक और इलाके गद्दा के सैय्यद आरिफ भी वो क्षण कभी नहीं भूल सकते. वो कहते हैं, "दो दिन तक हम बाढ़ में फंसे रहे. खाना तो छोड़िए पीने के लिए पानी नहीं था और मैं ने अपने मासूम बचों को बाढ़ का गंदा पानी पिलाया.मैं यह सब कैसे भूल सकता हूँ".

अमीर-ग़रीब बराबर

कुरनूल के ग़रीब तो बर्बाद हुए ही लेकिन इस समृद्ध शहर के करोड़पति भी बर्बाद होने से नहीं बचे.

मल्लिकरून की तेल निकालने की मिल बाढ़ में डूब गई. वो कहते है, "बाढ़ से एक दिन पहले मैंने साठ गरीबों को खाना खिलाया था. और बाढ़ के बाद मैं रास्ते पर खड़ा खाना मांग रहा था.बाढ़ ने अमीर और ग़रीब का फर्क मिटा दिया है".

मल्लिकरून की मिल के सामने ही फ्लॉवर मार्केट और मेन मंडी के इलाके में बड़ी दुकानों की क़तार है जिसमें रखा करोड़ों रुपये का अनाज और दूसरा सामान पानी में भीग कर ऐसा बर्बाद हुआ कि कुछ न बच सका और सब कुछ फ़ेंक देना पड़ा.

जिन व्यापारियों ने तुअर दाल की किल्लत बताकर उसे अस्सी रुपये प्रति किलोग्राम बेचने की योजना बनाई उन व्यापारियों को कई टन दाल फ़ेंक देनी पड़ी.

लेकन कुछ लालची लोगों ने इस तबाही से सबक सीखने की बजाय इससे भी लाभ उठाने की कोशिश की. जब लोग दाने दाने को तरस रहे थे, तब बच जाने वाले दुकानदार, तीस रुपये प्रति किलो वाला चावल एक सौ रुपये प्रति किल से बेच रहे थे.

Image caption नदियों के तट पर अभी भी कचरा पड़ा है जिसकी सुध किसी को नहीं.

ये कैसी राहत

स्थिति अब भी ख़राब है. लोग कहते हैं कि शहर से गंदगी और मलबा साफ़ हो जाए लेकिन कहना मुश्किल है कि बिजली और पानी की आपूर्ति कब तक सामान्य हो सकेगी.

बाढ़ पीड़ित लोग प्रशासन से जितने नाखुश हैं उतने ही उन गैर सरकारी, सामाजिक और दूसरी संस्थानों से खुश हैं जिन्होंने मुसीबत की इस घड़ी में उन्हें खाना और पानी उपलब्ध करवाया.

हालाँकि सरकार ने बाढ़ पीड़ित परिवारों की सहायता करने की शरुआत की है लेकिन एक अजीब ढंग से. 57 वर्षीय फातिमा बी बताती हैं, "सरकार हमें 20 किलो चावल और पांच लीटर केरोसिन तेल दे रही है. मैं इसे कहाँ रखूँ. उस का क्या करूं जब मेरा घर ही नहीं बचा.’’ कुछ यही हाल सारे बाढ़ पीड़ितों का है.

अभी भी घनी आबादी वाले इलाक़ों में सफ़ाई का काम नहीं हो पा रहा है क्योंकि सड़कें तंग हैं. लेकिन इससे भी ख़राब हालत कुरनूल ज़िले का है जहां कुरनूल शहर की तरह राहत सामग्री तक नहीं पहुंच रही है. ज़िले में सौ से ज्यादा गांव हैं जिस पर किसी का ध्यान नहीं है.

हालांकि सरकार ने अब बाढ़ पीड़ितों के लिए क़रीब एक लाख नए घर बनाने की घोषणा की है जिससे शायद पीड़ितों को कुछ उम्मीद बंधी है.

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