कश्मीर में हिंसा घटने का असर

कश्मीर
Image caption कश्मीर में लंबे समय तक हिंसा का साया रहा है

मनोचिकित्सकों का कहना है कि भारत प्रशासित कश्मीर में सुरक्षा की स्थिति में सुधार आने के बाद से 'पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर' यानी युद्धजनित मानसिक सदमे के बाद के अवसाद के शिकार लोगों की संख्या में काफ़ी कमी आई है.

दो दशक पहले जब कश्मीर घाटी में हथियारबंद संघर्ष की शुरुआत हुई थी उसके बाद से वहाँ 'पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर' (पीटीएसडी) ने एक तरह से महामारी का रुप ले लिया था.

हालांकि घाटी में मनोरोगियों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है लेकिन उन्हें पीटीएसडी नहीं है.

एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक डॉ अर्शिद हुसैन का कहना है कि श्रीनगर के मनोचिकित्सालय में हर दिन पीटीएसडी के 25 से 40 रोगी आ रहे थे.

उनका कहना है कि छह साल पहले एक सर्वेक्षण से पता चला था कि घाटी में रहने वाले लोगों में से 17 प्रतिशत लोग पीटीएसडी का शिकार थे.

डॉ हुसैन का कहना है कि इसके बाद से पीटीएसडी के शिकार लोगों की संख्या में लगातार कमी आई है. वे कहते हैं, "आज हम मुश्किल से पीटीएसडी का एक नया मामला देखते हैं."

अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कश्मीर घाटी में एक समय हिंसक घटनाएँ प्रतिवर्ष छह हज़ार तक जा पहुँची थीं जो अब घटकर चार सौ ही रह गई हैं.

डॉ हुसैन का कहना है कि चूंकि सदमें की घटना में कमी आई है इसलिए पीटीएसडी के शिकार लोगों की संख्या में भी कमी आई है.

श्रीनगर के मनोचिकित्सालय में अधीक्षक डॉ हमीदुल्ला शाह का कहना है कि घाटी में मनोरोगियों की संख्या में कमी नहीं आई है बल्कि उनकी संख्या एक तरह से बढ़ी ही है लेकिन उन्हें पीटीएसडी के अलावा दूसरी समस्याएँ हैं.

वे कश्मीर में मनोरोग चिकित्सक के पास बढ़ी भीड़ को समाज में आई जागरुकता से भी जोड़कर देखते हैं.

वो कहते हैं, "पहले भी लोगों को दिल की धड़कन बढ़ने, पीठ में दर्द और बेचैनी जैसी समस्याएँ होती थीं लेकिन लोग पहले फ़ेथ हीलर के पास जाते थे फिर जनरल फ़ीज़िशियन के पास, फिर न्यूरोलॉजिस्ट के पास और तब कहीं जाकर आख़िर में मनोचिकित्सक की बारी आती थी."

'मनोरोग अभी भी समस्या'

डॉ अर्शिद हुसैन का कहना है कि हालांकि कश्मीर में पीटीएसडी के शिकार लोगों की संख्या में कमी आई है लेकिन मनोरोगियों के मामले में कश्मीर की स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है.

उनका कहना है कि घाटी में नशीली दवा लेने और आत्महत्याओं के मामले बढ़े हैं.

एक प्रमुख समाज विज्ञानी डॉ बशीर अहमद डाबला कहते हैं कि 15 से 40 वर्ष की उम्र के कश्मीरियों में से एक तिहाई नशीली दवा लेने के आदी हैं.

उन्होंने कहा, "हमने एक पीढ़ी को हिंसा में गँवा दिया और अब दूसरी पीढ़ी को नशीली दवा की वजह से गवाँ रहे हैं."

डॉ अर्शिद का कहना है कि जिस तरह से आत्महत्याओं के मामले सामने आ रहे हैं, उससे ज़ाहिर है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्या की ओर हमने ठीक तरह से ध्यान नहीं दिया.

डॉ डाबला का कहना है कि इसका मतलब यह भी है कि बुज़ुर्गों ने युवाओं को कश्मीर की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं से परिचित नहीं करवाया.

लेकिन समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक दोनों का कहना है कि कश्मीर में मानसिक समस्याओं की हिंसा के अलावा कई वजहें हैं.

उनका कहना है कि समस्याएँ तो पूरी दुनिया में बढ़ रही हैं और कश्मीर न्यूयॉर्क से अलग नहीं हैं.

वे जो कारण बताते हैं, उनमें संयुक्त परिवार का टूटना, बढ़ता शहरीकरण और बढ़ती धर्मनिरपेक्षता या धर्म के प्रति घटती आस्था भी है.

जब घाटी में पीटीएसडी की संख्या बढ़ी थी तब वहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ अच्छी नहीं थीं लेकिन अब वहाँ सुविधाएँ बेहतर हैं.

इस बीच एक अंतरराष्ट्रीय संस्था डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने भी पीटीएसडी और दूसरे मनोरोगों से निपटने के लिए सहायता की पहल की है.

वे मनोरोगों के प्रति जागरुकता पैदा करने के लिए रेडियो कार्यक्रम चला रहे हैं और उन्होंने घाटी में मनोरोगियों को सलाह देने के लिए 16 केंद्र खोले हैं.

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