लापता होते बच्चों की तलाश पर सवाल

लापता बच्चे के पिता सुमन झा
Image caption पिछले साल सिर्फ़ दिल्ली से दो हज़ार से अधिक बच्चे ग़ायब हो गए हैं

दिल्ली के यमुना बाज़ार मे घाट नंबर-6 पर रहने वाले सुमन कुमार झा और उनकी पत्नी प्रोमिला देवी का तीन साल का बेटा 17 सितंबर से ग़ायब है, हमारी मुलाक़ात उनसे 21 सितबंर को हुई.

अपने बच्चे की तलाश मे उन्होने रात दिन एक कर दिया है, पर बच्चे का कोई पता नही है. बच्चे की मां प्रोमिला देवी का बुरा हाल है, अव्वल तो उसे नींद आती नही और आती भी है तो चौंक कर उठ बैठती है.

इनके बच्चे की तलाश मे पुलिस की भूमिका क्या रही होगी… भारत में इसके लिए दिमाग़ पर बहुत अधिक ज़ोर देने की ज़रुरत नहीं पड़ती है.

पुलिस ने सुमनकुमार झा के बच्चे के ग़ायब होने की शिकायत लिखने मे तीन दिन लगा दिए, कई दिन तो उसे सुबह बुला लिया गया और रात तक बैठा कर अगले दिन फिर आने के लिए कह कर वापस भेज दिया.

21 सितंबर को उन्हे पुलिस ने कहा था कि वो 10 बजे उसके घर पर पहुंच कर आस-पास पूछताछ करेगी, लेकिन हम दिन मे दो बजे तक उनके घर पर थे और पुलिस का कोई अता-पता नही था. हमने सुमन कुमार झा को अपने साथ लिया और कश्मीरीगेट थाने पहुंच गए जंहा ये मामला दर्ज है.

पता चला की जो साहब इस मामले की तफ़्तीश कर रहे हैं वो किसी पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल गए हैं. अगले कई दिनों तक हमने उनसे मिलने की कोशीश की, पर कभी वो किसी एक्सीडेंट की कॉल पर थे तो कभी किसी और वजह से थाने से बाहर.

अदालत की फटकार

पिछले एक साल मे दिल्ली मे दो हज़ार से ज़्यादा बच्चे ग़ायब हुए, जिन्हे कभी तलाश नही किया जा सका. ये सभी बच्चे बेहद ग़रीब परिवारों से हैं.

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया था. हाल ही में हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई थी कि वो सिर्फ़ अमीरों के बच्चे तलाश करती है.

लेकिन अदालत की फटकार का असर कितना है ये हमने सुमन कुमार झा के मामले मे देखा.

दिल्ली हाईकोर्ट ने वरिष्ठ वकील एचएस फुलका को इस मामले मे मदद के लिए नियुक्त किया. फुलका ने अदालत को अपनी एक रिपोर्ट दी है, इस रिपोर्ट में उन्होने अदालत को उन मां-बाप के अनुभव बताए हैं जिनके बच्चे ग़ायब हुए हैं.

फुलका कहते हैं की पुलिस आमतौर पर इन मामलों को दर्ज ही नही करती और दर्ज करती भी है तो उस पर कार्रावाई तो कभी नही होती.

सुझाव

इसका कारण बताते हुए उन्होने अदालत को बताया है की ये मां-बाप बेहद ग़रीब हैं और इनके लिए ये संभव नही है कि वो अपने बच्चे की तलाश मे जुटे रहें, ऐसा करने का मतलब होगा कि वो अपनी रोज़ी रोटी से हाथ धो बैठेंगे.

Image caption मां की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं लेते

एचएस फुलका ने अपनी रिपोर्ट मे अदालत को सुझाव दिया है कि गुमशुदा बच्चों के मामले मे ऐसे परिवार को जिनका बच्चा ग़ायब हुआ है को तुरंत क़ानूनी मदद उपलब्ध कराई जानी चाहिए.

वो कहते हैं की ऐसे मामले मे तुरंत एक वकील नियुक्त किया जाना चाहिए जो पुलिस की कार्रावाई पर नज़र रखे और जांच के बारे मे अदालत को जानकारी दे.

ऐसा नही है की गुमशुदा बच्चों के मामले मे अदालत ने पहली बार हस्तक्षेप किया है. 2002 मे सर्वोच्च न्यायालय ने गुमशुदा बच्चों की तलाश के लिए पुलिस को कुछ दिशानिर्देश दिए थे. लेकिन इन निर्देशों को किसी राज्य की पुलिस ने लागू किया है, ऐसा कोई सबूत नही मिलता.

संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव मे 2007 मे भारत में बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित किया गया था. इस आयोग ने गुमशुदा बच्चों के मामले मे राज्य सरकारों को कई सुझाव और निर्देश भेजे थे.

इन निर्देशों में से एक गुम होने वाले हर बच्चे की एफआईआर तुरंत दर्ज की जाने के संदर्भ में था. लेकिन सच्चाई ये है की आंध्रप्रदेश को छोड़ कर किसी भी राज्य सरकार ने आयोग की बात नही मानी है.

माफ़िया सरगर्म

आयोग की सदस्य संध्या बजाज कहती हैं कि गुमशुदा बच्चों की जो कुल तादाद बताई जाती है, असली तादाद उससे कई गुना ज़्यादा हो सकती है. वो कहती हैं कि बाल तस्करी में लगे माफ़िया ग़रीब लोगों की बस्तीयों पर नज़र रखते हैं और यंहा से बच्चे चुराते हैं.

उनके अनुसार बाल श्रम, अंग तस्करी और वेश्यावृति के लिए बच्चों को चोरी किया जाता है. इस आयोग के कई दावे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि आयोग बेबस नज़र आता है.

संध्या बजाज कहती हैं की भारत में पुलिस गुमशुदा बच्चों की तलाश के लिए ना तो संवेदनशील बनाई गई है और ना ही उसको वो साधन दिए गए हैं जिनसे वो बच्चों की तलाश को अपनी प्राथमिकता बनाएं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट कहती है की 80 प्रतिशत पुलिस वाले ग़ायब होने वाले बच्चों की तलाश में कोई रुचि नही दिखाते.

राष्ट्रीय मानावधिकार आयोग के अनुसार भारत में हर साल लगभग 45 हज़ार बच्चे ग़ायब होते हैं और इनमें से 11 हज़ार बच्चे कभी नही मिलते.

बचपन बचाओ आंदोलन के कैलाश सत्यार्थी कहते हैं की जो बच्चे ग़ायब हो रहे हैं इन्हे गुमशुदा बच्चे कहना सही नही है, ये गुम नहीं होते बल्की इनको चुराया जाता है. वो बताते हैं की मानव तस्करी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अवैध व्यापार है.

Image caption सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोल से जुड़े हैं

कैलाश सत्यार्थी मानावधिकार आयोग के आंकड़ों को लेकर कहते हैं की ये पुराने हैं, और दूसरी बात बच्चे गुम होने के ज़्यादातर मामले दर्ज ही नही होते इसलिए वो गिनती में ही नहीं आते. उनके अनुसार ये आंकड़ा जितना दिया जाता है उसे छे-सात गुना ज़्यादा हो सकता है.

बड़े क़दम

भारत मे बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए काग़जों पर कई बड़े क़दम उठाए गए हैं. इनमे से एक और बड़ा क़दम था तीन साल पहले क़ानून बना कर बालश्रम पर रोक लगाना.

लेकिन तीन साल बीतने के बाद भी इस क़ानून का कोई असर नज़र नही आता है. इस क़ानून के बनने के बाद सिंधु परियोजना नाम से ऐसे बच्चों के पुनर्वास लिए प्रवाधान रखा गया था जो बालमजदूरी मे फंसे है.

लेकिन सूचना के अधिकार क़ानून के तहत कुछ गैर सरकारी संगठनों ने जानकारी हासिल की है की पिछले दो साल मे एक भी बच्चे का पुनर्वास नही किया गया.

ग़ायब होने वाले बच्चों के मामले को प्रशासन कितनी गंभीरता से लेता है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की गायब हुए बच्चों की संख्या को लेकर एक आयोग कुछ कहता है तो, दूसरा कुछ और... हां एक बात पर सब सहमत है की जितनी संख्या बताई जाती है असल तादाद उससे कई गुना ज़्यादा है.

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