तक़दीर में पानी नहीं तो तेल

बारमेड़ तेल कारख़ाना
Image caption राजस्थान के तेल से देश की 20 प्रतिशत ज़रूरत पूरी होगी.

राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर ज़िले में तेल की खोज और उत्पादन ने इस विकट मरुस्थल की तक़दीर में खुशहाली का पन्ना जोड़ दिया है.

बाड़मेर का मंगला तेल क्षेत्र जल्द ही भारत की घरेलू ज़रूरतों का 20 फ़ीसद तेल पैदा करने लगेगा जब वहां तेल उत्पादन अपनी पूरी क्षमता पर होगा.

मंगला के तेल कुएँ से निकले तेल की पहली खेप परिशोधन के लिए रिफाइनरी पहुँच गई है. यहाँ केयर्न इंडिया कंपनी के कुएँ से गत 29 अगस्त के दिन तेल का उत्पादन शुरू हुआ था.

बाड़मेर के मंगला, ऐश्वरिया और भाग्यम से हर रोज़ जल्द ही 175,000 यानी पौने दो लाख बैरल तेल मिलने लगेगा.

ये भारत के तेल और प्राकृतिक गैस आयोग और केयर्न इंडिया का साझा उपक्रम है. इसे गत दो दशक में भारत में तेल की सबसे बड़ी खोज में शामिल किया गया है.

केयर्न इंडिया ने बाड़मेर बेसिन में तेल की खोज की है. इस कंपनी का मानना है की तेल के लिहाज़ से ये क्षेत्र बहुत उपयोगी है. वहां तेल निकलने से रेगिस्तान में आर्थिक गतिविधिओं की बहार आ गई है और हज़ारो हाथो को काम मिल रहा है.

इस दुर्गम रेगिस्तान में सालों तक भारी मशीनों ने धरती को भेदा. मगर जब मंगला में धरती का सीना चाक करने के बाद तेल की धरा फूटी तो जैसे मरुस्थल ख़ुद गा उठा कि जय हो.

केयर्न इंडिया कंपनी ने अपने इस राजस्थान प्रॉजेक्ट के लिए हाल में कोई 1.6 अरब डॉलर की वित्तीय व्यवस्था की है.

बदली तस्वीर

यहाँ बालू के उठते बवंडर के बीच इंसान सदियों तक पानी की रजत बुँदे तलाशता भटकता रहा है. अब तस्वीर बदली है.

सीमा रोयल इस तेल कंपनी में इंजिनियर हैं और वो ख़ुद मरुस्थल की बेटी हैं. कहने लगीं, "पानी नहीं तो क्या, अब हमारे पास तेल है. अगर आपके पास आर्थिक संसाधन हो तो पानी का प्रबंध किया जा सकता है. हम इसी इलाक़े के है. जब स्थानीय लोग हमें काम करते देखते हैं तो बहुत ख़ुश होते है कि ये सब अपने ही लोग हैं."

अचानक आई आर्थिक प्रगति कई बार बाहरी और स्थानीय लोगों में द्वंद्व भी पैदा करती है. पिछले दिनों बाड़मेर में स्थानीय और बाहरी मज़दूरों के बीच झड़पें हुई थी.

मगर सीमा कहती है, ऐसा नहीं है, "कंपनी के स्थानीय लोगों से रिश्ते बहुत अच्छे है. हम ख़ुद गाँव-गाँव जाकर लोगों से मिलते हैं और मदद करते है."

नमिता गोदारा ने जब आँख खोली तो चारों तरफ़ रेगिस्तान का समंदर था. अब वह इंजिनियर हैं और तेल उत्पादन से जुड़ी हैं. नमिता कहती हैं, "इस खोज ने रेगिस्तान की तस्वीर को संवार दिया है. हम यहाँ के स्कूलों में जाते है. बच्चों की मदद करते हैं, उन्हें कंप्यूटर सिखाते हैं और ज़रूरत हो तो कंपनी की ओर से उन्हें कंप्यूटर उपलब्ध भी कराते है."

मंगला में हर रोज़ जब तेल कुओं से बाहर आता है तो उसके परिवहन के लिए भरी वाहनों की क़तार आ खड़ी होती है. हर रोज़ कोई एक सौ ट्रक टैंकर इस तेल को लेकर कांडला बंदरगाह के लिए कूच करते हैं.

यहीं अपने ट्रक के साथ खड़े भवानी सिंह शेखावत कहते है, "इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा बल मिला है."

बाड़मेर के ट्रक चालक जगदीश कहते है, "क्या ट्रक, हर तरह के वाहनों को काम मिला है. पहले सूखे के समय हमें रोज़गार के लिए गुजरात जाना पड़ता था. अब यहीं इफ़रात में काम मौजूद है."

रोज़गार के अवसर

Image caption इसमें अरबों डॉलर का ख़र्च आया है

केयर्न कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम के साथ मिलकर बाड़मेर में एक उद्यमिता केंद्र शुरू किया और कई हज़ार स्थानीय लोगों को तकनीक का हुनर सिखाया है. अब स्थानीय लोग वहाँ मोटर मैकेनिक, कंप्यूटर, मोबाइल रिपेयरर का काम सीख रहे है.

रविभान सिंह का गांव भारत पाक सीमा के निकट है. उसने इस केंद्र से मोबाइल ठीक करने का हुनर सीखा है. रवि का कहना है, "पहले मैं एक सौ रूपए कमाता था. अब कोई एक हज़ार रूपए कमा लेता हूँ. मुझे देख कर आस-पास के गावों के युवक आने लगे थे. पहले हर साल सूखे के कारण रोज़गार की बड़ी क़िल्लत थी. अब रोज़गार ख़ुद उनकी देहरी पर आ रहा है."

इस केंद्र से जुड़े अश्वनी सक्सेना कहते है, "हमारा मक़सद स्थानीय लोगों को तकनीक का हुनर सिखाकर पैरों पर खड़ा करने का है. अब तक हम पांच हज़ार लोगों को प्रशिक्षित कर चुके हैं और उनमे से 80 प्रतिशत को रोज़गार के लिहाज से सबल बना चुके है.

पहले बाड़मेर सूखे से अभिशप्त था और आँखे बारिश के लिए तरस जाती थी. अब वर्षा तो वैसे ही है, मगर समृद्धि बरस रही है. बाड़मेर में सितारा होटलों की श्रृंखला खड़ी हो गई है.

इस तेल से राज्य और केंद्र सरकार को कई करोड़ रूपए का राजस्व मिलेगा. भूमि का भूगोल कभी इस रेगिस्तान की ज़िंदगी पर भारी था तो इंसान लोक गीतों के सहारे सुख के सपने बुन कर काम चलाता रहा. अब तेल के साथ समृद्धि आई है तो हर तरफ़ तरक़्क़ी के तराने गूंजने लगे हैं.

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