अरुणाचल पर चीन के रुख़ पर आपत्ति

अरुणाचल प्रदेश के लोगों को भारत समर्थित माना जाता है
Image caption अरुणाचल प्रदेश के लोगों को भारत समर्थित माना जाता है

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सरकारों, राजनीतिक दलों और आदिवासी संगठनों ने अरुणाचल प्रदेश पर चीन के ताज़ा दावों पर कड़ी आपत्ति जताई है.

कुछ संगठनों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि चीन के किसी संभावित हमले के हालात में मुक़ाबला करने के लिए स्थानीय तौर पर कुछ प्रतिरोधी दस्ते गठित किए जाने चाहिए.

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोर्जी खांडू के नेतृत्व में राज्य के एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल चीन के दावों का विरोध करने के लिए 19 अक्तूबर को प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से मुलाक़ात करने जा रहा है.

मुख्यमंत्री ने राजदानी एटानगर में पत्रकारों से कहा, "हम चाहते हैं कि भारत सरकार अपनी तमाम क्षमताओं और अधिकारों के साथ चीन के दावों का जवाब दे. हम भारतीय हैं और हमारा प्रदेश भारत का अटूट और अभिन्न अंग है. चीन को इस वास्तविकता को समझना और स्वीकार करना होगा और उसे हमारे मामलों में अपनी नाक घुसाने की हरकतों से बाज़ आना होगा."

चीन के दावों को चुनौती देने के अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी नेताओं के इस आहवान को विपक्षी राजनीतिज्ञों और आदिवासी संगठनों का भी समर्थन हासिल है.

पूर्वोत्तर क्षेत्र के अनेक राज्यों में अनेक वर्षों से विद्रोही गतिविधियाँ जारी हैं लेकिन अरुणाचल प्रदेश में आमतौर पर शांति रही है और वहाँ रहने वाले आदिवासी लोग भारत के प्रति वफ़ादार समझे जाते हैं.

लड़ाका दस्ता

अरुणाचल प्रदेश से एक कांग्रेस सांसद ताकम संजय ने भारत सरकार से अपील की है कि ऐसे हालात में स्थानी आदिवासियों का एक लड़ाका दस्ता बनाया जाए जिसका नाम अरुणाचल स्काउट्स रखा जाए, जिस तरह कि 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की मदद के लिए लद्दाख़ स्काउट्स बनाया गया था.

ताकम संजय ने पत्रकारों से कहा, "हमारे हज़ारों पुरुष और महिलाओं इस लड़ाका दस्ते में शामिल होने के लिए तैयार हैं और अगर चीन का कोई हमला हुआ तो भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मोर्चे पर लड़ेंगे. हम अपने पूर्वजों की ज़मीन की रक्षा करने के लिए लड़ने को पूरी तरह तैयार हैं. चीन ने तिब्बत पर अपना क़ब्ज़ा कर रखा है और अब वो हम पर भी ऐसा ही करने की जुगत में लगा है. हम कभी भी चीन का हिस्सा नहीं रहे हैं और ना ही कभी ऐसा हो सकता है."

चीन की नदी यारलुंग ज़ांगपो भारत के असम में पहुँचने पर ब्रहमपुत्र नदी बन जाती है. चीन ने जब यारलुंग ज़ांगपो नदी पर पनबिजली परियोजना शुरू की थी तो असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने उस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी. हालाँकि चीन ने ऐसी किसी परियोजना से इनकार किया है जिससे ब्रहमपुत्र नदी में पानी के बहाव पर असर पड़ता हो.

तरुण गोगोई का अब कहना है, "भारत सरकार को इस नदी पर पनबिजली परियोजना को बंद करने के लिए अवश्य कहना चाहिए. साथ ही चीन से यह कहा जाना चाहिए कि वह अपने दक्षिणोत्तर हिस्से में पानी बहाव के रास्तों में बदलाव की परियोनजाएँ भी बंद करे. ऐसा नहीं किया गया तो इससे भारतीय नदियों में पानी के बहाव और उपलब्धता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा."

भारत और चीन सीमा के आरपार स्थित नदियों के पानी पर संस्थागत स्तर बातचीत के लिए विशेषज्ञों का एक दल वर्ष 2006 में गठित किया था.

असम में विपक्षी नेताओं ने तरुण गोगोई के रुख़ का समर्थन किया है लेकिन उनका यह भी आरोप है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने चीन के साथ इन विवादों पर समुचित सख़्त रुख़ नहीं अपनाया है.

असम में भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक कबींद्र पुराकायस्थ का कहना था, "हमारे देश के विदेश मंत्रालय के लोगों को वेबसाइटों पर संदेशबाज़ी करने से बाज़ आना चाहिए और चीन के साथ गंभीर क़िस्म की कूटनीति दिखानी चाहिए."

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