गवाह की संदिग्ध परिस्थिति में मौत

सुप्रीम कोर्ट
Image caption अगले महीने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाख़िल होनी थी

गाजियाबाद की डासना जेल में न्यायिक हिरासत में बंद अदालती कर्मचारी आशुतोष अस्थाना की शनिवार को संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से जजों के कथित भ्रष्टाचार का एक बड़ा और बहुचर्चित मामला कमज़ोर पड़ सकता है.

अस्थाना इस मामले में अभियुक्त होने के साथ साथ जजों के खिलाफ एक अहम गवाह भी थे. सीबीआई को इस मामले की अंतिम जांच रिपोर्ट अगले महीने सुप्रीम कोर्ट में देनी है और उससे पहले आशुतोष अस्थाना की इस तरह मौत हो गई.

समझा जा रहा है कि अस्थाना पर दबाव था कि वह अदालत में दिया अपना बयान वापस ले लें.

मौत हिरासत में हुई है, इसलिए जेल पोस्टमार्टम और मजिस्ट्रेटी जांच तो होगी ही, मगर उससे पहले जिस तरह पुलिस ने मौत का कारण लंबी बीमारी बताया उससे संदेह होता है कि शायद अस्थाना की मौत की सच्चाई आसानी से न पता चले.

गाजियाबाद जिला अस्पताल के डाक्टरों ने संभावना जताई है कि मौत का कारण ज़हर हो सकता है. उसके परिवार के लोगों का कहना है कि अस्थाना पहले से बीमार नही था. उन्हें भी शक है कि मौत के पीछे कोई साजिश हो सकती है.

'मौत संदिग्ध है'

मामले का भंडाफोड़ करने वाले वकील नाहर सिंह कहते हैं कि यह मौत संदिग्ध है और पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी.

नाहर सिंह की कानूनी लड़ाई और प्रबल जनमत के दबाव में ही सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सीबीआई जांच के लिए तैयार हुई थी.

इससे पहले मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने पुलिस को संदिग्ध जजों से पूछताछ की अनुमति देने से मना कर दिया था, जिससे न केवल उनकी बल्कि पूरी न्यायपालिका की किरकिरी हुई थी, क्योंकि कानूनन विवेचना के दौरान अदालत हस्तक्षेप नही कर सकती.

हाईकोर्ट की एक विभागीय सतर्कता जांच के बाद गाजियाबाद जिला अदालत की सतर्कता अधिकारी एवं विशेष न्यायाधीश रमा जैन ने 15 फरवरी, 2008 को कविनगर थाने में 43 अदालती कर्मचारियों और 39 बाहरी व्यक्तियों के खिलाफ जालसाज़ी से भविष्य निधि खाते से करोड़ों रुपए निकालकर ग़बन करने का मुकदमा दर्ज कराया था.

प्रारंभ में सात करोड़ रुपयों के घपले का अनुमान था, मगर बाद में रकम 23 करोड़ पंहुची. माना जाता है कि और भी जिलों में इस तरह के घपले हुए होंगे जिनका पता चलना बाक़ी है.

पुलिस ने लगभग सभी 80 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उस समय पुलिस के हाथ पैर फूल गए जब मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना ने 28 अप्रैल को कोर्ट में अपने क़लमबंद बयान में कहा कि वास्तव में जिला अदालत के जजों ने ही फ़र्ज़ी तरीके से भविष्य निधि खातों से यह धन निकलवाया.

उन्होंने इस बात के दस्तावेज़ी सबूत भी दिए कि यह पैसा कब कब किस किस रूप में नक़द, सामान अथवा खर्च के तौर पर किन किन जज साहिबान को दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला अदालतों के लगभग तीन दर्जन जजों के नाम इस घोटाले में उजागर हुए.

अब तक का सबसे बड़ा मामला

न्यायपालिका के इतिहास में इतना बड़ा और सुनियोजित भ्रष्टाचार पहली बार उजागर हुआ. साथ ही इससे सार्वजनिक धन के लेखा जोखा रखने वाले एजी आफिस की कमजोरी और अव्यवस्था भी सामने आई. बार एसोसियेशन ने मामले की सीबीआई जांच का दबाव बनाना शुरू किया. पर राज्य सरकार ने इसकी संस्तुति नही की. हाईकोर्ट ने भी सीबीआई जांच की मांग नामंज़ूर करते हुए पुलिस को तफ्तीश करने को कहा.

लेकिन तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक दीपक रतन ने एहतियात बरतते हुए, जजों से पूछताछ के लिए मुख्य न्यायाधीश से अनुमति मांगी और मुख्य न्यायाधीश ने अपने कानूनी दायरे से बाहर जाकर पुलिस से संभावित सवालों की सूची मांगी. इसको लेकर काफी आलोचना हुई कि न्यायपालिका अपने अन्दर भ्रष्टाचार के मामलों में दोहरा मानदंड अपना रही है.

अंततः गाजियाबाद बार एसोशियेशन की याचिका पर सीबीआई जांच का आदेश हुआ. सीबीआई ने कुछ संदिग्ध जजों से पूछताछ की है और दो अंतरिम रिपोर्ट दी हैं. मगर अभी तक न तो किसी संदिग्ध जज के खिलाफ कोई विभागीय कार्यवाही हुई और न ही उन्हें न्यायिक कार्यों से अलग किया गया.

गबन और भ्रष्टाचार के आपराधिक मामले में सीबीआई की अंतिम रिपोर्ट का इंतज़ार है. मगर एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि आशुतोष की मौत से मामला कमजोर हो सकता है.

कानूनी दृष्टि से आपराधिक मामला भले कमजोर हो जाए, मगर नैतिक दृष्टि से वे जज हमेशा संदेह के घेरे में रहेंगे, जिनके घपलों का भंडाफोड़ अस्थाना ने किया था.

मामले की जांच में अड़ंगा डालने वालों, उचित कार्यवाही न करने और उसे तार्किक परिणति तक जाने से रोकने वालों की भूमिका भी न्यायिक एवं प्रशासनिक इतिहास में याद की जाएगी. शायद इस मामले से सबक लेकर आगे कुछ ऐसे कानूनी बंदोबस्त हों जिससे जजों का आचरण और व्यवहार संदेह से परे रखने में कामयाबी मिले.

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