'आसियान' के लिए प्रधानमंत्री रवाना

मनमोहन सिंह वेन जियाबाओ से भी मिलेंगे भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दक्षिणपूर्व एशियाई राष्ट्रों के संघ यानी आसियान की बैठक में भाग लेने के लिए थाईलैंड रवाना हो गए है.

इस दौरान प्रधानमंत्री की आसियान देशों से वैश्विक आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्त्तन जैसे मुद्दों पर बातचीत होगी.

मनमोहन सिंह आसियान के साथ पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के समूह की बैठक में भी भाग लेंगें.

भारत ने आसियान के साथ इस साल अगस्त में अड़तीस अरब डॉलर के मुक्त व्यापार सहमति पर हस्ताक्षर किए थे. इस यात्रा के दौरान अब उसे दोगुना करने की कोशिश की जाएगी.

दोनों पक्ष सेवाओं और निवेश के क्षेत्र में भी मुक्त व्यापार सहमति करने पर बातचीत कर रहे है.

इन दोनों ही बैठकों में वैश्विक आर्थिक मंदी, आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर भी बातचीत होगी.

वेन जियाबाओ से मुलाक़ात

इस यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री चीन के प्रधानमंत्री वेन ज़िया बाओ से भी मुलाकात करेंगें.

माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों देश अरुणाचल प्रदेश और वाणिज्य जैसे मुद्दो पर बातचीत करेंगें.

अरुणाचल प्रदेश पर चीन की तीखी बयानबाज़ी और बौध धर्मगुरु दलाई लामा की तंवाग यात्रा को लेकर दोनों देशों के बीच कड़वाहट जगज़ाहिर हो चुकी है.

भारत और चीन के बीच विशवास फिर से बहाल करने के लिए इसी साल हॉट लाइन स्थापित करने पर भी फैसला लिया गया था.

माना जा रहा है कि इन नेताओं की मुलाकात के दौरान बातचीत को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की जाएगी.

जवाहरलाल विश्वविद्यालय में चीन मामलों के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडपल्ली का कहना है कि तनाव कम करने के लिए दोनों देशों के नेता हॉटलाइन का इस्तेमाल कर सकते हैं.

प्रोफेसर श्रीकांत कोंडपल्ली का ये भी कहना है कि "भारत और चीन, दोनों देशों के बीच होनेवाले 52 अरब डॉलर के वाणिज्य के और ज़्यादा विकास और आतंकवाद निरोधक लड़ाई में अपनी और बड़ी भूमिका पर भी बातचीत कर सकते हैं."

विधानसभा चुनाव के दौरान हाल ही में मनमोहन सिंह के अरुणाचल प्रदेश दौरे पर चीन ने कई सवाल खड़े किए थे. इस पर भारत का कहना था कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है.

भारत ने चीन को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में चल रही चीनी योजनाओं को भी बंद करने को कहा था.

बौद्व धर्म गुरु दलाई लामा की यात्रा पर भी भारत कह चुका है कि वह देश में कहीं भी आ जा सकते हैं.

जानकारों की राय में दोनो देशों के बीच इस मुद्दे पर तल्ख़ी कम होना मुशिकल है लेकिन तमाम गतिरोधों के बावजूद जलवायु परिवर्त्तन पर दुनिया की उभरती हुई ये दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक हैं और दोनो का मानना है कि अमरीका उन्हें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर किसी प्रकार की क़ानूनी बाध्यता में नहीं बांध सकता क्योंकि उन्होंने हाल ही में औद्योगिक विकास करना शुरु किया है.

चीन और भारत, दोनों का ही कहना है कि उनकी तुलना अमरीका से नहीं की जा सकती क्योंकि वंहा तो 19वीं शताब्दी में ही औद्योगीकरण शुरु हो गया था.

इस मुद्दे पर साथ मिलकर काम करने के लिए भारत और चीन एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर भी कर चुके है.

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