हुड्डा ने आपसी फूट को दोष दिया

भूपेन्द्र सिंह हुड्डा
Image caption हुड्डा ने भारी बहुमत की उम्मीदों के साथ समय से पहले विधानसभा चुनाव करवाने का फ़ैसला किया था

हरियाणा मे दूसरी बार मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद सोमवार को चंढीगड़ मे पत्रकारों से बात करते हुए भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने पार्टी के नेताओं की आपसी फूट को कांग्रेस के कमज़ोर प्रदर्शन के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.

उनका कहना था की पार्टी के कुछ नेताओं ने चुनाव मे पार्टी का साथ नहीं दिया. इसके अलावा उन्होंने कहा कि टिकट वितरण सही नहीं होना भी एक कारण पाया गया है जिसके चलते पार्टी को आशानुरुप सफलता नहीं मिली.

2004 मे जब कांग्रेस पार्टी ने भजनलाल के नेतृत्व मे चुनाव लड़ा था तो उसे 67 सीटें हासिल हुई थीं, उस समय पार्टी हाईकमान ने भजनलाल को मुख्यमंत्री न बना कर ये ज़िम्मेदारी भूपेन्द्रसिह हुड्डा को दी. इसके बाद भजनलाल ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी अलग जनहित कांग्रेस का गठन किया.

लोकसभा चुनावों मे कांग्रेस ने 10 मे 9 सीटें जीतीं और इस नतीज़े से उत्साहित भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने पार्टी हाईकमान को राज्य मे तय समय से 6 महीने पहले ही चुनाव करा लेने की सलाह दी थी.

विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने आक्रमक प्रचार किया लेकिन परिणाम उसकी उम्मीद से कहीं कम आए. वो राज्य में 90 मे से सिर्फ़ 40 सीटें जीत पाई और अब वो सरकार चलाने के लिए निर्दलीय विधायकों पर आश्रित है. कांग्रेस का ये कमज़ोर प्रदर्शन एसे समय मे आया है जब राज्य में विपक्ष पूरी तरह से बिखरा पड़ा था.

भूपेन्द्रसिंह हुड्डा ने राज्य मे एक स्थिर सरकार देने का वादा तो किया है पर जानकार मानते हैं की उनके इस दावे में कोई ख़ास दम नही है.

उधर पूर्व मुख्यमंत्री औमप्रकाश चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल ने राज्य में ज़बरदस्त वापसी की है. लोकसभा चुनाव मे ये पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी, पर इस चुनाव मे उसने 31 सीटें जीतीं.

चौटाला ने बीबीसी से बात करते हुए कहा की राज्य मे जनादेश कांग्रेस के ख़िलाफ़ है. उन्होने कहा है की निर्दलीय विधायकों की ये ज़िम्मेदारी है कि वो राज्य मे गै़र कांग्रेसी सरकार के गठन मे मदद करें.

उधर भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने उनके दावे को ख़ारिज करते हुए कहा है की चौटाला को जनता ने विपक्ष की ज़िम्मेदारी दी है और उन्हे रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए.

राज्य में विधानसभा चुनाव परिणामों के तात्कालिक असर देखने की कोशिश की जाए तो दो बातें साफ़ नज़र आती हैं, कि मुख्यमंत्री हुड्डा कमज़ोर हुए हैं और उनके नेतृत्व पर लगातार तलवार लटकी रहेगी, और दूसरी की राज्य में एक बार फिर आयाराम-गयाराम राजनीति का दौर यानी अस्थिरता का दौर बना रह सकता है.

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