राजघरानों की क़ीमती वस्तुओं की प्रदर्शनी

राजघरानों की क़ीमती वस्तुओं की प्रदर्शनी
Image caption इस प्रदर्शनी में 18 वीं से 20वीं सदी के मध्य तक राजघरानों के स्वर्णिम काल को प्रदर्शित किया गया है.

जब राजघरानों की भव्यता की बात हो रही हो तो अपने उत्कर्ष के दिनों में भारत के राजघरानों की भव्यता की बराबरी दुनिया की गिने-चुने राजघराने ही कर सकते हैं.

इन दिन लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम में भारत के राजघरानों के वस्तुओं की एक प्रदर्शनी चल रही है.

इस प्रदर्शनी में 250 दुर्लभ चीज़ों को प्रदर्शित किया गया है, जिसमें राजमुकुट है, रत्नजड़ित हथियार हैं और असली हाथी के आकार का एक रत्नजड़ित हाथी का मॉडल भी है.

आयोजकों का कहना है कि ''महाराजा : भारत के राजदरबारों की भव्यता'' नाम की इस प्रदर्शनी में पहली बार राजशाही और उनकी मूल्यवान संस्कृति को इतने व्यापक रुप से दिखाया गया है.

इस प्रदर्शनी में 18 वीं सदी की शुरुआत से 20वीं सदी के मध्य तक राजघरानों के स्वर्णिम काल को प्रदर्शित किया गया है.

उनमें से बहुत सी वस्तुएँ राजघरानों से प्रदर्शनी के लिए मांग कर लाई गई हैं.

भव्य प्रदर्शनी

इस प्रदर्शनी का उद्देश्य महाराजाओं के वैभवपूर्ण और कई बार आडंबरपूर्ण जीवनशैली को दिखाना है जो ब्रिटिश राज की समाप्ति तक अस्तित्व में था.

म्यूज़ियम के निदेशक मार्क जोन्स का कहना है, "महाराजाओं के दरबार के इस खज़ाने को इससे पहले कभी प्रदर्शित नहीं किया गया था."

उन्होंने बताया कि इनमें से कई चीज़ें पहली बार भारत से बाहर लाकर विक्टोरिया और अलबर्ट म्यूज़ियम में प्रदर्शित की गई हैं.

उन्होंने कहा, "इस प्रदर्शनी से ज़ाहिर होता है कि महाराजा भारत में और पश्चिम में कला के कितने बड़े संरक्षक थे और यह 18 वीं सदी से ब्रिटिश राज की समाप्ति तक उनके जीवनशैली में परिवर्तन की कहानी भी बताती है."

प्रदर्शित की गई चीज़ों में सबसे आकर्षक है पटियाला का शाही हार. यह हार 1928 में बनकर पूरा हुआ था और मूल रुप से इसमें 2930 हीरे जड़े हुए थे.

यह प्रदर्शनी कई हिस्सों में बँटी हुई हैं.

पहले हिस्से में राजशाही की सामग्रियों को प्रदर्शित किया गया है. इसके बाद दिखाया गया है कि महाराजा को किस तरह से राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य नेता की भूमिका निभानी होती थी.

तस्वीरों में महाराजाओं को वैभवपूर्ण कपड़ों में सजेधजे हाथियों या घोड़ों पर सवार दिखाया गया है. उनके चारों ओर सेवक खड़े हुए हैं और वे ऐसी चीज़े लिए हुए हैं जिससे ज़ाहिर होता है कि वे महाराजा की सेवा में हैं. इसमें शाही छत्र और हाथ पंखा आदि है.

प्रदर्शनी की सह आयोजक अन्ना वाटसन ने बीबीसी से कहा, "राजा को देखना शुभ माना जाता था. दर्शन एक ऐसी अवधारणा थी जिसमें किसी श्रेष्ठजन को देखने का अवसर था चाहे वह राजा हो या ईश्वर."

वे कहती हैं कि हालांकि दर्शन एक हिंदू अवधारणा थी, लेकिन यह पूरे उपमहाद्वीप में राजशाही का हिस्सा बन गई.

इस प्रदर्शनी से यह भी ज़ाहिर होता है कि ब्रिटिश राज में भी किस तरह से राजा को राजधर्म का पालन करना होता था.

प्रदर्शनी के आख़िरी हिस्से में दिखाया गया है कि महाराजाओं के जीवन में किस तरह से पाश्चात्य जीवन शैली का प्रभाव आया.

इसमें यह भी दिखाया गया है कि किस तरह से भारत में द्विस्तरीय प्रणाली काम कर रही थी. एक ओर उपमहाद्वीप के 3/5 वें हिस्से में अंग्रेज़ शासन कर रहे थे जिसे ब्रिटिश इंडिया कहा जाता था और शेष में उनका परोक्ष नियंत्रण था.