सरकारी कंपनियों के शेयर बिकेंगे

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Image caption यूपीए सरकार के पिछले कार्यकाल में विनिवेश की प्रक्रिया रुकी हुई थी

भारत में केंद्र की यूपीए सरकार ने एक बार फिर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है.

सरकार ने फ़ैसला किया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के जो उपक्रम लाभ अर्जित कर रहे हैं उनका दस प्रतिशत हिस्से का विनिवेश कर दिया जाए.

इसके लिए लाभ अर्जित करने वाली सभी कंपनियों को शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध करवाया जाएगा.

यूपीए सरकार इसे आर्थिक विकास की प्रक्रिया का हिस्सा मानती है लेकिन पिछले कार्यकाल में वामपंथी दलों के दबाव के कारण इस पर कोई क़दम नहीं उठाया गया था.

वैसे यूपीए में शामिल तृणमूल कांग्रेस की नेता और रेलमंत्री ममता बैनर्जी ने इसका विरोध किया था.

शेयर बाज़ार के ज़रिए

गुरुवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने निर्णय लिया है कि लाभ अर्जित कर रहीं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध करवाया जाए.

इसमें वही कंपनियाँ शामिल की जाएँगीं जिनमें सरकार का निवेश 90 प्रतिशत से अधिक है.

शेयर बाज़ार का नियम करने वाली संस्था सेबी के नियमों के अनुसार शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने वाली किसी भी कंपनी के लिए दस प्रतिशत शेयर आम जनता को उपलब्ध करवाना ज़रुरी होता है.

इस फ़ैसले के बाद केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बताया कि ऐसी कंपनियों को शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध करवाया जाएगा जो पिछले तीन साल से लाभ अर्जित कर रही हैं और जिनको सकल घाटा न हो.

उन्होंने कहा कि जून 2009 में संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने साफ़ कर दिया था कि सरकारी कंपनियाँ राष्ट्र का धन हैं इसलिए उनके स्वामित्व में आम लोगों का आंशिक स्वामित्व भी ज़रूरी है.

आंकड़ों के अनुसार इस समय कोई नौ ऐसी कंपनियाँ हैं जिनका विनिवेश किया जा सकता है. इसमें एमएमटीसी, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, नेशनल मिनरल डवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) और नेवेली लिग्नाइट कार्पोरेशन प्रमुख हैं. इन सभी कंपनियों में सरकार का निवेश 90 प्रतिशत से अधिक है.

संभावना है कि इस विनिवेश से सरकार को 30 से 40 हज़ार करोड़ रुपए की प्राप्ति हो सकती है.

सरकार का कहना है कि विनिवेश के ज़रिए प्राप्त होने वाला धन नेशनल इंवेस्टमेंट फ़ंड (एनआईएफ़) में जाएगा.

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