'वामपंथियों की ग़लती से हुआ परमाणु समझौता'

प्रकाश करात
Image caption प्रकाश करात के नेतृत्व में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को लोक सभा के चुनावों में कम सीटें मिलीं.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रकाश करात का मानना है कि पूर्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी के साथ सेफ़गार्ड अग्रीमेंट पर बात करने की अनुमति देने का फ़ैसला एक ग़लती थी क्योंकि इसके कारण ही परमाणु समझौता लागू हो पाया.

उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

प्रकाश करात बीबीसी के दिल्ली स्टूडियो आए और कई मुद्दों पर लंबी बातचीत की.

पेश है बातचीत के मुख्य अंश:

प्रकाश करात जी, पिछले लोक सभा के चुनावों में आपकी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, आपको तक़रीबन 16 सीटें ही मिलीं. आपके दल ने लोक सभा के चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन का विश्लेषण भी किया है. पार्टी के ऐसे प्रदर्शन के पीछे क्या वजह रही?

हमने चुनाव की समीक्षा की है. हमारी पार्टी को जो नुक़सान हुआ है उसकी समीक्षा करते हुए हमने देखा है कि पश्चिम बंगाल और केरल, जहाँ हमें सबसे ज़्यादा सीटें मिलती आईं हैं, वहां इस बार हमारी हार हुई है.

ख़ास तौर पर पश्चिम बंगाल में जहाँ हमें हमेशा सबसे ज़्यादा सीटें मिलती हैं वहां हमें हार मिली है, जिससे हमें बहुत नुक़सान हुआ है. हमारे अनुसार इसके कई कारण हैं.

इसके राजनीतिक कारण हैं, संगठनात्मक कारण हैं.जिन प्रदेशों में हम सरकार चलाते हैं, उस सरकार के प्रदर्शन में भी कुछ कमियां रहीं हैं. इन तीनों कारणों को मिलाकर जनता के कुछ हिस्सों में हमारा समर्थन कम हुआ है.

वर्ष 2004 के लोक सभा चुनावों में आपकी पार्टी ने 43 सीटें जीती थी. आपके विश्लेषण के अनुसार क्या नंदीग्राम, लालगढ़, सिंगुर में हुईघटनाओं का आपकी पार्टी की छवि पर कुछ असर हुआ है?

ज़रूर असर हुआ है, ख़ासतौर पर नंदीग्राम की घटना के बाद. हमारी पार्टी ने बंगाल में जो ज़मीन की लड़ाई की थी, भूमि सुधार के लिए जो काम किया था और वहां की जनता का जो समर्थन हासिल किया था, इस घटना के जनता के बीच आशंकाएं पैदा हुईं कि उनकी ज़मीन को छीन लिया जाएगा.-ख़ासकर ग्रामीण लोगों के बीच.

बंगाल में औद्योगिकरण की ज़रुरत है लेकिन ज़मीन के सवाल पर हमारा अनुभव यह रहा है कि ज़मीन अधिग्रहण करने के सवाल पर जनता के बीच में जो आशंकाएं हैं, हम उन्हें दूर नहीं कर पाए.

तो अब आपको लगता है कि आप यह आशंकाएं दूर कर पाएंगे?

हाँ, उस तरह से ज़मीन अधिग्रहण करने का काम अभी बंद कर दिया गया है. हमने कहा है कि औद्योगीकरण की नीति पर पुनर्विचार करके इस नीति को दोबारा नई तरह से बनाया जाए.

प्रकाश जी, अभी बीच में आपकी पार्टी की सेंट्रल कमिटी की मीटिंग हुई, पोलितब्यूरो की भी बैठक हुई. उसमें इस बात निकल कर आई कि आप पार्टी में संशोधनका कार्यक्रम करने जा रहे हैं, तो आप इस बारे में थोड़ा बताइए कि इसकी क्यों ज़रूरत पड़ी?

नहीं, यह कोई आज का ही सवाल नहीं है. हम मानते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी में लगातार सुधार की ज़रुरत है और उसमें हमारी राजनीतिक समझदारी, हमारी वैचारिक सोच और संगठन के स्तर पर जो कमियां हैं उन्हें दूर करने के लिए प्रक्रिया को जारी रखना चाहिए. अब आप इसे आप शुद्धिकरण कहिए या दुरस्तीकरण कहिए.

चुनाव के बाद यह तय हुआ था कि यह दुरुस्तीकरण अभियान हमें चलाना चाहिए. उनमें क्या-क्या मुद्दे हैं इस बारे में हमने केंद्रीय कमिटी में विचार-विमर्श करने के बाद एक दस्तावेज़ तैयार किया है और पार्टी में हर स्तर पर लागू करने के लिए सोच रहें हैं.

आप थोड़ा सा बताएँगे कि आप क्या करने जा रहें हैं?

Image caption प्रकाश करात के अनुसार कांग्रेस पार्टी और उनकी पार्टी के बीच वैचारिक मतभेद हैं

दरअसल हमारी पार्टियाँ संसदीय प्रणाली में काम करती हैं. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के लिए मज़दूर आंदोलन और संसद के बाहर जो क्षेत्र हैं उसमें काम करना बहुत ज़रूरी है. संसद के अंदर और संसद के बाहर एक संतुलित तरीक़े से काम करने की ज़रुरत है.

तो क्या आपका मानना है कि जनता के साथ आपका संपर्क टूट रहा है?

नहीं. संसदीय प्रणाली में, संसदीय चुनावों में जो काम करते हैं वो जनता के बीच में ही काम करते हैं. लेकिन जनता के मुद्दों को उठाना, संघर्ष करना, आंदोलन करना, संगठन का काम, इन सब चीज़ों को कम करना और उनपर ध्यान न देना संसदवाद कहते हैं. तो उसी को दूर करने के लिए, ठीक करने के लिए हमने कुछ फैसले लिए हैं.

प्रकाश जी, आपकी पार्टी ने तक़रीबन चार साल यूपीए सरकार का साथ दिया. पर आज आपके दफ़तर के बाहर वो भीड़ नहीं है टीवी वालोंकी, कैमरा वालों की. क्या आपको लगता है कि आपका दबदबा कम हो रहा है?

(हँसते हुए) इससे तो हम राहत महसूस कर रहे हैं. नहीं, हमने तो किसी विशेष परिस्थिति में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने का फैसला किया था और वो परिस्थिति यह थी कि हम भाजपा को दोबारा सत्ता में नहीं आने देना चाहते थे.

आमतौर पर आप जानते ही हैं कि कांग्रेस और हमारे बीच में नीतियों के सवाल पर काफी मतभेद और फ़र्क़ है. इसलिए वो चार साल आप कह सकते हैं कि एक अपवाद है.

दोनों पार्टियों के बीच में कई मुद्दे आ खड़े हुए थे लेकिन क्या अब आप मानते हैं कि अगर इस बार के चुनावों में आप कांग्रेस के साथ खड़े होते तो आपका दबदबाबना रहता?

तब हमारे सामने और भी दिक्कतें पैदा होतीं. तब भी हमें कांग्रेस के साथ लड़ना पड़ता क्यूँकि पश्चिम बंगाल और केरल में हम कांग्रेस के साथ गठबंधन तो नहीं कर सकते थे.

तो जनता तक यह बात ले जाना कि कांग्रेस के ख़िलाफ़ हम लड़ रहे हैं, उनकी नीतियों से हमारा विरोध है लेकिन पाँच साल हमने सरकार को समर्थन दिया और दोबारा हम करने जा रहे है, उसपर हमारी राजनीतिक समझदारी को जनता तक ले जाना मुश्किल होता.

आपकी पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बहुत कोशिश कि है कि उत्तर भारत में वो जड़ पकड़ ले. लेकिन 2009 के लोक सभा चुनावों में उत्तर प्रदेश औरबिहार में आपने जो सीटें लड़ी हैं उनमे आपका प्रदर्शन कुछ ख़ास अच्छा नहीं रहा है. जबकि आम आदमी, गरीब आदमी और सर्वहारा के तबके सब इन इलाकोंमें रहते हैं. आप क्या वजह समझते हैं कि आपकी पार्टी ने अभी तक इन जगहों पर ज़ोर नहीं पकड़ा है?

यह बात सही है कि हमें ज़्यादा सफलता नहीं मिली है और काफी लंबे समय से हम उत्तर भारत में, हिंदी भाषी प्रदेशों में कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए कदम उठाने की बात करते रहे हैं, योजनाएँ भी बनाई हैं लेकिन जिस हिसाब से हमने प्रयास किए हैं, उस हिसाब से हमें सफलता नहीं मिली है और यही हमारी मुख्य कमज़ोरी है.

अखिल भारतीय स्तर पर अगर हम उत्तर भारत में पार्टी का विकास नहीं कर पाएंगे तो हम अखिल भारतीय एक बड़ी शक्ति कभी नहीं बन पाएंगे और यही हमारे लिए आज मुख्य समस्या है.

तो इसकी वजह क्या है? आपकी पार्टी केरल और बंगाल में चूकी?

उसमें सबसे बड़ी कमज़ोरी हमारी यह रही है कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में, किसानों के बीच में, ग़रीब किसान, मज़दूरों और गाँव के लोगों के बीच में हम अपनी पार्टी को नहीं ले जा पाए हैं और संगठित नहीं कर पाएँ हैं.

इसका एक कारण यह है कि काफी समय से हम देख रहे हैं कि उत्तर भारत में जातिगत राजनीति की बढ़ी है और जातिगत अपील से राजनीति चल रही है और यह हमारे लिए बहुत बड़ी बाधा है

क्यूँकि हम सर्वहारा की एकता, ग़रीब किसान, मज़दूर, गाँव के गरीबों की एकता चाहते हैं लेकिन आज जो राजनीति है, आज जो चेतना पैदा हुई है वो जातिगत है और यह हमारे लिए बहुत मुश्किलें खड़ा कर रही है.

आपने उत्तर भारत में चुनाव लड़ा, राजस्थान, हरियाणा में भी चुनाव लड़ा. तो कुछ जगहों पर आपकी ताक़त तो ज़रूर है लेकिन क्या आपका मानना है कि जातिपर आधारित पार्टियों की तुलना में आपकी पार्टी उनकी बराबरी नहीं कर सकती?

नहीं, मेरा कहना है कि हम जातिगत अपील इस्तेमाल नहीं कर सकते. राजस्थान में हमें सफलता हासिल हुई है, हमें पहली बार विधान सभा चुनावों में तीन सीटें हासिल हुई है. ये इसलिए हो पाया क्योंकि वहां कुछ इलाकों में किसान आंदोलन को हम गति देने में सफल रहे हैं और उस किसान आंदोलन और जुझारू संघर्ष से ही हमारा प्रभाव बढ़ा है.

जब हम ऐसे संयुक्त आंदोलन करेंगे तो जातिगत विभाजन को तोड़ कर, शोषित जनता को एकत्रित कर पाएंगे. तभी हमारा दायरा बढ़ेगा.

प्रकाश जी, अब मैं आपको थोड़ी अलग दिशा में ले जाना चाहूँगा. हमने देखा है दुनिया में कई कम्युनिस्ट पार्टियों, साम्यवादी दलों ने अपने आपको एक तरह से जनतांत्रिक समाजवादी पार्टियों या सोशल डेमोक्रेटिक पार्टियों में परिवर्तित कर लिया. लेकिन आपकी पार्टी आज भी कट्टर कम्युनिस्ट पार्टी मानी जाती है. अब भी स्टालीन की तस्वीर हर पार्टी मीटिंग में होती है.

(हँसते हुए) हम लेनिन की तस्वीर लगाते हैं..

क्या आपकी पार्टी के अंदर कभी ऐसी सोच रही है कि आप भी इस तरह का परिवर्तन कर लें ताकि जनता के बीच में अपील का स्तर बढ़ सके?

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों में से हैं. हमारी सदस्यता दस लाख से ऊपर है और जिन पार्टियों ने मार्क्सवाद कि विचारधारा को छोड़ कर जनतांत्रिक समाजवादी पार्टी का रूप धारण किया है उनकी अवस्था क्या है आप देख सकते हैं.

Image caption प्रकाश करात का मानना है कि पश्चिम बंगाल के आगामी चुनावों में उनकी पार्टी को नुक़सान हो सकता है

इटली में यूरोप की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी थी उस ज़माने में यानी कि 1980 में जब हमारी कम्युनिस्ट पार्टी में तीन लाख सदस्य थे, उनकी पार्टी में तो आठ-नौ लाख लोग थे.

आज वहां पूरा विघटन हो गया है क्यूंकि मार्क्सवाद से हटने के बाद उनमें और वहां की अन्य पार्टियों में लोग कोई फ़र्क़ नहीं देख पाते हैं. अभी वो चुनाव हार गए और पहली बार इटालियन संसद में कम्युनिस्ट पार्टी की पृष्टभूमि का कोई भी प्रतिनिधि नहीं है.

हमने पहले से ही, जबसे हमारी पार्टी की 1964 में स्थापना हुई तब से ही मार्क्सवाद को भारत की विशेष और ठोस परिस्थितियों में लागू करने कि कोशिश की है.

हमने किसी दूसरे देश का मॉडल कभी नहीं अपनाया है और इसीलिए हमारे देश में संसदीय जनवादी प्रणाली है, संसद है, लोकतांत्रिक संसद में काम करने का हमारा सबसे ज़्यादा अनुभव है.

हम समझते हैं कि समाजवाद में भी एक बहुदलीय प्रणाली होनी चाहिए. हमने मार्क्सवाद को भारत की ठोस परिस्थितियों में लागू करने और अपनाने के लिए कोशिश की है. इसलिए हमारा मॉडल स्वतंत्र है, हमने दूसरे देशों कि नक़ल नहीं की है.

लेकिन कभी आपने सोचा है कि आज भी अगर कोई आपकी पार्टी में सदस्यता ले तो आपकी एक प्रणाली है, एक प्रक्रिया है, कोई भी आपकी पार्टी का सदस्य आसानी से नहीं बन सकता है?

हां जी, आज भी दो-तीन साल लग जाते हैं.

तो क्या आपने सोचा है कि अगर आपको पार्टी की अपील बढ़ानी है या आगे बढ़ना है तो इस तरह की प्रक्रिया रखना ज़रूरी है?

इन्हीं कारणों से हमारी पार्टी आज भी बरक़रार है नहीं तो हमारी पार्टी का अस्तित्व ख़त्म हो जाता.

हमारी पार्टी में आज भी पार्टी सदस्यता के क्या गुण हैं उस पर हम ज़ोर देते हैं, संख्या पर नहीं देते हैं. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के साथ जनता के सौ लोग हो जाएँ, उनसे रिश्ता रहे, जनता के बीच में काम करना और लोगों को अपनी-अपनी मांगों को लेकर लामबंद करना और आंदोलन को खड़ा करना, यह तो हम लगातार करते हैं.

हिन्दुस्तान की परिस्तिथियों में आज कोई वैकल्पिक नीतियों की बात करते हैं तो वो हम ही करते हैं- हमारे देश में एक संघवादी ढांचा होना चाहिए, एक फ़ेडेरल सिस्टम होना चाहिए, हमारे देश में वैकल्पिक नीतियां कैसी होनी चाहिए. उस पर हमने ही विचार करके प्रस्तुत किया कि वैकल्पिक आर्थिक नीतियां संभव हैं, पूरी दुनिया में जो नई उदारवादी नीतियां चली हैं उसके विकल्प में भी नीतियां हैं. यानी हिन्दुस्तान की ठोस परिस्थितियों में हमने अपनी नीतियां बनाई हैं.

लेकिन क्या आपकी पार्टी में ऐसी सोच है कि यह परिवर्तन हमको करना चाहिए?

परिवर्तन तो हमेशा होता है. अभी हमने जो दुरस्तीकरण की बात की है उसके तहत हमारी पार्टी में रुढ़िवाद सोच को बदलने के लिए भी हमने फैसला किया है.

हमारे संगठन में हम कोई 19 वीं या 20 वीं सदी के संगठन का रूप भी नहीं अपनाएंगे. आधुनिक तरीके से संगठन का क्या ढांचा होना चाहिए उसपर हम विचार करके उसको लागू करते हैं. लगातार परिवर्तन होता रहता है.

आपकी पार्टी ने तकरीबन साढ़े-चार साल तक यूपीए सरकार का साथ दिया. मुझे याद आता है जब ईरान के मामले में सितंबर 2005 में परमाणु एजेंसी में भारत ने ईरान के ख़िलाफ वोट दिया था. उसके बारे में कुछ बताएँगे कि उस वक़्त क्या हुआ था, मतलब उस वक़्त क्या उन्होंने आपको कोई ऐसी तसल्ली दी थी कि वो ईरान के ख़िलाफ वोट नहीं देंगे. ऐसी कोई बात थी?

Image caption वर्ष 2008 में भारत और अमरीका के बीच परमाणु समझौते को अंतिम रुप दिया गया

नहीं, ऐसी कोई बात नहीं थी. हमें आश्चर्य हुआ जब यह समाचार आया कि भारत ने ईरान के खिलाफ़ परमाणु एजेंसी में वोट दिया है. हमारी सोच यह थी कि इस पर हम कम से कम तटस्थ रहेंगे और यह आश्चर्य की बात थी कि हमने ऐसा क़दम कैसे लिया. हमने प्रधानमंत्री के पास जाकर यही बताया कि कोई दबाव था ऐसा कदम उठाने के लिए. और फिर हमारे और सरकार के बीच विदेश नीति को लेकर मतभेद शुरू हो गया.

तो आपको लगता है कि सितम्बर2005 से ही आपके और यूपीए सरकार के बीच दरार की शुरुआत हुई?

जी हाँ, शुरुआत वहीँ से हुई और तीव्र तब हुई जब अमरीका के साथ संयुक्त बयान हुआ था जुलाई2006 में, फिर ईरान के ख़िलाफ वोट और उसके बाद परमाणु करार पर बहस शुरू हो गई.

फिर सवाल आया सैन्य गठबंधन और सहयोग पर. यह सब मुद्दे तब उठे थे और विदेश नीति में तब हमारा ज़्यादा तकरार हुआ.

तो आपको लगता है कि प्रधानमंत्री जी ने सोचा कि क्यूंकि आप लोग भाजपा के खिलाफ हैं तो आप अपना समर्थन वापस नहीं लेंगे. एक साझा न्यूनतमकार्यक्रम या कॉमन मिनिमम प्रोग्राम भी था, पर फिर भी उन्होंने बिना आपसे बिना पूछे ऐसा किया.

ये तो वही बता सकते हैं क्यूँकि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में अमरीका के साथ कोई रणनीतिक गठबंधन की बात नहीं थी. जब कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर बहस हुई थी और ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया था तो हमने उसपर ऐतराज़ किया और उसको हटाया गया था.

इसीलिए हम समझते हैं कि सरकार की पहले से ही यह मंशा थी कि इसी को लेकर आगे चलना चाहिए, लेकिन हमारे दबाव के कारण सांझा न्यूनतम कार्यक्रम में उसे रखा नहीं गया.

अब मैं परमाणु समझौते के बारे में आपसे एक सवाल करना चाहूँगा. सितम्बर 2007 में यूपीए और लेफ्ट की एक समिति बनी. उस वक़्त यह आपको बताया गया था कि परमाणु समझौते को कारगर करने के पहले वो आपके पास आएंगे. उस वक़्त नवंबर में आप लोगों ने कहा कि सरकार आईएईए के पास जा सकती है और सेफ़गार्ड अग्रीमेंट पर वार्ता शुरू कर सकती है.

अगर उस वक़्त वामदल सरकार से ये कहते कि आप परमाणु एजेंसी के पास नहीं जा सकते हैं, तो आपको लगता है कि परमाणु समझौता तब भी संभव हो सकता था?

हमारा रुख़ था कि वो आईएईए के पास ना जाएँ. लेकिन सरकार ने कहा कि बातचीत के लिए हमें जाने दीजिए फिर अगर आप हमारे लौटने पर ऐतराज़ करेंगे तो हम आगे नहीं बढेंगे, वो आश्वासन उन्होंने दिया था. और उस वक़्त पर हमने उनपर विश्वास किया जो हमें करना नहीं चाहिए था.

तो अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो आपका निर्णय कुछ और हो सकता था उसमें?

उस समय हमारी पार्टी का फैसला था कि अगर सरकार आगे जाएँगी तो समर्थन वापस लेना चाहिए.पर उस समय सरकार गिराना हमारे देश के लिए सही नहीं होता, गुजरात का विधानसभा चुनाव आ रहा था दिसंबर में, यह सब कहकर उन्होंने कहा कि हम आपकी सलाह के बिना आगे नहीं जाएँगे, तो फिर हमने सोचा थोड़ी और कोशिश की जाए इसके बारे में लेकिन उस तरह नहीं रहा.

जो समय सीमा थी बाद में- सेफ़गार्ड अग्रीमेंट पर बात हो चुकी थी. अगर आप उस वक़्त आपत्ति करते तो सरकार के लिए मुश्किल हो सकती थी?

उनको बातचीत के लिए जाने ही नहीं देना चाहिए था. हमें वहां ही अटल रहना चाहिए था.

माओवाद की समस्या भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है.पश्चिम बंगाल में आपकी सरकार है और माओवादियों की गतिविधियाँ वहां भी चलती आ रही हैं. तो आपकी समझ में इनसे निपटने के लिए केंद्र सरकार और प्रदेशों की सरकार को क्या करना चाहिए?

उसमें सरकार की समझ में यह बात होनी चाहिए कि जिन इलाकों में माओवादियों की गतिविधियाँ हैं वो ऐसे इलाके हैं जहाँ पर आदिवासी लोग रहते हैं, सबसे पिछड़े हुए इलाके हैं, पहाड़ और जंगल के इलाके हैं जहाँ विकास नहीं पहुंचा है और सामाजिक आर्थिक विकास के लिए इन इलाकों के लिए एक योजना फ़ौरी तौर पर बनाई जानी चाहिए.

दूसरा पहलू यह है कि जहाँ माओवादी हिंसा पर उतारू है, वहां प्रशासनिक कदम उठाए जाने चाहिए. लेकिन यह पूरा पैकेज होना चाहिए, सिर्फ़ पुलिस और सुरक्षा दलों से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता है.

लेकिन अब तो यह लग रहा है कि जितने भी चार-पांच प्रांत हैं , वहां सैन्य अभियान पुलिस द्बारा चलाया जाएगा, तो क्या आपको लगता है कि इसमें सरकारको सफलता मिलेगी?

मुझे उनकी योजना के बारे में पूरी जानकारी नहीं है लेकिन यह बात तो है कि अगर तीन-चार राज्यों में सुरक्षा बल काम करते हैं तो उसका कुछ असर पड़ेगा.

बंगाल में सबसे बड़ी समस्या हम देख रहे हैं कि झारखंड सीमा पर ही कारवाई हो रही है और वो झारखंड सीमा पर ही शरण लेते हैं.

तो झारखंड में अगर ऑपरेशन नहीं होता है पुलिस का तो पश्चिम बंगाल में इस समस्या पर काबू नहीं किया जा सकता. अगर तालमेल से यह योजना चलती है तो इसका कुछ असर ज़रूर पड़ेगा.

अभी बीच में पश्चिम बंगाल की सरकार ने कुछ माओवादी समर्थकों को रिहा किया जब एक पुलिस इंसपेक्टर को अगवा किया गया था. उसपर काफी आलोचना भी हुई. क्या आपकी सरकार का वो कदम सही था?

Image caption पार्टी का दायरा कम हो रहा है

उस समय ये परिस्थिति थी कि दो पुलिस कर्मियों की हत्या की गई, वहां के थाना इन्चार्ज को अग़वा कर के ले गए थे. उस समय आम जनता में भी यही सोच था कि उनकी जान बचाने के लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए.

और जो लोग रिहा किए गए हैं वो तो ज़मानत पर हुए, जो साधारण लोग हैं जो माओवादियों ने सड़क जाम करने के लिए और पुलिस कि कार्यवाई रोकने के लिए इकट्ठा किए थे.

उनमें से महिलाओं को छोड़ा गया है. वो किसी माओवादी संगठन के नेतृत्व करने वाले लोग नहीं थे. तो मेरे ख़याल में उसमे नुक़सान ज़्यादा नहीं हुआ है.

ऐसी घुटने टेकने वाली बात तो नहीं है, जैसे कि कहा जा रहा है?

नहीं, वहां तो अब भी पुलिस तैनात है, पुलिस कार्रवाई अभी जारी हैं. उसमें कोई कमी नहीं है.

आपको क्या लगता है कि 1966 और 1972 के बीच में जो माओवादियों या नक्सलियों के ख़िलाफ अभियान छेड़ा गया था बंगाल में और अन्य प्रांतों में, क्या आप अब भी वैसी ही स्तिथि को उभरता हुआ देख रहे हैं?

नहीं, उससे भी और व्यापक हैं उनकी गतिविधियाँ. 1966 में नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम, ऐसे दो-तीन इलाकों में उनकी गतिविधयां थीं. लेकिन अब तो और इलाकों में है और उनकी ताकत भी बढ़ी है, ज़्यादा हथियार भी उनके पास हैं.

मेरे ख़याल में इन राज्य सरकारों को तालमेल करके इनके खिलाफ कदम उठाने चाहिए.

लेकिन उसके साथ-साथ माओवादियों को सिर्फ एक आतंकवादी गुट के नज़रिए से देखना भी सही नहीं है. हमारे देश में जिस तरह के आतंकवादी हमले हुए हैं, बम विस्फोट हुए हैं उस तरह के नहीं हैं यह माओवादी.

उनके कई राजनीतिक वैचारिक आधार भी हैं जो गलत हैं. राजनीतिक, वैचारिक स्तर पर उनका मुकाबला किया जाना चाहिए.

लोक सभा चुनाव में बंगाल में तकरीबन 99 असंबेली सेगमेंट में आपकी पार्टी या वामदलों को बहुमत मिला. 2011 में जब विधानसभा का चुनाव होगा बंगालमें तो आपको क्या लगता है क्या होने जा रहा है?

राजनीतिक परिस्तिथियाँ बदलीं हैं. 2006 में हमें तीन चौथाई बहुमत मिला था वहां पर लेकिन अगर आप गैर-वामपंथी के वोट देखेंगे तो हमारे और उनके बीच में केवल एक प्रतिशत का फर्क़ था.

अभी 2009 के लोक सभा चुनाव में हमने देखा कि वाम मोर्चे के खिलाफ़ जितनी भी ताकतें थी वो इकट्ठी हो गईं, तृणमूल और कांग्रेस साथ-साथ मिलकर लड़े.

पिछली बार कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस अलग-अलग लड़े थे. जब पूरे विपक्ष में एकता रही है तो हमारे लिए ज़्यादा दिक्कत हुई है. इसलिए आने वाले विधान सभा चुनावों में हमें वैसी ही कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा.

वर्ष 1977 से आपकी पार्टी वहां सत्ता में है, सत्ता परिवर्तन हो सकता है इस बार के चुनाव में, आपका क्या ख़्याल है?

संसदीय प्रणाली में कोई गारंटी नहीं है कि कोई सरकार हमेशा के लिए रहे. लेकिन हमारी कोशिश यह है कि 2009 के लोक सभा चुनाव से जो हमने सबक सीखा है, जो हमारी कमियां हैं, जनता में जो हम काम करते हैं और सरकार के काम में जो त्रुटियां हैं उन्हें हम दूर करें और जो हमें छोड़ कर गए हैं वो वापस हमारे साथ आ जाएँ. इसका हम पूरा प्रयास करेंगे.

जब आप समाजशास्त्र नहीं पढ़ रहे होते हैं या पार्टी का काम नहीं कर रहे होते तो वो क्या करते हैं?

हमें ज़्यादा समय नहीं मिलता मगर हम किताबें पढ़ते हैं

और उसके अलावा?

उसके अलावा हमें फ़िल्म देखने का शौक था मगर अब इतना समय नहीं मिलता है.

आप अर्थशास्त्री भी रहे हैं, तो क्या कभी आपने सोचा था कि आप कोई अपना वैकल्पिक काम भी कर सकते हैं या कम्युनिस्ट पार्टी का प्रधान बनना ही लिखा हुआ था आपकी ज़िंदगी में?

हम जब कॉलेज में पढ़ते थे तब हमारे पास दो ही विकल्प थे कि या तो मैं पत्रकार बनूँ या फिर कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता. तो मैंने कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता बनना पसंद किया.

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