'लीला कर, जोकर बनकर चला गया'

प्रभाष जोशी
Image caption उनकी लेखनी में भारतीय मिट्टी की ख़ुशबू, उसके सरोकार और आम आदमी की भाषा थी.

हिंदी पत्रकारिता के एक स्तंभ प्रभाष जोशी का अंतिम समय अपने प्रिय प्रेम क्रिकेट और प्रिय खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की ऐतिहासिक पारी देखते हुए बीता.

जनसत्ता के संस्थापक संपादक रहे प्रभाष जी की लेखनी में भारतीय मिट्टी की ख़ुशबू, उसके सरोकार और आम आदमी की भाषा थी.

इस विशिष्ट शैली में राजनीतिक विश्लेषण से भरा उनका लोकप्रिय स्तंभ 'कागद कारे' अब उनकी कमी महसूस करेगा.

उनके साथ काम कर चुके मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी का कहना है कि प्रभाष जी के जाने से हिंदी पत्रकारिता की छतरी उठ गई है, जो एक नैतिक छतरी थी.

वो कहते हैं, "प्रभाष जी उन पत्रकारों में थे जो पत्रकारिता के नैतिक और समाजिक मानकों को पत्रकारों के लिए परीक्षा का विषय बनाते थे."

'स्मरणीय व्यक्तित्व

प्रभाष जोशी की बेबाकी, संपादकों की स्वतंत्रता की मुहिम और समाजिक चेतना के उनके प्रयास स्मरणीय हैं.

पिछले हफ़्ते ही वो बीबीसी के दिल्ली दफ़्तर आए और इंदिरा गाँधी के बारे में अपने विचार रखे.

इंदिरा गांधी के संबंध उन्होंने कहा था, "प्रधानमंत्री होने के कारण इंदिरा नेता हुईं, इसलिए आसानी से ये बात कही जा सकती है कि स्वतंत्र भारत में इंदिरा सबसे बड़ी और सशक्त नेता रही हैं."

उनकी लेखनी कई बार विवादों का भी हिस्सा बनी. उन्होंने सती के समर्थन में संपादकीय लिखा जिसे लेकर उन्हें तीखी प्रतिक्रियाओं का खुलकर सामना करना पड़ा.

लेकिन वो मानते थे कि जो कह दिया वो कह दिया. इस बारे में सुधीश पचौरी का कहना है, "वो एक गाँधीवादी विचारधारा के ऐक्टिविस्ट पत्रकार थे, लेकिन उसमें खिलाड़ी रहता था. एक ऐसा खिलाड़ी जो ख़ुद भी खेलेगा और और विपक्षी को भी कहेगा कि मैं तुझे खेलाता हूँ, तू खेल. यानी बराबर की जगह देते थे."

'उनके जैसा कोई नहीं'

प्रभाष जोशी पत्रकारिता जगत में तेज़ी से बदलते अख़बार के संपादक और मालिक के रिश्ते और संपादकीय स्वतंत्रता के महत्ता पर हमेशा ज़ोर देते थे.

उनके एक मित्र और साथी पत्रकार रामबहादुर राय कहते हैं, "पत्रकारिता के सामने जो चुनौतियाँ हैं, प्रभाष जी उन्हें चिन्हित कर रहे थे और उसके ख़िलाफ़ लोगों को खड़ा कर रहे थे ताकि इन चुनौतियों का समाना किया जा सके. अब मुझे कोई नहीं दिखता है जो ये काम कर सकेगा."

प्रभाष जी का क्रिकेट प्रेम जग ज़ाहिर था. जब वो क्रिकेट पर लिखते थे वो अपनी ग़म और ख़ुशी के भाव जीवंत होकर उनकी लेखनी से उभरते थे.

उनके बेटे सोपान जोशी कहते हैं, "वो राजकपूर थे, जो थोड़ा रोएगा, थोड़ा मनोरंजन करेगा. जो अपनी लीला करके, जोकर बनकर चला गया, पर अपनी यादें सब के दिलों में छोड़ गया."

संबंधित समाचार