जानलेवा ख़तरे में बाघ

बाघ
Image caption भारत में बाघों की संख्या लगातार घट रही है

केंद्रीय वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो ने आशंका जताई है कि भारत में अगले साल बाघों के शिकार और इनके अंगों की तस्करी की घटनाओं में बढ़ोतरी हो सकती है.

ब्यूरो के अनुसार चीन के परंपरागत कैलेंडर के अनुसार वहाँ अगला साल ईयर ऑफ़ टाइगर यानी बाघ वर्ष है, इसलिए वहाँ अगले साल सरकार का ज़ोर बाघों के संरक्षण पर रहेगा.

चीन वन्य जीव उत्पादों और ख़ासतौर पर बाघ के अंगों का सबसे बड़ा बाज़ार है. चीन में बाघ की खाल, नाखून, बाल, हड्डियों और माँस की ज़बर्दस्त मांग है. टाइगर ईयर होने के कारण तस्कर चीन की सीमा से सटे भारत के राज्यों में अपनी गतिविधियाँ तेज़ कर सकते हैं.

केंद्रीय वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो ने इसे देखते हुए आगाह किया है कि शिकारी और तस्कर बड़े पैमाने पर भारत में बाघों के शिकार की तैयारी कर रहे हैं.

उत्तराखंड की सीमा का बड़ा हिस्सा चीन से लगा है और नेपाल के रास्ते भी चीन आना-जाना आसान है, लिहाजा उत्तराखंड के मशहूर कॉर्बेट नेशनल पार्क और राजाजी नेशनल पार्क तस्करों के निशाने पर बताए जा रहे हैं.

तस्करी की आशंका

देहरादून स्थित भारतीय वन्य जीव संस्थान में बाघ विशेषज्ञ वाईबी झाला कहते हैं, “अनुभव बताता है कि टाइगर ईयर होने के कारण चीन में बाघ की खाल, नाखून, बाल, हड्डियां और मांस बहुमूल्य हो जाएँगे. इसलिए बाघों की सुरक्षा के लिहाज से अगला साल हमारे लिए चुनौतीपूर्ण होगा.”

उत्तराखंड के मुख्य वन्य जीव वॉर्डन केएल आर्य का दावा है कि वन विभाग इस आशंका से निबटने के लिये तैयार है.

उन्होंने कहा, “हमें सूचना मिली है कि तस्कर और शिकारी बाघों की आबादी वाले इलाकों में डेरा डाल चुके हैं. हम सतर्क हैं और पुलिस की मदद से सघन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है.”

उत्तराखंड में 241 बाघ हैं जबकि पूरे देश में इनकी तादाद करीब 1400 है. इस राजसी पशु के अस्तित्व पर संकट को देखते हुए 1972 में टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किया गया था. इसके बावजूद बाघों को अपेक्षित तौर पर बचाया नहीं जा सका है.

1990 के दशक में जहाँ बाघों की संख्या लगभग 3,000 थी, वहीं इनकी संख्या अब घटकर 1400 के करीब रह गई है. सरिस्का जैसे इलाक़ों से तो ये गायब ही हो गए हैं.

पहल

इस बीच, भारतीय वन्य जीव संस्थान और केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय की पहल पर बाघों का बसेरा और बढ़ाया जा रहा है. इसके तहत प्रोजक्ट टाइगर संचालित इलाकों में बफर ज़ोन बनाए जाएँगे जहाँ बाघ बिना किसी बाधा और परेशानी के टहल सकें.

वाईबी झाला कहते हैं, “बाघ एकांतप्रिय पशु है और बढ़ती मानव गतिविधियों से उनका वास क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है. वास क्षेत्र बढ़ाने से ही वो फिर से पनप सकेंगे.”

इस योजना के तहत नेशनल पार्क और अभयारण्यों के आसपास 9,000 वर्ग हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र बाघों के लिये संरक्षित किया जा रहा है. इनमें से प्रमुख इलाके हैं कॉर्बेट, पेंच और बांदीपुर. माना जा रहा है कि प्रति 1000 वर्ग हेक्टेयर संरक्षित इलाके में 20 नए बाघ पनप सकेंगे.

दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस कदम से मानव-बाघ मुठभेड़ औऱ बढ़ेंगी.

राजाजी नेशनल पार्क में रहनेवाले गुर्जरों के लिये काम कर रही संस्था रूलक के अध्यक्ष अवधेश कौशल कहते हैं,”बाघों के संरक्षण की आड़ में ये भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है. इससे विस्थापन बढ़ेगा और उनके पुनर्वास के नाम पर पैसों की हेराफेरी होगी. अगर बाघों के लिये जगह कम पड़ रही है तो उन्हें सरिस्का जैसे इलाकों में भेज देना चाहिए जहाँ के जंगल खाली हो गए हैं.”

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