ऐसे बची सैकड़ों जानें...

विष्णु झेंडे
Image caption चरमपंथियों ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं थीं

पिछले साल 26 नवंबर को हुए आतंकी हमलों में कई लोगों ने बहादुरी का सुबूत दिया और हीरो कहलाए. विष्णु झेंडे भी उनमें से एक थे.

वे छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन में ट्रेनों के आने और जाने के समय से लेकर स्टेशन के कर्मचारियों से संबंधित ज़रूरी सूचनाओं का माइक से ऐलान करते हैं.

पिछले साल 26 नवंबर की रात वो उद्घोषक (एनाउंसर) की ड्यूटी पर थे जब स्टेशन के अंदर दो बंदूकधारी धारी घुस आए और अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी. विष्णु झेंडे पहली मंजिल के एनाउंसर के केबिन में ड्यूटी कर रहे थे.

साहसिक फ़ैसला

उनके सामने के प्लेटफॉर्म पर दोनों बंदूकधारी गोलियां चला रहे थे. झेंडे के पास दो रास्ते थे. पहला खुद की जान बचा कर भागना और दूसरा, उन सैंकड़ों यात्रियों को स्टेशन के अंदर आने से रोकना जिन्हें हमले के बारे में कुछ मालूम नहीं था. उन्होंने बहादुरी का रास्ता चुना. अपनी जान की परवाह किए बग़ैर उन्होंने घोषणा करनी शुरू दी कि स्टेशन के अंदर आने वाले यात्री उल्टे पाँव बाहर चले जाएँ क्योंकि स्टेशन के अंदर दो बंदूकधारी अंधाधुंध गोलियां चला रहे हैं.

इतना ही नहीं, उन्होंने रेलवे सुरक्षा बल और अन्य रेलवे कर्मचारियों को ये भी बताया कि बंदूकधारी कहाँ से गोलियां चला रहे हैं.

तो क्या उन्हें डर नहीं लगा की वे खुद चरमपंथियों की गोलियों का निशाना बन सकते हैं? झेंडे कहते हैं, "उस वक़्त तो मैं अपने बारे में सोच भी नहीं रहा था. मुझे तो केवल मेरे यात्री दिखाई दे रहे थे. और मुझे उन्हें बाहर निकालना था."

बंदूकधारियों को झेंडे की लगातार घोषणाओं से गुस्सा आ रहा था, इसीलिए उन्हें जहां से भी झेंडे की आवाज़ आने का शक था वे उधर बार-बार गोलियां चला रहे थे. झेंडे कहते हैं, "उनको यह पता नहीं था की हमारा केबिन कहां है. वे उन सब जगहों पर गोलियां बरसा रहे थे जहाँ उन्हें लगता था कि कोई छुप कर ऐलान कर रहा है."

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