बदल गई जीवनशैली...

भार्गव और हेमा थांकी

पिछले साल नवंबर में हुए चरमपंथी हमलों ने कई परिवारों की जीवनशैली बदल दी है

भार्गव और हेमा थांकी अब जीवन का मोल समझ गए हैं और छोटी छोटी बातों में खुशियां खोजने की कोशिश करते हैं.

भार्गव और हेमा अपने दस वर्षीय बेटे देवेन के साथ 26 नवंबर को ताज के शमियाना रेस्तरां में फंसे थे.

भार्गव एक सफल व्यवसायी हैं और कहते हैं कि इस घटना के बाद उनकी लाइफस्टाइल बदल गई.

वो बताते हैं, ‘‘पहले मैं चौबीसों घंटे काम करता था. पैसा कमाता था. अब मैं परिवार को बहुत समय देता हूं. शाम सात बजे के बाद मैं अपना मोबाइल फोन बंद कर देता हूं और सुबह ही उसे ऑन करता हूं ताकि परिवार को समय दे सकूं.’’

कसाब से नफ़रत

हेमा उनका साथ देती हैं और कहती हैं, ‘‘ पहले हम हर काम टाल देते थे. पिक्चर देखनी है या बाहर जाना है सबकुछ टाला जाता था काम के लिए. अब हम ऐसा नहीं करते. हर छोटा सा भी काम प्यार से करते हैं. जीवन जीने की कोशिश करते हैं.’’

मैं नहीं मानती किसी ने कसाब का माइंड वाश किया होगा. ये लोग मानसिक रोगी जैसे होते हैं

हेमा थांगी

हेमा और भार्गव अब अपने दोस्तों को घर पर ज्यादा बुलाते हैं और क्वालिटी समय बिताते हैं एक दूसरे के साथ.

हेमा को 26 नवंबर के बाद काफ़ी परेशानी हुई. वो बताती हैं, ‘‘मैं सदमे में थी. डॉक्टर ने कहा दवाईयां मत लो. रोने का मन करे तो रो लो. मैं बहुत रोती थी अकेले में डर से. धीरे धीरे इसी तरह सदमे से उबरी. मुझे छोटी चीज़ों से डर लगने लगा था. टॉयलेट के फ्लश की आवाज़ हो या गाड़ियों की. मैं डरती थी. ’’

यह पूछे जाने पर कि कसाब के बारे में उनकी क्या राय है तो हेमा कहती हैं, ‘‘मैं उससे घृणा करती हूं. मासूम लोगों ने उसका क्या बिगाड़ा था. मैं उससे नफ़रत करती हूं. मैं नहीं मानती किसी ने उसका माइंड वाश किया होगा. ये लोग मानसिक रोगी जैसे होते हैं.’’

हेमा और भार्गव कहते हैं कि उनके बेटे देवेन पर 26 नवंबर की घटना का काफ़ी असर हुआ है. देवेन पहले अंतर्मुखी था लेकिन अब वो बोलने लगा है.

हेमा कहती हैं, ‘‘ अब देवेन थोड़ा खुला है और वो लोगों से अधिक बात करता है. जो मेरे लिए अच्छी बात है. हम उसे ताज भी लेकर गए हैं ताकि उसके मन का डर ख़त्म हो.’’

मुंबई या कहें कि भारत के कई लोगों की तरह हेमा और भार्गव भी सरकार से खुश नहीं है और मानते हैं कि अभी भी आम लोगों की सुरक्षा के प्रबंध वैसे नहीं हैं जैसे होने चाहिए.

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