कम से कम तारीख़ तो देख लेते...

रागिनी शर्मा अपने बड़े बेटे के साथ
Image caption रागिनी शर्मा के अपने बड़े बेटे के साथ

रागिनी शर्मा के जीवन में 26 नवंबर की तारीख़ एक अजीबोग़रीब सवाल खड़ा कर देती है.

रागिनी के पति सुशील कुमार शर्मा मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर टिकट चेकर का काम करते थे और पिछले साल हमलावरों की गोलियों का शिकार हो गए.

दूसरी तरफ़ 26 नवंबर के दिन ही दस वर्ष पहले उनके सबसे छोटे बेटे आदित्य का भी जन्म हुआ था.

अब जब यह तारीख़ नज़दीक आती है तो रागिनी सोच में पड़ जाती हैं कि पति के जाने का दुख मनाएं या बेटे का जन्मदिन.

वो कहती हैं, "जो हुआ सो हुआ. मुझे बस एक बात पर ईश्वर पर गुस्सा आता है. मेरे पति की उतनी ही उम्र थी मान लिया लेकिन ईश्वर उन्हें ले जाने से पहले कम से कम तारीख़ तो देख लेता. अब मैं क्या करूं."

रागिनी यह कहते कहते रो पड़ती हैं लेकिन आदित्य गंभीर रहता है और सवाल पूछने पर मुस्कुराते हुए जवाब देता है.

यादें पापा की

Image caption आदित्य ने फ़ैसला किया है कि अब वह जन्मदिन नहीं मनाएगा

वो कहता है, "मैं जन्मदिन पर तोहफ़े लेता ही नहीं. उस दिन कुछ और करुंगा. मैंने कैलेंडर देखना बंद कर दिया है. चलता है. ऐसे ही बीत जाएगा एक और दिन."

लेकिन उस दस साल के बच्चे की आंखों में उसके पापा की यादें साफ़ दिखती हैं.

रागिनी अब संभल चुकी हैं. उन्हें रेलवे में ही बुकिंग क्लर्क की नौकरी मिली है.

वो कहती हैं, "मैं जब स्टेशन पर जाती हूं तो लगता है कि मेरे पति यहीं घूमते होंगे. कहीं बैठ कर चाय पीते होंगे. वो शरीर से साथ नहीं लेकिन मुझे लगता है कि वो हमेशा मेरे साथ हैं."

रागिनी के दो बेटे हैं और वो कहती हैं कि उनके दोनों बेटों ने ही उन्हें संभाला है. आंसू आने पर वो रो भी लेती हैं लेकिन बताती हैं कि उनके बच्चे उनके सामने रोते भी नहीं.

रागिनी की नाराज़गी इस बात से है कि उनके पति ने भी लोगों को बचाते हुए जान दी थी लेकिन रेलवे ने उन्हें शहीद का दर्ज़ा नहीं दिया.

शायद इसीलिए उन्होंने अपने पति के नाम पर फ़ाउंडेशन बनाया है जो हर साल आम लोगों में से किसी को वीरता के लिए पुरस्कार देने की शुरुआत कर रहा है.

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