क्या हुआ था उस मनहूस रात को

पिछले साल 26 नवंबर को नौ बजे रात के आसपास दक्षिण मुंबई का लियोपोल्ड कैफ़े विदेशी पर्यटकों और स्थानीय लोगों से खचाखच भरा हुआ था.

अचानक कुछ बंदूकधारी आते हैं और खाना खाने वालों पर गोलियों की बौछार कर देते हैं.

दो मिनट बाद जब वे वहाँ से फ़रार होते हैं तो अपने पीछे खून से लथपथ शरीरों, कांच के टुकडों और बर्बादी की निशानियाँ छोड़ जाते हैं

लियोपोल्ड कैफ़े के मालिक फरहंग जेहानी उस समय कैफ़े के ऊपर वाली मंजिल के बार में ग्राहकों से आर्डर ले रहे थे.

वे बताते हैं, "जब मैं भाग कर नीचे आया तो कुर्सियाँ, टेबल, कांच के टुकड़े हर जगह बिखरे पड़े थे. हर जगह ख़ून दिखाई दे रहा था. कई शव ज़मीन पर पड़े थे. ख़ाली बुलेट्स भी बिखरे हुए थे."

जेहानी ने पहले समझा कि ये अंडरवर्ल्ड के बीच लड़ाई का नतीजा है.

ये तबाही मचाई थी कुछ बंदूकधारियों ने, जो 26 नवंबर को नौ बजे रात के बाद अपने साथियों के साथ मुंबई में समुद्र के रस्ते घुस आए थे.

उनकी संख्या 10 थी. वे दक्षिण मुंबई के तटवर्ती इलाक़े में एक स्पीड बोट से आए और दो-दो की टुकडियों में बँट गए.

हमला

उन्होंने सबसे पहले हमला शुरू किया लियोपोल्ड कैफ़े से, जो विदेशी पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है.

जब मैं भाग कर नीचे आया तो कुर्सियाँ, टेबल, कांच के टुकड़े हर जगह बिखरे पड़े थे. हर जगह ख़ून दिखाई दे रहा था. कई शव ज़मीन पर पड़े थे. ख़ाली बुट्स भी बिखरे हुए थे

फरहंग जेहानी

जेहानी कहते हैं, "हमारे यहाँ 90 प्रतिशत ग्राहक विदेशी होते हैं. शायद इसलिए उन्होंने हमारे कैफ़े पर हमला किया."

लेकिन हमला करने वाले आम शहरियों पर भी निशाना साध रहे थे. जिसका उदाहरण छत्रपति शिवाजी स्टेशन था, जहाँ बन्दूकधारी मौत का नंगा नाच खेल रहे थे.

वो ताज होटल, ट्राइडेंट होटल और यहूदियों के केंद्र नरीमन हाउस में या तो लोगों को मार रहे थे या फिर बंधक बना रहे थे.

भार्गव थांकी, उनकी पत्नी हेमा और उनके बेटे देवेन उस समय ताज के शामियाना रेस्तरां में रात का खाना खा रहे थे.

हेमा थांकी कहती हैं, "हमने एक बंदूकधारी को गोली चलाते देखा. हमारे टेबल के क़रीब वाले टेबल पर एक जवान जोड़ी ख़ामोशी से खाना खा रही थी. वो गोलियों का निशाना बन गए. मेरे पति और मैं टेबल के नीचे छिप गए. शायद हम बच गए अपने टेबल के सामने मोटे खंभे के कारण."

सीएसटी पर उन्हें गोलियाँ चलाते एक मुसाफ़िर ने देखा. उनका कहना था, "वो बड़े आराम से गोलियाँ चला रहे थे. वो बिल्कुल घबराए हुए नहीं दिख रहे थे. हमने उन्हें तीन बार मैगज़ीन भरते देखा."

देखते ही देखते दक्षिण मुंबई जंग के मैदान में बदल गया. हर जगह अफ़रा-तफ़री मच गई. बंदूकधारी अंधाधुंध गोलियाँ चला रहे थे, साथ ही हथगोले भी फेंक रहे थे.

मुंबई के लोग फ़िल्मों की शूटिंग में आतंकवादी हमलों का मंज़र देखने के अभ्यस्त हैं, लेकिन इस बार यह सब कुछ असल में हो रहा था. उनकी आँखों के सामने.

मुंबई पुलिस ने पहले कई आतंकवादी हमलों से मुक़ाबला किया है लेकिन इस बड़े स्तर पर हमलों से उनके हौसले पस्त हो गए.

पुलिस हरकत में आई लेकिन केवल घायलों को अस्पताल तक पहुँचाने में.

अस्पतालों में घायलों की संख्या बढती गई. जेजे अस्पताल में घायलों के ऑपरेशन का काम तेज़ पकड़ता गया.

कई घंटों की देरी के बाद एनएसजी के 500 कमांडो और सेना के जवानों ने मोर्चा संभाला और तब बंदूकधारियों से मुक़ाबला शुरू हुआ.

लेकिन तब तक सीएसटी शवों का ढेर बन चुका था. वहाँ सब से ज़्यादा लोगों की जानें गईं. तब तक उन्होंने 16 पुलिसवालों को भी मार डाला था जिनमें आतंकवाद से लड़ने वाले दस्ते, एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे भी शामिल थे.

बहादुरी

लेकिन कुछ पुलिसवाले बहादुरी का प्रदर्शन करके मरे जिनमें सहायक सब इंस्पेक्टर तुकाराम ओम्बले भी शामिल थे जो अजमल कसाब को पकड़ने में अपनी जान गँवा बैठे.

उन्की बेटी वैशाली ओम्बले को आज भी लगता है उनके पापा कहीं गए हैं घर वापस लौटेंगे.

वे कहती हैं, "खिड़की में देख कर किचेन रूम में देख कर राह देखती हूँ कि पापा जिस रास्ते से आते थे उस रास्ते से अभी भी आ सकते हैं. मेरी छोटी बहन पांच महीने बोल ही नहीं पा रही थी."

निजी शोक राष्ट्रीय शोक में बदल गया. सभी की निगाहें टिकी थीं उन बंधकों पर जो अब भी ताज होटल, ट्राइडेंट होटल और यहूदी केंद्र में सैंकड़ों की संख्या में फंसे थे.

लेकिन आख़िर पुलिस और एनएसजी की टीमों ने 10 बंदूकधारियों में से नौ को मार गिराया. अजमल कसाब अकेला बंदूकधारी था जो ज़िंदा बच गया और जो ज़ख्मी हालत में गिरफ्तार कर लिया गया.

साठ घंटों तक चलने वाली यह लड़ाई आख़िर एनएसजी की मदद से समाप्त हुई. ट्राइडेंट में फंसे बंधकों को हमलों के दूसरे दिन एनएसजी की मदद से बाहर निकाल लिया गया जबकि तीसरे दिन ताज से 250 बंधकों को.

इन हमलों में 164 लोग मारे गए जिनमें 16 पुलिसवाले और 28 विदेशी भी शामिल थे.

मुंबई की कई महिलाएँ विधवा हो जाती हैं, कई परिवार अपने सगे-संबंधी खो देते हैं हमेशा के लिए.

लियोपोल्ड में मरने वाले एक वेटर पीर पाशा की 18 वर्षीय बेटी मुनीर पाशा अपने पापा के मरने के एक साल बाद उन सभी लोगों से एक सवाल करती है जिन्होंने इन हमलों की योजना बनाई थी और जो इन हमलों में शामिल थे.

सवाल

वो पूछती है, "उन लोगों के भी मम्मी-पापा होंगे, उन लोगो के भी अम्मी-अब्बा होंगे. उन लोगों के सामने उनके अब्बा को मार दिया जाए तो उन लोगों को कैसा महसूस होगा? क्यों दूसरों की ज़िंदगी के साथ खेल रहे हो?

मुनीर के इस सवाल का जवाब देने वालों में से एक मुंबई की जेल में क़ैद है. अजमल कसाब के ख़िलाफ़ मुक़दमे की कार्रवाई जारी है लेकिन क्या वे लोग कभी पकड़ में आएँगे जिन्होंने इन हमलों की योजना बनाई थी?

भारत सरकार का कहना है कि इन हमलों की योजना बनाई थी पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैबा संगठन ने.

मुंबई पुलिस का कहना है कि अजमल और उसके साथियों को तैयार करके उन्हें भारत भेजने वालों में से कई पाकिस्तान में हैं.

तो क्या पाकिस्तान उन्हें कभी भारत के हवाले करेगा? एटीएस के प्रमुख केपी रघुवंशी कहते हैं कि पाकिस्तान को उनके ख़िलाफ़ हर तरह के सुबूत दिए जा चुके हैं.

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में आकर उनमें से कुछ के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया है लेकिन मुंबई पुलिस के अनुसार हमलों के ज़िम्मेदार संगठन का ढांचा अब भी बरक़रार है और यह मुंबई के लोगों के लिए शायद अच्छी ख़बर नहीं.

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