मुंबई में हादसे का बाज़ार

लियोपोल्ड कैफ़े में गोलियों के निशान वाले कॉफी मग तीन सौ रुपए में बिक रहे हैं और स्टॉक पहले ही दिन ख़त्म हो गया है.

ताज होटल पर कमांडो की शक्ल के ख़िलौन बीस रुपए में बिकते हैं और खरीदारों की संख्या सैकड़ों में है.

26 नवंबर को मुंबई में मोमबत्तियों की बिक्री भी बढ़ी हुई है क्योंकि बहुत से लोग मृतकों की याद में मोमबत्ती जला रहे हैं.

एक जानी मानी फ़ोन कंपनी ने आह्वान किया है कि लोग रात के एक घंटे फ़ोन पर बात करें और इससे होने वाली आय पुलिस फोर्स को दी जाएगी. दो चित्रकारों ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई है और थीम है 26 नवंबर.

सूची यहीं ख़त्म नहीं होती है. पत्रकारिता स्कूल के कुछ बच्चे इस पर एक कॉफी टेबल बुक लांच कर रहे हैं. सोनू निगम 26 नवंबर को ही एक म्यूज़िक एलबम ला रहे हैं.

सही या ग़लत

अभी इस घटना को साल भर भी नहीं हुए हैं और इस पर कम से कम दस फ़िल्में बन रही हैं. भूतपूर्व पुलिस अधिकारी और अब वकील वाईपी सिंह इसी मुद्दे पर फ़िल्म बना रहे हैं और इसकी कुछ क्लिप्स वो यूट्यूब पर लगा भी चुके हैं.

क्या ये किसी हादसे से फ़ायदा उठाने जैसा नहीं है, वाईपी सिंह कहते हैं, ‘‘26 नवंबर एक मुद्दा है लेकिन मैं इसके ज़रिए भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहता हूँ. अगर कोई चीज़ कोई संदेश दे रही है तो उसमें बुराई नहीं है. बाज़ार का सिद्धांत है. अगर पब्लिसिटी होती है तो इसमें बुरा क्या है. किसी चीज़ पर पैसा लगेगा तो फ़ायदा ही होगा उस मुद्दे के लिए.’’

लेकिन क्या इससे लोगों की भावनाएं आहत नहीं होती हैं. शायद उनकी भावनाएं आहत होती हैं जिनके परिवार इससे सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं. उन लोगों की भावनाएं आहत नहीं होती जिन्होंने अपनों को नहीं खोया है. वो तो इस हादसे का हिस्सा होना चाहते हैं.

शायद इसीलिए लियोपोल्ड कैफ़े में 300 रुपए के कॉफी मग हाथों हाथ बिक जाते हैंऔर न ही ताज होटल के पास कमांडो की शक्ल के खिलौनों की मांग बहुत अधिक रहती है.

आने वाले दिनों में 26 नवंबर पर क़िताबें भी लिखी जाने वाली हैं. स्टार न्यूज़ के मुंबई ब्यूरो चीफ़ जितेंद्र दीक्षित इस पर किताब लिख चुके हैं.

वो कहते हैं,‘‘ एक रिपोर्टर और ब्यूरो चीफ़ के नाते ये मेरी डायरी है. मैंने वो लिखा जो मैंने देखा है. किताब के ज़रिए मैंने उन आलोचकों को भी जवाब देने की कोशिश की है जो इलेक्ट्रानिक मीडिया की आलोचना करते नहीं थकते.’’

जितेंद्र भी मानते हैं कि किताबें लिखना या फ़िल्में बनाने से लोगों में जागरुकता आएगी और मुंबई हमले के बारे में उन्हें नई नई जानकारियाँ भी मिल सकेंगी.

फ़िल्म समीक्षक और सामाजिक विषयों से सरोकार रखने वाले अजय ब्रहात्मज कहते हैं कि असल में समारोह हो रहा है.

वो कहते हैं,‘‘ हम लोग कोई सार्थक काम नहीं करना चाहते. मोमबत्ती जला ली. मग ख़रीद लिया. इसी में समझते हैं कि देश के लिए कुछ कर लिया. एक तरह का आप कहिए 'मेंटल एंगेजमेंट' है 'विजुअल एंगेज़मेंट' होता है तो चीज़ें बिक रही हैं.’’

ब्रहात्मज बताते हैं कि 1947 में देश के विभाजन के बाद पहली फ़िल्म सत्तर के दशक में बनी थी. साहित्य में काम हुआ था विभाजन पर लेकिन इतनी जल्दी नहीं और जो कुछ विभाजन पर लिखा गया वो स्तरीय रहा है.

लेकिन क्या मुंबई पर जो किताबें एक ही वर्ष में आ गई वो स्तरीय हैं, ब्रहात्मज कहते हैं, ‘‘ मैंने ये किताबें पढ़ी नहीं हैं. असल में होता ये है कि सबको लगता है कि अगर बरसी के आसपास उससे जुड़ा कुछ होगा. किताब या कुछ और तो बिक जाएगा. बस इसीलिए करते हैं. पैसे की बात तो होती ही है.

अभिनेता टॉम ऑल्टर भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं. वो फ़िल्मों पर विशेष टिप्पणी करते हैं,‘‘ फ़िल्में बनाने में बुराई नहीं है लेकिन मुद्दे को सही ढंग से उठाया जाना चाहिए लेकिन बॉलीवुड में क्या आप ऐसी उम्मीद करते हैं कि वो कोई ऐसी बेहतरीन फ़िल्म बनाएंगे.’’

वैसे अमरीका में भी 9/11 की घटना हुई थी और जहां तक मुझे ध्यान है इस पर पहली फ़िल्म कम से कम चार साल बाद बनी. किताबें अब जाकर लिखी जा रही हैं लेकिन शायद इस मामले में भारत अमरीका को पीछे छोड़ चुका है.

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