'अच्छे उद्देश्य के लिए अच्छा माध्यम चाहिए'

मीनाक्षी नटराजन
Image caption मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की युवा सांसद हैं

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इस श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं कांग्रेस पार्टी की युवा सांसद मीनाक्षी नटराजन से, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं, लेकिन उनकी सादगी और ईमानदारी के चर्चे चारों ओर हैं.

पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश.

आप एक राजनेता हैं, उसमें भी ईमानदार, अलग सी, साधारण. ये सब आपको ख़ास बनाता है, आपको ये सुनकर कुछ अजीब तो नहीं लगता? सोचा कि क्यों नहीं यही ख़ूबी हर राजनेता में होनी चाहिए?

मुझे सिर्फ़ राजनेता शब्द सुनकर अजीब लगता, क्योंकि समाज में इस शब्द को नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाता है. ऐसे माहौल में राजनेता सुनना सहज ही अच्छा नहीं लगता. लेकिन अब उसकी आदत डाल रही हूँ.

राजनेता की एक नकारात्मक छवि बनी हुई है. जैसे उसे चतुर और कुछ अधिक ही चालाक होना चाहिए. उसे ग़लत काम ज्यादा करना चाहिए, हवाई जहाज़ से नीचे देखना ही नहीं चाहिए. आप तो प्लेटफॉर्म पर खड़ी नज़र आती हैं, ऑटोरिक्शा पर चलती हैं, क्या ये सब दिखावे के लिए करती हैं या सच्चे मन से ऐसी ही हैं.

इसमें दिखावा तो बिल्कुल नहीं है, क्योंकि मेरी जीवन शैली ही कुछ ऐसी है. मेरा संबंध किसी राजनीतिक घराने से नहीं है. न ही किसी ऐसे शहर से हूँ जहाँ रेलवे प्लेटफॉर्म के अलावा किसी और चीज़ से यात्रा की जा सकती है. लेकिन मेरा मानना है कि हर किसी को समय का सही उपयोग करना चाहिए. जैसे कोई केरल का सांसद है और वो ये ठान ले कि हमें ट्रेन से ही आना-जाना है तो उसे मैं रूढ़ीवादिता मानूँगी.

वैसे ही जहाँ एक रात या एक-दो घंटे में पहुँचा जा सकता है, वहाँ के लिए हवाई जहाज़ की यात्रा से बचना चाहिए, दूसरे साधन का इस्तेमाल किया जाए तो अच्छा है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

कहीं आप अपनी ऊँची उड़ान की भूमिका तो नहीं बना रही हैं?

नहीं! जब भी और जहाँ भी जाने के लिए मुझे समय बचाने की आवश्यकता होती है या काफ़ी दूर जाना होता है मैं हावाई जहाज़ से जाती हूँ. मैं अपने क्षेत्र राजधानी या अन्य ट्रेन से आसानी से जा सकती हूँ इसलिए वहाँ ट्रेन से ही जाती हूँ.

आप कहाँ पैदा हुई, किस शहर में पली बढ़ी हैं?

मेरी पैदाइश नागदा की है. वहीं पली-बढ़ी. शुरुआती तालीम भी उसी शहर में हुई. चूँकि पिताजी टेक्सटाइल इंजीनियर थे और उनका तबादला होता रहता था, इसलिए कुछ समय दूसरे प्रदेशों में भी गुज़रा. लेकिन स्कूल का अधिक ज़माना नागदा में गुज़रा.

मैंने एमएससी की पढ़ाई इंदौर के एक कॉलेज से की. फिर बाद में लॉ की पढ़ाई की.

इंदौर में ही छात्र राजनीति में प्रवेश किया. फिर ये सफ़र आगे बढ़ा और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया (एनएसयूआई) में काम करने का मौक़ा मिला.

मीनाक्षी! पिता टेक्सटाइल इंजीनियर और आपने पढ़ाई साइंस में की. तो क्या शुरू में डॉक्टर या इंजीनियर बनने का शौक़ था?

जी बिल्कुल! शुरू-शुरू में डॉक्टर बनने का शौक़ था. वो दौर दसवी पास करने के बाद था जब हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहता है. मैं भी चाहती थी कि डॉक्टर के रुप में समाज में अपना योगदान दूँ. लेकिन उस समय भी मेरे दिमाग़ में एक बात साफ़ थी कि डॉक्टर होते हुए भी लोगों के बीच काम करना है. ये बात ज़रूर है कि कि शुरू में यह बात मालूम नहीं होती है कि काम कहाँ से शुरू करनी है.

पिता जी की क्या प्रतिक्रिया थी कि आप उस पेशे में जा रही है जहाँ सिर्फ़ नालायक़ लोग जाते हैं?

मेरी राजनीतिक सक्रियता से एक प्रोफ़ेसर मुझसे बहुत ही नाराज़ रहते थे. वो मुझ से इतने नाराज़ हो गए कि उस ज़माने में जब मध्यप्रदेश में बायोकैमेस्ट्री की 10 सीटें होती थीं और जब एक सीट पर मैंने क़ब्ज़ा किया तो उनका कहना था कि एक सीट मैंने ख़राब कर दी.

मैं इतना डर गई कि जब फ़ाइनल का रिज़ल्ट आया तो मैं रिज़ल्ट लेने नहीं गई क्योंकि मुझे पकड़ लेंगे. मैंने अपनी छोटी बहन से कहा कि तुम जाओ, लेकिन उन्होंने उसको भी नहीं बख़्शा और डाँट लगाई. लेकिन जब मैं बाद में मिली तो वो ख़ुश थे और कहा कि शिक्षकों को अपने छात्रों को ऊपर जाते देखना बहुत ही अच्छा लगता है.

ज़ाहिर है माता-पिता को भी लगता था कि ये क्या पकड़ लिया. उन्हें लगता था कि मैं पढ़ने में अच्छी हूँ तो अकादमिक क्षेत्र में कुछ करूँ. लेकिन शुरुआती प्रतिरोध के बाद उन्होंने भी कहा कि मैं राजनीति में जाना चाहती हूँ तो जाने दिया जाए.

बचपन कैसा था, आप में समाजसेवा की भावना शुरू ही से थी. क्या बचपन में खेल कूद में शामिल होती थीं, क्या शैतानी भी करती थीं?

Image caption शाह रुख़ ख़ान मीनाक्षी के पंसदीदा हीरो हैं

मैं बचपन में बहुत अधिक शैतान नहीं थी पर बहतु अंतर्मुखी थी. बचपन में खेलने कूदने से ज़्यादा मेरी दिलचस्पी किताबों में थी. हाँ मेरे घर में संगीत के लिए बहुत ही अच्छा वातावरण था. मेरी बहन भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली है और गाती भी है.

संगीत, पुस्तकें और वाद-विदाद जैसे अकादमिक गतिविधियों में मेरी दिलचस्पी रहा करती थी. मैं डीबेटर रही हूँ और विश्वविद्यलय का कई बार प्रतिनिधित्व किया है.

किताबें कैसी पढ़ने का शौक़ था, पाठ्य-पुस्तक के अलावा.

साहित्यिक किताबें पढ़ने का शौक़ था. हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में. उसके अलावा भी वैसी किताबें पढ़ने का शौक़ है जिसका संबंध समाज और हमारी अर्थव्यवस्था से है.

साहित्य में प्रेमचंद को पढ़ने का बहुत ही शौक़ है और उन्हें बहुत ज़्यादा पढ़ा है. उनकी रचानाओं में 'नमक का दारोग़ा' और 'गोदान' काफ़ी पसंद है.

संगीत सुनने का शौक़ तो है, क्या आप गाती भी हैं?

नहीं मैं नहीं गाती हूँ! न ही इसकी शिक्षा ली है, न ही गले ने मेरा कभी साथ दिया. हाँ मेरी बहन गाती है. ये बात ज़रूर है कि बहन की दिलचस्पी ने संगीत की परख मुझमें भी पैदा कर दी. मेरी बहन भारतीय शास्त्रीय संगीत की फनकारा हैं. इसलिए संगीत से लगाव काफ़ी है.

मैं मूलत: दक्षिण भारतीय हूँ, इसलिए कर्नाटक शास्त्रीय संगीत भी काफ़ी पसंद है.

आपने एनएसयूआई कब ज्वाइन किया. एनएसयूआई ही क्यों, एबीवीपी, एसएफ़आई और एआईएसए क्यों नहीं?

एबीवीपी और एसएफ़आई का ख़्याल इसलिए नहीं क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई से मैं बहुत ही प्रभावित थी. महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू की आदर्श धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और समानता को देख मैं कांग्रेस से जुड़ी.

आपका झुकाव थोड़ा लेफ़्ट-सेंटर है तो आप एसएफ़आई में तो जा ही सकती थीं?

कांग्रेस पार्टी में जो लोग संवेदनशील हैं उनके लिए लेफ़्ट-सेंटर की बात कही जाती है. लेकिन लेफ़्ट के काम करने का जो तरीक़ा है उसमें हिंसा बहुत है इसलिए उससे मेरा झुकाव नहीं हो सका.

मैंने अपने राजनीतिक करियर में इस बात का ध्यान रखा कि जितना अच्छा उद्देश है उसका माध्यम भी वैसा ही उत्तम होना चाहिए.जब चुनाव हो रहे थे लोग कह रहे थे कि ये भी करना पड़ता है, लेकिन मैं कहा करती थी कि लोग ऐसा करते हैं.

वैसे छात्र राजनीति में कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ उनका कोई राजनीति में नहीं होता, पैसे नहीं होते, लड़कियाँ भी हैं. फिर भी संघर्ष तो करना ही पड़ता है. ये बताएं कि परेशानियाँ कैसी होती हैं और संघर्ष किस तरह का होता है.

किसी युवा के लिए सबसे बड़ी परेशानी ये होती है कि इस क्षेत्र में कैसे जाना है. प्रवेश द्वार कहाँ है. अगर आपको एमबीए करना है तो चीज़ें मालूम हैं. लेकिन राजनीति में आगे बढ़कर कुछ करना है तो लोगों में जानकारियाँ बहुत कम है और रास्ते इतने मुश्किल करके रखे गए हैं कि लोगों को देखकर ही घबराहट होती है.

मीनाक्षी परेशानी यह है कि जब पेशेवर और पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आना चाहते हैं तो वो कार्यकर्ता तो बनने को रहें, वो सीधे नेता बनना चाहते हैं, ये जो विरोधाभास है उसे कैसे दूर किया जाना चाहिए.

देखिए राजनीतिक संगठनकर्ता और कार्यकर्ता में कोई ख़ास अंतर नहीं होता. लेकिन राजनीति में आने वाले को ये ख़ुद तय करना होता है कि उसे क्या करना है.

सवाल यह है कि अगर आप सांसद बन जाते हैं तो आपकी हैसियत अलग हो गई और जो कार्यकर्ता है वो हमेशा हाशिए पर रहता है. ऐसे में कार्यकर्ता को क्या मिलता है.

देखिए मैं हमेशा अपने समूह के कार्यकर्ता को यह कहती रहती हूँ कि आपको कोई पदाधिकारी बना सकता है, लेकिन नेता तो कोई नहीं बना सकता. जनता आपको अच्छा जानेगी तो ख़ुद नेता बना देगी, नेता बनने के लिए किसी चिट्ठी की आवश्यकता नहीं होती.

मैंने ऐसे कई उदाहरण देखें हैं कि लगातार लोगों के बीच में रहने वाले कार्यकर्ता का अलग आनंद है, उसे ऐसा करने में मज़ा आता है. जब तक वो दिनभर में 10-15 लोगों की समस्या का समाधान नहीं निकलाते उन्हें मज़ा नहीं आता. कुछ कार्यकर्ता पंचायत स्तर पर भी काम करते हैं.

राजनीति में आपका सफ़र बढ़ता रहा, आप पदाधिकारी बन गई, राजनीति में ये बात कही जाती है कि सबकुछ सिफ़ारिश और अलग तरह के संबंध के कारण होता है.

मेरे पास ऐसा किसी तरह का संबंध नहीं था. पहले में एनएसयूआई की पदाधिकारी बनी. डेढ़ साल काम करन के बाद जब एनएसयूआई में अध्यक्ष का चुनाव चल रहा था तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने स्क्रीनिंग के बाद मेरा चुनाव किया.

जब आप राजनीति में आग बढ़ रही थी. एनएसयूआई की अध्यक्ष बन चुकी थी. पैसा और पावर आया, फिर भी ऑटोरिक्शा पर चलना, पावर का ख़ुमार न चढ़ना, ये सब कैसे हो रहा था, क्या इसके बारे में सोचा. या सोचा समझा अटल फ़ैसला था.

मैंने इस बारे में कभी सोचा नहीं. क्योंकि घर का भी माहौल ऐसा नहीं था कि इसके बिना काम नहीं चलेगा. पिताजी के पास गाड़ी थी, लेकिन वो साफ़ कहते थे कि स्कूल पैदल जाओं या साइकल से जाओ. स्कूटी उस समय दिलाउंगा जब अपने पैर पर खड़े होगे.

Image caption मीनाक्षी राहुल गाँधी को एक सीखने वाले नेता के तौर पर देखती हैं

एक तरह से देखें तो अवचेतन मन भौतिक समानों की लालच कभी नहीं रही.

इस समय आप राहुल गाँधी के साथ काम करती हैं, उनकी सचिव हैं. उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा है. राहुल के बारे में लोगों की अलग-अलग राय हैं. कुछ लोग उन्हें मूर्ख समझते हैं तो कुछ उन्हें काफ़ी तेज़ समझते हैं. सच्चाई क्या है.

सबसे पहली बात यह है कि वो एक बहुत ईमानदार शख़्स हैं और मैं समझती हूँ कि उनकी सबसे बड़ी ताक़त यह है कि वो अपने आपको नासमझ समझते हैं. उन्हें हर चीज़ की सीखने की ज़बर्दस्त ललक है और वो लगातार कहते हैं कि हमेशा सीखते रहना चाहिए. जब कोई नई चीज़ के बारे में सीखते हैं या पढ़ते हैं तो हमें भी उसके बारे में बताते हैं.

उनके साथ काम करना ज़बर्दस्त अनुभव रहा है. पिछले दस साल में मैंने जो सिखा और उनसे जो ढ़ेड साल मे सीखा. दस लास पर डेढ़ साल बहुत भारी रहा.

ऐसी तीन चीज़ें बताए.

मैं बताऊँ जब टिकट की बात चल रही थी तो मैं भोपाल में थी. राहुल जी ने फ़ोन पर पूछा कि चुनाव लड़ना है कि नहीं. मैंने कहा कि सोचना पड़ेगा. लेकिन उन्होंने कहा कि अभी बताओं. फिर मैंने हामी भर दी. बाद में जब मैं दिल्ली में उनसे मिली तो उनका कहना था कि अगर किसी के जीवन में कोई दुविधा है तो वो कुछ कर नहीं सकता. नेतृत्व वो कर सकता है जो निर्णय करना जाने.

दूसरी बात यह है कि हम सबकी सफलता तब है कि जब हम नया नेता पैदा करें.

तीसरी बात यह कि राजनीति की जो भारतीय परंपरा रही है उसे दोबारा खोजा. अर्थात लोगों के पास जाने के तरीक़े को ज़िंदा किया जो हमारी राजनीति में खो सा गया था.

आपने बाबा आम्टे के साथ काम किया है, कैसा रहा उनके साथ काम करने का अनुभव?

उनके साथ थोड़े समय के लिए काम किया है और बहुत ही अच्छा अनुभव था.

उन्होंने भी एक बात सीखाई. मैंने कहा कि हमें लोगों के लिए काम करना है, तब उनका कहना था कि नहीं-नहीं जुमले को सुधारो हम लोग इतने बड़े नहीं हो गए हैं कि लोगों के लिए काम करेंगे बल्कि लोगों के साथ काम करेंगे. आज जब मैं अपने क्षेत्र में जाती हूँ तो ये नहीं कहती हूँ कि आपके लिए ये कर दूंगी बल्कि उनकी पंच लाइन को ही दोहराती हूँ.

मैंने उनके साथ उस समय काम किया जब वो चल फिर नहीं सकते थे. मैं आनंद वन को आधुनिक भारत के तीर्थ स्थान के रुप में देखती हूँ. अन्ना हजारे और सुंदर लाल बहुगुणा जैसे लोग भी हमारे प्रेरणा के स्रोत हैं. बहुगुणा जी के साथ एक-दो जगह काम किया है. अन्ना हजारे जी से मिलने का अवसर नहीं मिला है.

आप आपनी व्याख्या दो वाक्यों में कैसे करती हैं.

एक कांग्रेसी कार्यकर्ता हूँ. सब के लिए हाज़िर हूँ.

हाल में आपने कोई फ़िल्म देखी है.

जी हाँ, रंग दे बसंती, लगे रहो मुन्ना भाई और जब वी मेट. जब वी मेट में रतलाम स्टेशन की बुराई हो गई तो उसे छोड़कर सब सीन अच्छा लगा.

सबसे पसंदीदा फ़िल्म.

शर्मीला टैगौर की 'सत्य काम' और 'दो बिगहा ज़मीन'. मुझे यह लगता है कि ये दो फ़िल्में ऐसी है कि दोबारा नहीं बन सकती.

पसंदीदा अभिनेता और अभिनेत्री.

हीरो में गुरुदत्त और हीरोइन में स्मिता पाटिल हैं. वैसे इस समय और भी हीरोइनें पसंद हैं.

गुरूदत्त ने 'प्यासा' और 'काग़ज़ के फूल' वाकई शानदार फ़िल्में बनाई हैं. आज के दौर के अभिनेताओं में शाहरुख़ ख़ान पसंद हैं उन्होंने अच्छी फ़िल्में बनाई हैं जिसमें स्वदेश एक है.

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