गैस त्रासदी की बच्चों पर छाया

भोपाल गैस पीड़ित
Image caption भोपाल गैस के दंश को अगली पीढ़ी के बच्चे भी झेल रहे हैं

"यूनियन कार्बाइड कांड के बाद की दूसरी पीढ़ी के जो बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं, वो बहुत दर्दनाक है और ख़तरनाक भी है. गैस जब निकली थी उस दिन यह नहीं सोचा था कि आने वाली पीढ़ी भी उसी दर्द को झेलेगी और हमारे घर में इस तरह के बच्चे पैदा होंगे जो जीते जी हमें यूनियन कार्बाइड के गैस की याद दिलाते रहेंगे. "

ऐसे बच्चों के बारे में बात करते करते रशीद बी भावुक हो उठती हैं.

वो कहती हैं कि ख़ुद गैस से पीड़ित जो माँ-बाप तड़प तड़प कर जी रहे थे, अब उससे कहीं ज्यादा तड़प रहे हैं.

रशीदा बी सामजिक कार्यकर्ता हैं, ख़ुद गैस पीड़ित हैं और तहमीना, मेहविश, सूरज, नेहा और नितिन जैसे प्रभावित सैकड़ों बच्चों को जानती हैं.

नेहा छह साल की है, न बोल पाती हैं, न चलती है, न देख पाती है.

उसकी माँ रजनी साहू कहती हैं कि वह बचपन से ही ऐसी ही है. नेहा का छोटा भाई नितिन जो चार साल का है, ठीक से देख नहीं पाता.

रजनी साहू की एक बेटी जो जन्म से ही बीमार रहती थी, कुछ वर्षों पहले काल के गाल में समा गई.

ये लोग यूनियन कार्बाइड की बंद पड़ी फैक्ट्री के पास के इलाक़े में बसे छोला बस्ती में रहते हैं.

भूजल प्रदूषित

कई सरकारी और ग़ैरसरकारी एजेंसियों ने पाया है कि फैक्ट्री के अंदर पड़े रसायन के लगातार ज़मीन में रिसते रहने के कारण इलाक़े का भूजल प्रदूषित हो गया है.

इन बस्तियों के ज़्यादातर लोग लेकिन आज भी इसी पानी के इस्तेमाल को मजबूर हैं.

इसी इलाक़े में रहते हैं केसर बाई और प्रताप सिंह जिनका 14 साल का बेटा शारीरिक और मानसिक कमजोरी से पीड़ित है.

केसर बाई और उनके पति दोनों गैस पीड़ित हैं.

गैस पीड़ितों के इलाज और उन पर शोध करने वाली संस्था संभावना ट्रस्ट के शोधकर्ता रितेश पाल कहते हैं कि तीन हज़ार परिवारों के बीच करवाए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि इस तरह के 141 बच्चे हैं.

रितेश पाल कहते हैं कि साल से बड़ी उम्र के बच्चों को इसमें शामिल करने पर यह संख्या और बढ़ जाएगी.

वो कहते हैं कि ये 141 बच्चे या तो शारीरिक, मानसिक या दोनों तरह की कमजोरियों के शिकार हैं.

कई के होंठ कटे हैं, कुछ के तालू नहीं हैं या फिर दिल में सुराख हैं, इनमें से काफ़ी सांस की बीमारियों के शिकार हैं.

पीड़ित बच्चे

संभावना ने यह शोध तब शुरू करवाया जब उसके अस्पताल में ऐसे बच्चे बड़ी संख्या में आने लगे.

यह सर्वेक्षण उन 17 बस्तियों में जारी है जो कार्बाइड की बंद पड़ी फैक्ट्री के आसपास बसी हैं और इसमें उन दोनों तरह के बच्चों को शामिल किया गया हैं जो या तो गैस पीड़ित परिवार में पैदा हुए हैं या जो इस इलाक़े के भूजल का इस्तेमाल कर रहे हैं.

कई अलग अलग तरह की विकृतियों के शिकार बच्चों के लिए अब उम्मीद की एक किरण उस विशेष स्कूल है जहाँ व्यायाम और स्पीच थेरपी का इंतज़ाम है, साथ दूसरी गतिविधियां भी स्कूल के चार घंटों के दौरान इनसे करवाई जाती है.

रशीदा बी कहती हैं कि उनकी इच्छा हैं कि ये बच्चे कम से कम इस काबिल बन जाएँ कि वे लोगों को अपनी बात समझा सकें जिसमें हम थोड़ा बहुत कामयाब हुए हैं.

शासन ने अब तक इस तरह के बच्चों को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की है.

अब तक किसी सरकारी संस्था ने कोई अध्ययन भी शुरू नहीं किया है या न ये जानने की कोशिश की है कि क्या जन्मजात विकृतियों या गंभीर बीमारियों के साथ पैदा हो रही ये पीढियां गैस कांड से जुड़े किन्ही कारणों का नतीजा हैं या कुछ और.

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