कार्बाइड फ़ैक्ट्री खोलने की इजाज़त

भोपाल गैस प्रदर्शन
Image caption भोपाल गैस त्रासदी के पचीस साल बाद भी संघर्ष जारी है

वर्षों की कोशिश के बाद आख़िरकार प्रशासन को दो दशकों से अधिक बंद पड़ी यूनियन कार्बाइड फ़ैक्ट्री खोलने की इजाज़त मिल गई है.

स्थानीय प्रशासन ने जबलपुर हाई कोर्ट में अर्ज़ी दी थी कि वह कार्बाइड फ़ैक्ट्री को भोपाल गैस कांड की 25वीं बरसी पर दो हफ़्ते के लिए खोलना चाहती है.

दिसंबर 2/3 सन् 1984 को गैस के रिसने के बाद फ़ैक्ट्री प्रशासन के क़ब्ज़े में थी, बाद में इसे कोर्ट ने अपने कब्ज़े में ले लिया और उसमें जाने के लिए ज़िलाधिकारी से विशेष अनुमति लेनी पड़ती थी.

मध्य प्रदेश सरकार के गैस राहत मंत्री बाबूलाल गौड़ कहते हैं कि जब लोग न्यूयॉर्क में 'ग्राउंड ज़ीरो' (जहाँ कभी वर्ल्ड ट्रेड टावर हुआ करता था) के दर्शन कर सकते हैं तो भोपाल आने वालों को फ़ैक्ट्री के भीतर जाने की इजाज़त क्यों नहीं मिलनी चाहिए.

उनका तर्क है कि लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि यह सब किस प्रकार हुआ और "हम इस मामले में हर तरह की एहतयात बरतेंगें."

गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाली संस्थाएं कहती रही हैं कि फ़ैक्ट्री को खोला जाना सुरक्षित नहीं है क्योंकि उसके भीतर हज़ारों टन रासायनिक कचरा पड़ा है.

फ़ैक्ट्री के चालू रहते भी जो कचरा ज़मीन के भीतर दबाया गया था, वह अब भी वहीं मौजूद है, ऐसी बातें भी बार-बार कही जाती रही हैं.

ख़तरनाक कचरा

कई सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थाएँ जिनमें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ज़रिए बनाई गई कार्य समिति और तमिलनाडु प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड शामिल हैं, यह कहती रही थीं कि फ़ैक्ट्री में पड़ा कचरा इस क़दर ख़तरनाक है कि उसका जो हिस्सा बारिश के साथ रिस कर ज़मीन के भीतर पहुँच रहा है उसने आसपास के इलाक़ों के भूजल को दूषित कर दिया है.

फ़ैक्ट्री खोलने की अर्ज़ी देते हुए मध्य प्रदेश शासन ने ग्वालियर स्थित डिफ़ेंस रिसर्च एंड डेवेलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट और चिट्ठी का हवाला दिया है.

डीआरडीई के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि फ़ैक्ट्री में मौजूद रसायनों की जांच से सामने आया है कि वह स्तनधारी जीवों के लिए बहुत कम विषैला है.

यह भी कहा गया है कि वहां रखे गए विषैले कचरे का त्वचा पर उतना असर नहीं होगा.

अनुसंधान संस्थान के कार्यकारी निदेशक के ज़रिए लिखी गई चिट्ठी में कहा गया है कि उन्होनें ख़ुद कई बार फ़ैक्ट्री का भ्रमण किया है जिसमें कई दफ़ा उनके साथ सुप्रीम कोर्ट के ज़रिए गठित निगरानी समीति, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का अमला और दूसरे विभागों के अधिकारी रहे हैं और उन्होनें पाया है कि इस दौरान इन लोगों को स्वास्थ्य की कोई दिक्क़त नहीं आई इसीलिए फ़ैक्ट्री को खोला जा सकता है.

हालाँकि भोपाल प्रशासन पिछले साल तक फ़ैक्ट्री के भीतर पड़े कचरे को गुजरात के अंकलेश्वर ले जाकर डंप करने की बात कर रहा था और जब गुजरात सरकार ने इससे इनकार कर दिया तो इसका कुछ हिस्सा इंदौर के नज़दीक बने पीथमपुर ले जाया गया.

स्मारक

प्रशासन का यह भी कहना है कि वह वहां एक स्मारक बनवाना चाहती है जिसके लिए 116 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है.

Image caption भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित 25 साल बाद भी गुहार लगा रहे हैं

गैस पीड़ितों के लिए वर्षों से काम कर रहे अब्दुल जब्बार कहते हैं, “सरकार अगर स्मारक बनाना चाहती है तो बनवाए लेकिन उसके लिए 116 करोड़ और वह भी उस सरकार के ज़रिए जो पीड़ितों के इलाज के लिए पूरे फ़ंड न मुहैया करवा पा रही हो?"

इस दौरान चंद महीने पहले भोपाल आए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अपने भोपाल दौरे के दौरान फै़क्ट्री जाकर वहां की मिटटी उठाई और कहा मैं तो उठा रहा हूँ देखिए मुझे कुछ नहीं हुआ, कहाँ है ज़हर?

सामाजिक कार्यकर्ता सतीनाथ सारंगी कहते हैं, “यह उसी तरह की बात हुई कि आप हाथ में सिगरेट ले लो और कहो देखो मुझे कैंसर नहीं हुआ.”

संभावना ट्रस्ट की रचना ढींगरा कहती हैं, “यह अमरीका-भारत और राज्य सरकारों की मिलीभगत है वरना कभी डॉउ केमिकल्स से कचरा साफ़ करने के लिए फंड मांगने की पहल करने वाली केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने अचानक इसपर चुप्पी क्यों साध रखी हैं और सरकारें यह क्यों साबित करने पर तुली हैं कि परिसर में गड़ा हुआ कचरा ज़हरीला नहीं है.”

उनका यह भी कहना है कि उसकी एक ही वजह है जब ज़मीन का कचरा विषैला नहीं है तो ज़ाहिर है उससे भूजल को नुक़सान नहीं हुआ है और इस तरह डॉउ केमिकल्स प्रदूषण फैलाने वाला इसकी सफ़ाई के लिए पैसे देने की ज़िम्मेदारी से बच जाएगा जिसकी मांग बार-बार संस्थाओं और नागरिकों द्वारा उठाई जाती रही है.

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