राजनीतिक दल भूले भोपाल गैस पीड़ितों को

भोपाल गैस पीड़ित
Image caption भोपाल गैस लीक के कारण हज़ारों लोग मौत की नींद सो गए

भारत में इन दिनों विधानसभा चुनावों का मौसम है. पाँच राज्यों की लड़ाई पर देशभर की नज़र है. राजनीति हो रही है, मुद्दे उछाले जा रहे हैं, उपलब्धियाँ गिनाई जा रही हैं, वोट मांगे जा रहे हैं.

पर मध्य प्रदेश के राजनीतिक दलों को 24 साल से तड़प रही राज्य की राजधानी की लगभग आधी आबादी का मुद्दा इस बार शायद मुद्दा ही नहीं लग रहा है.

वर्ष 1984 में हुई दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी यानी भोपाल गैस कांड को स्थानीय स्तर पर ही राजनीतिक दलों ने अनदेखा कर दिया है.

हालाँकि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्रों के भीतरी पृष्ठों में इस त्रासदी के पीड़ितों के लिए राहत के प्रयास करने की बात कही है पर राजनीतिक मंचों पर यह मुद्दा एकदम नदारद ही है. बाकी राजनीतिक दल भी इस पर कुछ कहते, बोलते नज़र नहीं आ रहे हैं.

मध्यप्रदेश से बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली ने बताया कि इस बार किसी भी पार्टी की ओर से भोपाल गैस पीड़ितों का मुद्दा नहीं उठाया जा रहा है. पीड़ितों ने ज़रूर एक-दो मोर्चे, रैली निकालकर अपने इस मुद्दे को चर्चा में लाने की कोशिश की पर राजनीतिक पार्टियों के कान में जूँ रेंगती नज़र नहीं आ रही है.

क्यों भूले भोपाल त्रासदी

भोपाल गैस पीड़ितों के सवालों को लेकर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल जब्बार ने बीबीसी को बताया, "यह विडंबना ही है कि 12 लाख मतदाताओं वाले भोपाल में लगभग पाँच लाख प्रभावितों का मुद्दा इस बार अनदेखा कर दिया गया है. दरअसल, साफ़ दिख रहा है कि राजनीतिक दलों के लिए ग़रीब और उनके सवाल अब फ़ोकस नहीं रह गए हैं."

जब्बार इसकी वजहों को समझाने की कोशिश करते हुए कहते हैं कि 24 बरसों पुरानी इस त्रासदी के लिए लोगों को जो भी राहत या सहायता मिली, उसकी वजह राजनीतिक दल नहीं रहे, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट इसकी वजह थे. राजनीतिक दलों ने तो इस मुद्दे पर केवल राजनीतिक रोटियाँ सेंकीं हैं.

भोपाल गैस पीड़ितों के सवालों पर नज़र रखते आए कुछ विशेषज्ञों से जब इस सिलसिले में बात की तो उन्होंने बताया कि राज्य में मोतालाल वोरा की सरकार के बाद से किसी भी मुख्यमंत्री ने भोपाल गैस पीड़ितों के लिए ऐसा कुछ नहीं किया, जिसे संतोषजनक कहा जा सके.

और तो और, अब गैस पीड़ितों के लिए बने अस्पताल, राहत कोषों और अन्य योजनाओं पर भी ताला लगाने की बारी आती दिखाई दे रही है.

जानकार बताते हैं कि भाजपा ने इस मुद्दे को पिछले चुनाव तक उठाया तो पर कोशिश नए भोपाल के लोगों को भी (जो हिंदू बहुल इलाक़ा है) मुआवज़ा दिलाने की लड़ाई बनकर ही रह गया और पीड़ित को पीड़ित नहीं, पहचान की नज़र से देखा जाने लगा.

भोपाल गैस पीड़ित इस सिलसिले में वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर केंद्र और राज्य सरकार के कई नेताओं को आड़े हाथों लेते हैं.

ग़ौरतलब है कि 1989 में यूनियन कार्बाइड से सात अरब 15 करोड़ रुपए का समझौता हुआ था वह इस आधार पर था कि गैस रिसाव से तीन हज़ार लोगों की मौत हुई थी और एक लाख बीस हज़ार लोग प्रभावित हुए थे.

लेकिन चार साल पहले जो आधिकारिक आंकड़े आए उनके अनुसार अब तक इस दुर्घटना में मारे गए लोगों की संख्या 15 हज़ार है और पाँच लाख से अधिक पीड़ित हैं. इसके बाद से ही पुनर्वास से लेकर स्वास्थ्य और बाकी राहतों की माँग और मज़बूत हुई है.

दलों का दोहरा चरित्र..?

Image caption दफ़नाने वाले भी गैस के प्रभाव से अछूते नहीं थे

1984 में जब भोपाल गैस त्रासदी हुई थी तो भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकार की मंशा, राहतकार्यों और प्रतिबद्धता को मुद्दा बनाया था. कांग्रेस के कुछ नेताओं पर विपक्ष ने यूनियन कार्बाइड का पक्ष लेने के आरोप लगाए.

इस तरह दो दशकों से इस मुद्दे पर राजनीति होती रही पर भोपाल गैस पीड़ित अभी भी अभावों और तकलीफ़ की कहानी दोहराने को विवश हैं. कभी राज्य के चौराहों पर तो कभी दिल्ली की सड़कों पर.

पिछले पाँच बरसों से राज्य में भाजपा की सरकार है. मध्यप्रदेश में राज्य सरकार के वर्तमान गैस राहत मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर से हमने इस बारे में पूछा कि क्या कारण है कि भोपाल गैस पीड़ित उनका विरोध कर रहे हैं और उनपर गैस पीड़ितों के लिए कुछ न करने का आरोप लगा रहे हैं.

इसके जवाब में गौर ने भोपाल गैस पीड़ितों की उपेक्षा की बात को बेबुनियाद बताया और कहा कि भोपाल गैस पीड़ित भोपाल के केवल उतने हिस्से में नहीं हैं, जिनकी लड़ाई एनजीओ और जनसंगठन लड़ने का दावा कर रहे हैं, बल्कि नए भोपाल के भी लोग इससे प्रभावित हुए थे.

उन्होंने कहा, "नए भोपाल के लोगों को राहत मुआवज़े की बात करके इस मुद्दे को और बड़ा बनाया है. उपेक्षा हुई है पर राज्य की ओर से नहीं, केंद्र की ओर से. केंद्र सरकार से कई बार गुहार लगाने के बाद भी यूपीए पीड़ितों की मदद के लिए आगे नहीं आ रही है."

कहने, करने का फ़र्क

इसी वर्ष सूचना का अधिकार क़ानून के तहत जब देश के प्रमुख राजनीतिक दलों को मिल रहे चंदे का हिसाब मांगा गया तो पता चला कि गैस प्लांट की वर्तमान मालिक डाओ कैमिकल्स ने भारतीय जनता पार्टी के कोष में भी चंदा जमा करवाया है.

ऐसे में कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि डाओ कैमिकल्स से चंदा ले चुकी पार्टी अब किस नैतिकता की चादर ओढ़कर लोगों से भोपाल गैस पीड़ितों को राहत की बात कहे और कांग्रेस पर कीचड़ उछाले.

पर बाबूलाल गौर इस सवाल पर अलग राय रखते हैं, उन्होंने यह सवाल उठाने पर कहा, "चंदा हमें नहीं, दिल्ली में दिया गया. उन्होंने पैसा जबरन भेज दिया तो क्या किया जा सकता था. फिर चंदा भी केवल एक लाख रूपए का ही था. उससे हम क्या करेंगे. इतना पैसा तो आजकल एक पार्षद को मिल जाता है."

जानकार मानते हैं कि डाओ कैमिकल्स से चंदे का मुद्दा सामने आने के बाद भाजपा के लिए भी भोपाल गैस पीड़ितों के मुद्दे को ज़ोरदार ढंग से उठाना और कांग्रेस को इस मुद्दे पर घेरना आसान नहीं रह गया है.

वजहें जो भी गिनाई जाएं, तर्क जो भी मिलें पर इतना तो साफ़ है कि सियासत के नए और उथले दांवों से खेली जा रही राजनीति की कुश्ती में मानवीय और नैतिक सवालों पर अब ध्यान कम ही दिया जा रहा है.

भोपाल गैस एक मुद्दा है. कुपोषण, शिक्षा, पुनर्वास और बदतर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी चुनावी बिगुल कहाँ सुनाई दे रहे हैं.

घोषणा पत्र में स्याही के कुछ छींटे ज़रूर हैं पर लोग पार्टियों को घोषणा पत्रों के ज़रिए नहीं पहचानते और जिन्हें वे पहचानते हैं, उनकी ज़बान से ऐसी कई त्रासदियाँ, ऐसे कई मुद्दे ग़ायब हैं.

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