लिबरहान रिपोर्ट: कागज़ का एक पुलिंदा

बाबरी मस्जिद विध्वंस
Image caption बाबरी मस्जिद विध्वंस के 18 वर्षों के बाद लिबरहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी

अयोध्या में 17 वर्ष पूर्व मस्जिद किस समुदाय की गिरी: भारतीय मुसलमानों की. उसके तुरंत बाद भीषण दंगों में मारे जाने वाले लगभग 2000 व्यक्तियों में अधिकतर कौन लोग थे: मुसलमान. फिर उस समय से वर्ष 2002 के गुजरात दंगो तक राम मंदिर के नाम पर हिंदुत्व राजनीति की आड़ में निशाना कौन बना: भारतीय मुस्लिम समुदाय. और इस संपूर्ण प्रकरण में भारतीय मुस्लिम समुदाय के हाथ आया क्या: लिबरहान कमीशन रिपोर्ट.

यह बहुचर्चित लिबरहान रिपोर्ट कहती क्या है? बाबरी मस्जिद ढहाने का संपूर्ण दायित्व आरएसएस और संघ परिवार का है. लिबरहान रिपोर्ट की दूसरी बडी खोज यह है कि बाबरी मस्जिद ढहाने का माहौल बनाने में 'लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और अटल बिहारी वाजपेयी' जैसे लोगों ने अहम भूमिका निभाई. यह रिपोर्ट कुछ अफ़सरों पर भी यह आरोप लगाती है कि उन्होंने संविधान की जो शपथ ली थी, उसके विरुद्ध वह कार्य किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था.'

अब सवाल यह है कि इस रिपोर्ट के बाद क्या इन तीनों समूहों, जिनकी बाबरी मस्जिद ढहाने में बड़ी भूमिका थी, को क्या दंड मिलने वाला है? आरएसएस और संघ परिवार अब भी वैसे ही दनदना रहा है जैसे छह दिसंबर 1992 को दनदना रहा था. लिबरहान रिपोर्ट पेश होने के बाद विश्व हिंदू परिषद के मुखिया अशोक सिघंल जी यह मांग कर रहे है कि अब काशी और मथुरा से भी मस्जिद जानी चाहिए और इसके लिए विश्व हिन्दू परिषद 'फिर संतो और महंतो को सड़कों पर उतारेगी.'

यानी आरएसएस और संघ परिवार का लिबरहान रिपोर्ट के पहले ना कोई बाल बांका हुआ था और न ही अब होगा. रहा सवाल आडवाणी जी, मुरली जी, उमा जी आदि व्यक्तियों का अयोध्या मामले में दंडित किए जाने का तो अदालतों में इन लोगो पर मुक़दमे चल रहे है और वर्षों चलते रहेंगे. भले ही आडवाणी जी को बाबरी मस्जिद गिरने पर 'पीड़ा और संवेदना' हो लेकिन कल्याण सिंह जैसों को 'न कोई पीड़ा है और न कोई खेद है.'

वे अफ़सर जिन्होंने मस्जिद गिरवाने में बड़ा योगदान दिया, उनका क्या होगा? समाचारों के अनुसार कुछ रिटायर हो गए और कुछ बड़े-बड़े पदों पर अभी भी मज़े कर रहे हैं.

'बंधुआ वोट बैंक'

लब्बोलुआब यह कि लिबरहान रिपोर्ट के बाद भी मस्जिद गिराने वालों का बाल भी बांका नही होना है. यानी उस मुस्लिम वर्ग, जिसकी बाबरी मस्जिद गिरी, जो दंगो में मारा गया और जिसको हिंसा झेलनी पड़ी, उसके हाथ आया लिबरहान रिपोर्ट के रूप में कागज़ का एक पुलिंदा.

अब भारतीय मुस्लिम समुदाय करे तो करे क्या? उसके सामने केवल एक उपाय है: सेकुलरिज्म का गुणगान करे और कांग्रेस पार्टी के सामने नतमस्तक रहे.

कांग्रेस जब तक सत्ता में रहेगी तब तक मुसलमान सुरक्षित रहेगा, यह सोच कर वह कांग्रेस का बंधुआ वोट बैंक बना रहे.

यदि कांग्रेस सत्ता से बाहर तो भारतीय जनता पार्टी सत्ता के अंदर और भाजपा सत्ता में आई तो सिघंल जी के अनुसार अब मथुरा और काशी की मस्जिद जाएगी और न जाने कितने और गुजरात होंगे. इसलिए मुसलमान कांग्रेस और भाजपा के चक्रव्यूह में फँसा रहे और बाबरी मस्जिद जैसी बातों को भूलकर कांग्रेस का बंदी बना रहे.

लेकिन ठहरिए! वर्ष 1990 के दशक में मंदिर राजनीति के साथ ही एक और राजनीति उभरी थी जिसको मंडल राजनीति की संज्ञा दी गई थी. उस मंडल राजनीति ने इस देश में क्षेत्रीय पार्टियों और क्षेत्रीय नेताओं को जन्म दिया था. कहीं मुलायम तो कहीं लालू एवं पासवान, कहीं करूणानिधि तो कहीं चन्द्रबाबू जैसे क्षेत्रीय नेताओं ने इस देश का राजनीतिक 'पावर बैलेंस' बदल दिया था. इस राजनीतिक परिवर्तन में भारतीय मुस्लिम वर्ग ने कांग्रेस और भाजपा चक्रव्यूह तोड़ कर अपने लिये एक विकल्प ढूंढ़ लिया था.

सारांश यह है कि पिछले 60 वर्षों में भारतीय वोटर अत्यंत परिपक्व हो चुका हैं. अब किसी समुदाय और किसी जाति के लिए राजनीतिक रास्ते बंद नही है. इसलिए यदि कांग्रेस मुस्लिम वर्ग को केवल कागज़ का पुंलिदा थमाकर निश्चिंत रहे तो यह उसकी भूल होगी.

यदि कांग्रेस ने अभी भी मुस्लिम वोटर बैंक को अपना बंधुआ समझा तो यह वोट बैंक आने वालो वर्षो में काग्रेस को भी ठेंगा दिखा सकता है. तभी तो कहते है बड़ी कठिन है डगर वोट बैंक राजनीति की.

(लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं और बीबीसी उनके लिए ज़िम्मेदार नहीं है)

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