भारत अमीर देशों के दबाव मे ना आए

Image caption सेंटर फॉर साईंस एंड एंवॉयरमेंट ने कहा है कि कोपनहेगन मे विकासशीलदेशों को अमीर देशों के दबाव मे नही आना चाहिए.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने कहा है कि भारत को निश्चित तौर पर कार्बन उत्सर्जन की दर को कम करना चाहिए.

कार्बन उत्सर्जन की दर को कम करने के लक्ष्य को निर्धारित करने से इस दिशा मे मदद मिलेगी. इस संस्था का कहना है, "तय लक्ष्य बताते हैं कि भारत पहले ही इस रास्ते पर है और 1990 से 2005 के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मे कार्बन उत्सर्जन की दर 17 प्रतिशत कम हुई यानी मौटे तौर पर एक प्रतिशत प्रतिवर्ष."

भारत ने हाल ही मे स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन की दर मे कमी का जो लक्ष्य रखा है, उसको लेकर कुछ आशंकाएं प्रकट की गई है. संस्था का कहना है कि भारत सरकार को इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं स्वेच्छा से रखे गए इन लक्ष्यों को दुनिया के अमीर देश, विकासशील देशों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के रुप मे न थोप दें.

संस्था की अध्यक्ष सुनीता नारायण ने एक प्रेस कॉंफ्रेंस मे अपनी आशंका प्रकट करते हुए कहा "कोपेनहेगेन मे भारत सरकार को ध्यान रखना है और उसे ये सुनिश्चित करना चाहिए कि विकासशील देश स्वेच्छा से रखे लक्ष्यों के उन्ही हिस्सों की समीक्षा स्विकार करें, जिनके लिए आर्थिक मदद और तकनीक दी जाए. इस मुद्दे पर विकासशील देश कोई समझौता नहीं कर सकते. सच ये है कि अगर विकासशील देश अंतरराष्ट्रीय समीक्षा या पुष्टि के लिए तैयार हो जाते हैं तो ये एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता बन जाएगी, और बाध्यकारी हो जाएगी."

संस्था का कहना है कि कोपनहेगन मे एक प्रभावी समझौता होना चाहिए, जिसके तहत अमीर देश अपने कार्बन उत्सर्जन मे भारी कटौती करें और विकासशील देशों को आर्थिक मदद और तकनीक उपलब्ध कराए.

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कल संसद मे एक बयान मे कहा था कि भारत ने 2020 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद की तुलना मे कार्बन उत्सर्जन की दर 20 से 25 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य रखा है.

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