हिंसा ने मन पर गहरा घाव छोड़ा

कश्मीरी महिला
Image caption पिछले कुछ वर्षों से जम्मू कश्मीर में चरमपंथी हिंसा में कमी आई है

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के दूर दराज़ पहाड़ी क्षेत्रों में अलगाववादी हिंसा शुरू होने से पहले महिलाओं का जीवन ख़ुशहाल हुआ करता था.

बिना किसी भय के अपनी मस्ती में वे जीवन जीती थी. लेकिन 20 वर्ष पहले जैसे-जैसे चरमपंथी हिंसा अपना पांव पसारती गई, इनके आस-पास भय की चादर फैलती गई. जिससे न केवल इनका जीवन सिकुड़ कर रह गया बल्कि इनकी मानसिकता पर यह एक गहरी छाप छोड़ गया.

ऊंचे पहाड़ों, खुली हवा और झरनों के साथ साथ ये हज़ारों महिलाएँ खुले माहौल में रहती थी. अपने घरों के काम काज निपटा कर ये इकट्ठे होकर जंगलों और पहाड़ों में माल-मवेशी चराने जाया करती थी. खेती बाड़ी में साथ देती थी और ये जंगलों में से जड़ी बूटी चुनती थी, जिनकी इन्हें खूब पहचान होती थी.

किश्तवाड़ में एक ग़ैर सरकारी संस्था के सचिव नुसरत फारूक ने बीबीसी को बताया, "इन महिलाओं का जीवन पहले बहुत ही खुला और आज़ाद हुआ करता था. बेफिक्री और सुकून भरा था. छोटे-मोटे काम करके वो घर के लिए कुछ पैसा भी कमा लेती थी."

वो दिन...

शकीला बेगम हूलर गाँव की रहने वाली हैं. पुराने दिनों को याद कर उनकी आँखों में आंसू भर आए. वे कहती हैं, "मुद्दत हुई खुला और आज़ाद माहौल नहीं देखा."

सफ़ेद बाल, फटा हुआ स्वेटर और पुराना शाल ओढ़े हुए सुरैया बेगम को वो दिन याद आते हैं जब वह जंगलों में माल-मवेशी चराया करती थी, लकड़ी इकट्ठा करती थी और मिल कर लोक गीत गाया करती थी.

मस्ती में जीने वाली इन महिलाओं ने कभी सपने में भी न सोचा था कि यहाँ हिंसा भड़केगी और उनका जीवन तहस नहस हो जाएगा. इन ख़ूबसूरत पहाड़ों पर चरमपंथियों ने अपने ठिकाने बना लिए और उन्हें खदेड़ने के लिए सुरक्षाबलों की छावनियां बन आई. इसका सबसे अधिक प्रभाव इन महिलाओं पर पड़ा जिनका बाहर निकलना असंभव हो गया.

सुरैया बेगम ने नम आँखों से बताया, "हमें कभी मिलिटेंट तंग करते थे और कभी फ़ौज. मिलिटेंट इसलिए तंग करते थे कि उन्हें आशंका थी कि हम उनकी ख़बर लीक न कर दें और फ़ौज हमसे मिलिटेंटों का पता ठिकाना पूछते थे. "

बात करते-करते पास में बैठी शमीमा ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. पूछने पर उसने बताया, "मुझे तो हमेशा वो मंजर याद आता है जब मिलिटेंटों ने मेरे भाई को गोली मारी थी और उसने मेरी बाँहों में दम तोडा था. मेरे पास तो वो सब बताने के लिए अलफ़ाज़ नहीं हैं."

इन वर्षों में आए दिन महिलाओं पर सुरक्षा बल और चरमपंथियों के अत्याचार की खबरें सामने आती रही. बलात्कार की कई घटनाएं सामने आईं.

कई ऐसी घटनाएँ हुई जब चरमपंथियों ने लड़कियों से ज़बरदस्ती विवाह किए.

तीन बच्चों की माँ 25 वर्षीय जाकिर विधवा है. "मिलिटेंट मेरी 12 साल की बहन के साथ ज़बरदस्ती शादी करना चाहते थे. जब हमने इनकार किया तो तीन महीने पहले मेरे पति को उन्होंने मार डाला. अब हम अपने गाँव से भाग कर यहाँ किश्तवाड़ में रहते हैं."

बीच-बीच में चरमपंथी लड़कियों को पर्दे में रहने और पढ़ाई न करने के फरमान जारी किया करते थे. परिणाम यह हुआ की महिलाओं में भय बढता गया. धीरे धीरे इस माहौल ने इनकी मानिसकता पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया. यहाँ कई औरतें मानसिक रोग का शिकार हो गई.

अब चाहे माहौल बदल रहा हो, लेकिन इन महिलाओं का कहना है कि उनके जीवन शैली और मानसिकता पर इसने जो छाप छोड़ी है वह पीढ़ी दर पीढ़ी दिखाई देंगे.

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