अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है भाजपा

लाल कृष्ण आडवाणी
Image caption भाजपा में आडवाणी के कम होते राजनीतिक क़द पर लगातार सवाल उठ रहे हैं

भारतीय जनता पार्टी का द्वंद उस समय भी दिखा जब बाबरी मस्जिद विध्वंस पर लिबरहान रिपोर्ट पर संसद में पार्टी नेताओं ने अपनी-अपनी बातें रखीं.

जहाँ तक पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने हमलावर रुख़ अपनाया और एक तरह से विध्वंस को सही ठहराया और इस बात पर ज़ोर दिया कि राम मंदिर वहाँ है. वहीं उनके साथी अरूण जेटली कहीं अधिक सावधान नज़र आए.

राज्यसभा में पार्टी के विपक्ष के नेता जेटली ने घटिया रिपोर्ट की कमियों पर चालाकी के साथ हमला किया. लेकिन वैंकया नायडू ने पार्टी के एक बड़े राजनेता की विरासत को बढ़ाने की बात कही और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की ज़रूरत पर बल दिया.

यह विरोधाभास पहले से ही तय नहीं था. यह आंशिक रुप से व्यक्तित्व की लड़ाई है, लेकिन निश्चित तौर पर यह खींचतान, पार्टी में दोबारा जान फूंकने के लिए किस रास्ते पर चला जाए, उसे लेकर है.

मई, 2009 में लगातार दूसरी बार लोकसभा के चुनावों में हार के बाद भाजपा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. हार के नतीजों ने संकेत दिए कि पार्टी में बुनियादी तौर पर तीन कमियां हैं.

आडवाणी फीके पड़े

पहला, पार्टी के सबसे बड़े वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी में ऐसी क्षमता नहीं रही कि वो मतदाताओं को रिझा सकें, जैसाकि एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने कर दिखाया था.

दूसरा, ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी उन समाजिक समूहों यानी युवा और मध्यवर्ग को जोड़ने में असफल है, जिन्होंने 90 के दशक में भरपूर जोश के साथ उनका समर्थन किया था.

ऐसे भी संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा को हिंदू आतंकवादी राष्ट्रवाद से रिश्ता काफ़ी महंगा पड़ा. द्वेषपूर्ण भाषण और सांप्रदायिक हिंसा से पार्टी के जुड़ने से उदार हिंदू दूर हुए.

आख़िर में पार्टी की मौजूदगी अखिल स्तर पर न होने से क्षेत्रीय पार्टियों पर निर्भर रहना पड़ा है.

दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि भाजपा के बहुत से पुराने साथी उनके चुनाव जीतने की ताक़त को परखना शुरू कर दिया जिसके नतीजे में भाजपा दक्षिणी और पूर्वोत्तर भारत के कई अहम राज्यों में बिना किसी साथी के रह गई.

भाजपा की हार को लेकर दो बुनियादी दृष्टिकोण थे. पार्टी में इस बात को लेकर सहमति थी कि नेतृत्व के लिए वाजपेयी और आडवाणी के आगे देखे जाने की ज़रूरत है, सिर्फ़ मतभेद इस बात को लेकर था कि नया नेता का चेहरा कैसा हो.

भाजपा का इलाज

Image caption राजनाथ सिंह का अध्यक्ष पद से जाना तय माना जा रहा है

भाजपा का वो समूह जो राजनीतिक मार्गदर्शन के लिए राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ पर निर्भर करता है, उनका कहना था कि भाजपा में गडबड़ी इसलिए आई है कि उसने अपने संगठनात्मक पारदर्शिता और हिंदुत्वा पर समझौता किया है. भविष्य में इसका इलाज संगठन पर आरएसएस का कड़ा नियंत्रण और हिंदुत्व पर केंद्रित होना है.

जबकि भाजपा नेताओं का एक बड़ा समूह जिनमें नाममात्र रुप से आएसएस से भी जुड़े हुए नेता हैं, राजनीतिक अलगाव का ख़तरा नहीं मोल लेना चाहता.

इनमें वो लोग शामिल हैं जो आडवाणी से जुड़े हुए हैं और जिनका भाजपा के मुख्यमंत्री समर्थन करते हैं.

ऐसे नेताओं का कहना है कि भाजपा का एक उदार चेहरा होना चाहिए और हिंदुत्व का प्रयोग प्रतीकात्मक रुप से किया जाना चाहिए और पार्टी का दृष्टिकोण दक्षिणपंथी के साथ-साथ मध्यमार्गी भी हो.

हालाँकि भाजपा ने अपने इस राजनीतिक भ्रम को सीधे तौर पर संबोधित नहीं किया है.

आरएसएस सीधे तौर पर नितिन गडकरी को भाजपा के अगले अध्यक्ष बनाने में सफल हो गया है.

आरएसएस अपने लगभग तीन सौ कार्यकर्ताओं को संगठन के पदों पर बैठा चुका है, फिर भी पार्टी के नीति निर्धारण और संसदीय अंग के आचरणों पर इसका बहुत असर नहीं दिखा है.

अबतक देखने से लगता है कि लड़ाई की तैयारी हो चुकी है, अगले कुछ महीनों में पार्टी पर नियंत्रण के लिए वास्तविक जंग देखी जा सकती है.

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