मगर आडवाणी वाजपेयी नहीं हैं

आडवाणी
Image caption आडवाणी का जिन्ना को सेकुलर कहना उन्हें काफ़ी महंगा पड़ा

ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे कि कोई राजनेता तीन-साढ़े तीन दशक तक अपने दल के शीर्ष पर रहने के बाद अचानक अप्रासंगिक हो जाए, वह भी तब जब उसकी शारीरिक, बौद्धिक, राजनीतिक क्षमताओं में कोई दृश्य क्षरण न हुआ हो.

और ऐसे उदाहरण उससे भी कम मिलेंगे कि वह राजनेता अप्रासंगिकता का अहसास हो जाने के बावजूद अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए दयनीय हद तक जद्दोजहद करता दिखाई देता पड़े.

लालकृष्ण आडवाणी के रुप में ऐसे उदाहरण हमारे सामने मौजूद है.

आडवाणी 1973 में अपने दल (पहले भारतीय जन संघ और अब भारतीय जनता पार्टी) के शीर्ष पर पहुँचने और तब से कोई न कोई तमग़ा लगाए उसी मुक़ाम पर मौजूद हैं.

वर्ष 1989 से 2004 तक तो अपने दल में आडवाणी की ही तूती बोलती रही. 1993 से उन्होंने ज़रूर अपने सीनियर अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हैसियत में हिस्सेदारी करना मंज़ूर किया, लेकिन स्वेच्छा से.

उनकी इच्छा के बग़ैर उनके समक्ष खड़ा होने की कोशिश करने वालों को धूल चटाने में उन्हें न तो कोई परेशानी हुई, न हिचक. डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी अभी तक घाव सहलाए जा रहे हैं.

कम होती हैसियत

वही लालकृष्ण आडवाणी अपनी हैसियत बचाए रखने के लिए आज पसीने-पसीने होते दिखाई पड़ रहे हैं.

लोकसभा में विपक्ष के नेता का तमग़ा ज़रूर उनके पास है, मगर उन्हें हर क्षण डर सताता रहता है कि न जाने कब यह छिन जाए.

ढाढस बाँधने के लिए सुषमा स्वराज को उनके बग़ल में बैठाकर मुनादी करनी पड़ती है कि आडवाणी विपक्ष के नेता हैं और पाँच साल तक इस पद पर बने रहेंगे.

मनोहर पारिक्करर जैसे मध्यम क़द के नेता उन्हें खुले आम 'सड़ा अचार' घोषित कर देते हैं, लेकिन कोई इस पर एतराज़ नहीं करता, लोग बस मुस्करा कर रह जाते हैं.

कभी आडवाणी की भृकुटियों के इशारे पर ज़मीन-आसमान एक कर देने वाले भाजपा के नेता-कार्यकर्ता अब उनसे आदेश या सलाह लेने नहीं, शिष्टाचार मुलाक़ात करने जाते हैं.

उनके तमग़े की चमक अब धूमिल पड़ चुकी है. भाजपा-तंत्र में बचे उनके उंगलियों पर गिने जाने लायक़ समर्थक भी खुलकर उनके बचाव में खड़े होने को तैयार नहीं.

अपने अस्तित्व की लड़ाई आडवाणी को अब कुछेक दरबारी पत्रकारों के ज़रिए ही लड़नी पड़ रही है. हाल के दिनों में भाजपा को लेकर आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत की खुली पहल के बाद यह सामने आ चुका है.

विडंबना यह है कि उन्हें इस हालत में पहुँचाने के लिए अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वह हैं स्वयं लालकृष्ण आडवाणी.

2004 में केंद्र की सत्ता से हटने के बाद तीन ऐसे स्पष्ट पड़ाव हैं, जब आडवाणी के ज़रिए लिए गए फ़ैसलों ने उन्हें इस हालत तक पहुँचाया है.

पहला- 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर थोपे जाने से परेशान वैंकया नायडू ने 18 अक्तूबर, 2004 को भाजपा अध्यक्ष पद छोड़ने के साथ ही यह ऐलान कर दिया कि वह अपना ताज़ आडवाणी को सौंप रहे हैं.

उस समय भी लोकसभा में विपक्ष के नेता आडवाणी ने बिना ना-नुकुर के, मज़े से अध्यक्ष का ताज़ पहन लिया, यह परवाह किए बग़ैर कि उनकी पार्टी एक व्यक्ति, एक पद के सिद्धांत की पैरोकार है.

टोपी उछली

आडवाणी को अंदाज़ा नहीं होगा कि अपने इस एक क़दम से वह भाजपा कार्यकर्ताओं की नज़रों में अर्श से फ़र्श पर उतर आएंगे.

इसके महीने भर के अंदर भाजपा पदाधिकारियों की बैठक में टीवी कैमरों की मौजूदगी में उमा भारती उनके ख़िलाफ़ खुली बग़ावत कर उनकी टोपी उछाल दी.

Image caption पार्टी में हैसियत बनाए रखने के लिए आडवाणी की शैली वाजपेयी जैसी नहीं है

दूसरा- न जाने आडवाणी को क्या सूझा, जून 2005 में पाकिस्तान दौरे पर उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ़ में कसीदे पढ़ना शुरू कर दिया.

दशकों से विभाजन विरोधी वैचारिक घुट्टी पीकर बड़े हुए भाजपा कार्यकर्ताओं की नींदें हराम करने के लिए यह काफ़ी था. उन्हें क़दम-क़दम पर आम लोगों के सवालों और उपहास का सामना करना पड़ रहा था.

इस मुद्दे पर आडवाणी पार्टी में अकेले खड़े दिखाई पड़े. उनके इस क़दम से भाजपा की साख पर लगे धब्बे से पार्टी को उबारने के इच्छुक उनके ही सहयोगियों की राय थी वह खेद व्यक्त करें, मगर आडवाणी थे कि इशारा समझने को तैयार नहीं थे. अंतत: उन्हें इसकी क़ीमत 2005 के अंतिम दिनों में अध्यक्ष पद छोड़कर चुकानी पड़ी. मगर तबतक वो अपनी पूरी फ़जीहत कर चुके थे.

तीसरा- राजनाथ सिंह अध्यक्ष पद पर आडवाणी के अध्यक्ष बने. पिछले डेढ़ दशकों में राजनाथ सिंह की राजनीतिक हैसियत में हुए इज़ाफ़े का श्रेय अगर किसी को है तो वो आडवाणी पर हैं.

मगर इसे विडंबना ही कहेंगे आडवाणी हर मामले में अपने से छोटे राजनाथ सिंह में अपना प्रतिद्वंदी देखने लगे और 2008 आते-आते राजनाथ विरोधियों के संरक्षक बन गए.

कहा जाने लगा कि भाजपा में दो गुट हैं- आडवाणी गुट और राजनाथ गुट.

एक गुट के साथ चस्पा होकर आडवाणी ने अपनी ही मिट्टी पलीद की. वह अपने सीनियर वाजपेयी से सबक़ ले सकते थे. वाजपेयी ने कभी कोई गुट बनाना या उससे चस्पा होना स्वीकार नहीं किया. 1984 से 1993 तक अपने गर्दिश के दिनों में भी नहीं.

वाजपेयी इसीलिए भाजपा ही नहीं विरोधियों की नज़रों में भी बड़े नेता हैं. उनके ख़िलाफ़ बेनी प्रसाद वर्मा की टिप्पणी पर स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सार्वजनिक रुप से माफ़ी माँगते हैं.

मगर आडवाणी वाजपेयी नहीं हैं.

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