इच्छामृत्यु दिए जाने पर छिड़ी बहस

Image caption अरुणा पर जिस अस्पताल में हमला हुआ था वे वहाँ नर्स थीं

सुप्रीम कोर्ट ने उस महिला से जुड़ी याचिका मंज़ूर की है जिनके बारे में कहा गया है कि वे 1973 के बाद से ब्रेन डेड हैं यानी शरीर के संचालन में दिमाग़ किसी प्रकार का सहयोग नहीं कर रहा. याचिका में उनके लिए इच्छामृत्यु की अपील की गई है.

27 नवंबर 1973 में अरुणा नाम की इस नर्स के साथ एक अस्पताल सफ़ाई कर्मचारी ने बलात्कार किया था. उसके बाद उन्हें पक्षाघात हो गया और वे 36 साल से ब्रेन डेड हैं.

याचिका एक पत्रकार ने दायर की है जिन्होंने अरुणा पर एक किताब लिखी है.

अब कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि क्या इस याचिका का मतलब इच्छामृत्यु तो नहीं है.

भारत में इच्छामृत्यु ग़ैर क़ानूनी है और इस संदर्भ में इस मामले को दिशा-निर्देशक मामला माना जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के अस्पताल और महाराष्ट्र सरकार से अरुणा की स्वास्थ्य रिपोर्ट मांगी है.

पत्रकार पिंकी विरानी ने अपनी याचिका में कहा है कि पिछले 36 सालों से अरुणा ‘वेजिटेटिव स्टेट’ यानी निर्जीव सी हैं और कुछ भी करने में अक्षम हैं.

आत्मसम्मान विहीन ज़िंदगी

मुंबई के केईएम अस्पताल में नर्सें दिन में दो बार ज़बरदस्ती अरुणा को आहार देती हैं. पिंकी विरानी ने याचिका में कोर्ट से गुहार की है कि अरुणा को ज़बरदस्ती आहार न दिया जाए.

उनका कहना है, “जिस स्थिति में अरुणा हैं वो कहीं से भी आत्मसम्मान वाली ज़िंदगी नहीं है और उनके मुँह में खाना ठूँसना उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना है. इस तरह का अस्तित्व जीने के अरुणा के हक़ का उल्लंघन है. उन्हें हक़ है कि वे इस तरह की ज़िंदगी न जिएँ.”

पिंकी विरानी बताती हैं कि पिछले कुछ सालों में अरुणा की स्थिति लगातार बिगड़ी है. वे कहती हैं, “अरुणा बात नहीं कर सकतीं, सुन या देख नहीं सकतीं. अरुणा के माता-पिता का कई साल पहले निधन हो गया था और उनके किसी भाई-बहन या रिश्तेदार ने 36 सालों में कभी उन्हें मिलने की या उनके बारे में जानने की ज़हमत नहीं उठाई है.”

पिंकी विरानी की याचिका में बताया है कि बलात्कार के बाद अरुणा के दिमाग़ में गहरी चोट लगी और साथ ही सर्विकल कॉर्ड में भी चोट आई जिस कारण वे कुछ भी करने में अक्षम हो गईं.

उन पर हमला और बलात्कार करने वाले को सात साल की जेल की सज़ा हुई थी. अपनी किताब में पिंकी विरानी ने 1997 में अरुणा की स्थिति के बारे में बताया है जब वे 49 साल की हुई थी.

पिंकी अपनी किताब में लिखती हैं, “वो बहुत बुरी हालत में थी. हड्डियाँ बेहद कमज़ोर हो चुकी थीं, ऐसा लगता था कि हड्डियों के ढाँचे पर त्वचा की एक परत हो. उनके दाँत काफ़ी ख़राब हो चुके थे जिस वजह से काफ़ी तकलीफ़ होती थी. खाना ठोस रूप न देकर गूँथ कर दिया जाता था. तरल पदार्थ उनके गले में फँस जाते थे.”

ये पहली बार नहीं है जब इच्छामृत्यु का मामला अदालत में गया हो.

2004 में गंभीर रुप से बीमार शंतरंज के एक चैंपियन को लेकर भी ऐसी ही माँग उठी थी. बाद में उनकी अस्पताल में मौत हो गई थी. 25 साल का वेंकटेश सात महीने से लाइफ़-सपोर्ट सिस्टम पर था.

लेकिन अस्पताल अधिकारियों और आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट ने वेंकटेश की ये माँग ठुकरा दी थी कि उनका लाइफ़-सप्पोर्ट सिस्टम बंद कर दिया जाए. कोर्ट का तर्क था ये इच्छामृत्यु का मामला होगा.

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