जेएमएम का उदय, कांग्रेस मज़बूत

जेएमएम के समर्थक जश्न मनाते हुए
Image caption जेएमएम ने दिखाया कि राज्य में उसकी जड़े पुख़्ता आधार पर टिकी हैं

झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों ने ये साबित किया है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा अभी भी राज्य में एक प्रभावशाली शक्ति है और लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल ने अपना जनाधार गँवाया नहीं है.

अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन कि झारखंड मुक्ति मोर्चा को ख़ारिज करना उचित होगा, ग़लत साबित हुआ है. आशंका जताई जा रही थी कि जेएमएम और शिबू सोरेन के राजनीतिक करियर का इस बार सफ़ाया हो जाएगा लेकिन वे फिर बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं.

कांग्रेस की शक्ति झारखंड में कभी भी उस तरह ध्वस्त नहीं हुई थी जिस तरह से उत्तर प्रदेश में और उसका प्रदर्शन चाहे पूरी तरह संतोषजनक न रहा हो लेकिन उसके लिए आशा की किरण ज़रूर नज़र आई है.

यह भी स्पष्ट हुआ है कि राज्य में गठबंधन सरकार का ही सिलसिला चलता रहेगा लेकिन इतना ज़रूर हुआ है कि निर्दलीयों का बोल-बाला पिछली विधानसभा के मुकाबले में घट सकता है.

आज़ाद उम्मीदवारों का वैसा बोलबाला नहीं

इस बार चुनाव में लोकतंत्र की दृष्टि से यह बात अच्छी हुई है कि पिछली बार जिस तरह पूरा प्रदेश आज़ाद उम्मीदवारों के हवाले हो गया था, वैसा इस बार नहीं हुआ है.

मतदाताओं ने ज़्यादातर दलों और समूहों को वोट दिया है. इसलिए राज्य में किसी न किसी गठबंधन की ही सरकार बनेगी.

इस बार झारखंड में कांग्रेस पार्टी एक बड़ी ताक़त बन कर उभरी है. संयुक्त बिहार के समय भी जब झारखंड छोटा नागपुर संथाल परगना के रूप में जाना जाता था, तब भी कांग्रेस वहाँ एक बड़ी ताकत थी.

झारखंड मुक्ति मोर्चा का आंदोलन जब 60-70 के दशक में तेज़ हुआ तो वहाँ कांग्रेस एक बड़ी ताक़त थी और उसके पास निचले स्तर से लेकर ऊपर तक की सत्ता थी.

झारखंड में भाजपा का उदय काफ़ी बाद में हुआ. उसके पूर्व अवतार जनसंघ ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के ज़रिए हज़ारीबाग़, राँची, गुमला और लोहरदगा में अपनी पहचान बनाई थी.

कांग्रेस राज्य में कभी मरी हुई अवस्था में नहीं थी. वह हमेशा एक ताकत के रूप में मौजूद रही. यह बात अलग है कि उसे सीटें कम मिलती रहीं लेकिन उसका संगठन और नेता मज़बूत स्थित में थे.

कांग्रेस पर पूरी तरह भरोसा नहीं

इस बार के चुनाव में कांग्रेस को पहले से अधिक सीटें मिली हैं.

कांग्रेस का मानना था कि वह बाबू लाल मरांडी के साथ मिलकर सरकार बना लेगी लेकिन वैसा नहीं हो पाया है क्योंकि वह अपने संगठन की कमज़ोरियाँ दूर नहीं कर पाई.

दूसरी बात यह कि राज्य में पिछले कुछ समय से जो लोग भी सत्ता में आए, ऐसा माना जाता रहा कि उनके पीछे कांग्रेस का किसी न किसी तरह का हाथ रहा है. मधु कोड़ा के पीछे भी कांग्रेस का ही हाथ था.

ऐसा लगता है कि लोगों ने यह देखते हुए कांग्रेस पर यक़ीन नहीं किया. यह परिदृश्य कांग्रेस के लिए आशाजनक तो है लेकिन वह इससे संतुष्ट नहीं हो सकती.

वहीं लालू प्रसाद यादव के राजद को झारखंड में ख़त्म हुई ताकत मान लिया गया था. लेकिन झारखंड के लिए यह सही नहीं है क्योंकि इसके लिए वहाँ के सामाजिक समीकरणों को भी ध्यान में रखना चाहिए.

झारखंड में पिछड़ों की ताक़त ख़ासी है. झारखंड मुक्ति मोर्चा की ताक़त भी आदिवासी और पिछड़े, ख़ासकर महतो समुदाय के लोग रहे है.

आज इस पिछड़े वोट पर कभी लालू प्रसाद, तो कभी नीतीश कुमार अपना दावा जताते रहते हैं. इस बार लालू को जो सीटें मिली हैं, उसके पीछे यही कारण है.

वामदलों ने भी दलितों और पिछड़ों में अपनी पैठ बनाई है. इसे चुनाव के रुझानों में देखा जा सकता है. वहीं आल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) की भी आदिवासी और पिछड़ों में पैठ है.

इन रुझानों से एक बात तो साफ़ उभर कर सामने आ रही है कि मधु कोड़ा के भ्रष्टाचार में उनके सहयोगियों में अधिकतर चुनाव हारते नज़र आए हैं. यानी, जिन लोगों का नाम जाँच में या मीडिया के ज़रिए सामने आया उनमें से कुछ को इन चुनावों में सबक सिखाया है.

ग्रामीण इलाक़ों में समर्थन

वहीं दूसरी सबसे बड़ी बात जो नज़र आ रही है, वह यह है कि जेएमएम को ग्रामीण इलाक़ों में अधिक समर्थन मिला है. यह केवल संयोग ही नहीं है कि ग्रामीण इलाक़ों में 64 फ़ीसद तक मतदान हुआ और शहरों में कम.

इससे एक बात यह लग रही है कि जेएमएम को कहीं संसदीय राजनीति में आस्था न रखने वाले माओवादियों ने समर्थन तो नहीं दिया?

झारखंड को विफल राज्य कहा जाता है. वहाँ कोई स्थिर सरकार नहीं रही. प्रशासन ने जनता की इच्छा के मुताबिक़ काम नहीं किया है.

ऐसे में वहाँ की जनता में सबसे बड़ा मुद्दा बेहतर शासन और स्थायी सरकार था, लेकिन यह पूरा होता नहीं दिख रहा है.

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