माओवादियों की चर्चा छाई रही

नक्सली
Image caption माओवादियों ने सरकार के बातचीत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है

यदि कहें कि देश में आंतरिक सुरक्षा का मसला नक्सलियों या माओवादियों के इर्दगिर्द ही घूमता रहा तो ग़लत नहीं होगा.

केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने पहली बार कहा कि माओवादियों का असर अनुमान से कहीं ज़्यादा बड़े हिस्से में है. उनका कहना है कि अब देश के 20 राज्यों के 223 ज़िलों में माओवादियों का प्रभाव है.

उन्होंने कहा कि माओवादियों के पास अत्याधुनिक हथियार हैं.

प्रधानमंत्री पिछले कुछ सालों में कई बार कह चुके हैं कि देश की आंतरिक सुरक्षा को सबसे अधिक ख़तरा माओवादियों से है.

वैसे आंकड़े बताते हैं कि नक्सली हिंसा में जितने लोगों की जान जा रही है उतनी अधिक मौत और किसी विद्रोह या चरमपंथी संगठन की हिंसा में नहीं जाती.

गृहमंत्री ने कहा कि माओवादियों के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई लड़ी जाएगी और इसकी व्यापक तैयारियाँ भी दिखीं.

एक समय ऐसा था कि चर्चा चल पड़ी थी केंद्र की यूपीए सरकार माओवादियों के ख़िलाफ़ सेना के उपयोग की तैयारी कर रही है. हालांकि बाद में इसका खंडन कर दिया गया.

लेकिन इस कार्रवाई की प्रत्याशा में माओवादियों ने देश भर में हिंसक कार्रवाई बढ़ा दी. उन्होंने पहली बार एक ट्रेन का अपहरण किया और एक इंस्पेक्टर का अपहरण करके उसके बदले 14 आदिवासी महिलाओं को छुड़वाया.

माओवादियों की कार्रवाई

सरकार ने माओवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को लेकर गंभीरता दिखाई और सीपीआई (माओवादी) के 12 शीर्ष अधिकारियों में से सात नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया.

Image caption नक्सलियों के विस्फोट के बाद यात्री गाड़ी पटरी से उतर गई और इसमें कई हताहत हुए

इसमें पोलित ब्यूरो के सदस्य कोबाड गांधी और छत्रधर महतो शामिल हैं.

एक ओर पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में माओवादियों के ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाई की ख़बरें आती रहीं तो छत्तीसगढ़ में 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' शुरु होने की.

इसके जवाब में या फिर हताशा में माओवादियों की हिंसा भी बढ़ती हुई दिखी. उन्होंने छत्तीसगढ़ में हुई एक मुठभेड़ में एक पुलिस अधीक्षक को मार दिया तो झारखंड में एक इंस्पेक्टर का अपहरण करने के बाद उनकी हत्या कर दी.

फिर पश्चिम बंगाल में एक इंस्पेक्टर को अगवा किया और मांग रखी कि लालगढ़ से गिरफ़्तार की गई 14 आदिवासी महिलाओं को रिहा किया जाए और उनके ख़िलाफ़ दर्ज मामले वापस लिए जाएँ.

सरकार का कहना था कि वो महिलाएँ माओवादियों की सहयोगी हैं लेकिन बाद में उनको रिहा कर दिया गया.

इसके बाद माओवादियों ने भुवनेश्वर-दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को रास्ते में रोक लिया. कई घंटों बाद इस ट्रेन को छोड़ा गया. हालांकि इसमें किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया गया. माओवादियों ने इससे पहले पटरियाँ उड़ाई थीं, रेलवे स्टेशन फूँका था और ट्रेन के इंजन को उडा़या था लेकिन यात्री गाड़ी का पहली बार अपहरण किया गया.

एक घटना और भी पहली बार हुई. झारखंड में एक पटरी को माओवादियों ने विस्फोटक लगाकर उड़ा दिया जिससे एक यात्री गाड़ी के कई डिब्बे पलट गए. बाद में इसके लिए माओवादियों ने माफ़ी मांगी.

इस बीच छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड में हिंसा की छिटपुट घटनाएँ जारी हैं.

ख़बरें हैं कि छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तैयारी चल रही है.

बातचीत का प्रस्ताव

Image caption चिदंबरम ने कहा कि सरकार माओवादी समस्या को ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध है

केंद्र सरकार की ओर से माओवादियों को बातचीत का प्रस्ताव दिया गया.

गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि यदि माओवादी आतंकवादी नहीं हैं और यदि वे हथियार छोड़ दें तो सरकार उनसे बातचीत करने को तैयार नहीं हैं.

हालांकि माओवादियों की ओर से इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया.

माओवादियों का कहना है कि सरकार पहले अपनी कार्रवाइयाँ रोके तो वे बातचीत पर विचार कर सकते हैं.

वरिष्ठ माओवादी नेताओं में से एक सव्यसाची पंडा का कहना है कि सरकार माओवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए उनकी ताक़त को बढ़ा चढ़ाकर बता रही है. उन्होंने कहा कि नक्सलियों का प्रभाव 223 ज़िलों में नहीं है.

जो बात सव्यसाची पंडा ने भी कही और जिसने सरकार को भी चिंतित किया, वह है माओवादियों को आम लोगों, ख़ासकर बुद्धिजीवियों का समर्थन.

माओवादियों के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई की चर्चा के बाद सुपरिचित लेखिका और कार्यकर्ता अरुंधति रॉय सहित कई बुद्धिजीवियों ने इस पर सवाल उठाए.

अरुंधति राय ने तो आरोप भी लगाए कि दरअसल नज़रें आदिवासी इलाक़ों में ज़मीन के नीचे मौजूद खनिजों पर है.

अगला साल माओवादियों के लिए और उनसे निपटने के लिए तैयार बैठी राज्य सरकारों के लिए अहम साबित होने वाला है.

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