चुनाव ने बनाए कई नए समीकरण

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह
Image caption सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच तालमेल ने कारगर भूमिका निभाई

वर्ष 2009 में हुए आम चुनाव कई मायनों में अहम थे.

एक तो इसलिए क्योंकि इसने कांग्रेस के पक्ष में ऐसे नतीजे दिए जिसकी अपेक्षा ख़ुद कांग्रेस को नहीं थी. 2004 में कांग्रेस को 145 सीटें मिली थीं और 2009 में यह बढ़कर 206 हो गईं.

दूसरा यह कि इन परिणामों ने कांग्रेस को ऐसे सभी साथियों से छुटकारा दिलवा दिया जिन्होंने चुनाव के पहले या चुनाव के दौरान परेशानी में डाला था. इसमें लालू प्रसाद यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान तक कई लोग थे.

लेकिन कांग्रेस को सबसे अधिक सुकून देने वाली ख़बर आई पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से. वामपंथी दलों की ऐतिहासिक हार हुई और वे 35 सीटों से 15 सीटों तक जाकर सिमट गए. तृणमूल कांग्रेस के साथ कांग्रेस ने वहाँ राजनीति की एक नई पारी शुरु करने के संकेत दिए. दूसरा मायावती की माया को झुठलाते हुए कांग्रेस ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में अपने पैरों पर खड़े होकर दिखा दिया. कांग्रेस का यह फैसला भी सही साबित हुआ कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से समझौता न करके अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ा जाए.

हालांकि अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ने का कांग्रेस का फ़ैसला सीटों की संख्या के लिहाज से बिहार में उत्तर प्रदेश की तरह प्रभावकारी साबित नहीं हुआ. लेकिन उसने वहाँ अपने पुराने साथियों लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और रामविलास पासवान के लोकजन शक्ति पार्टी को राजनीतिक हाशिए पर ज़रुर खड़ा कर दिया. और उसने अपने वोटों का प्रतिशत चार से बढ़ाकर 10 कर लिया.

इसका असर यह हुआ कि लालू प्रसाद को जहाँ सिर्फ़ चार सीटें मिल सकीं वहीं रामविलास पासवान ख़ुद भी चुनाव हार गए और उनकी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिल सकी. फ़ायदे में रहे नीतीश कुमार जिनकी पार्टी को 20 सीटें मिलीं और उनकी सहयोगी भाजपा को 12.

कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के अलावा जिस राज्य से सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ वह था आंध्र प्रदेश. जैसा कि सोनिया गांधी सोनिया गांधी ने ख़ुद कहा कि जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएसआर यानी राजशेखर रेड्डी ने कहा कि वे कांग्रेस को अधिकतम सीटें जीतकर देंगे तो किसी ने भरोसा नहीं किया था लेकिन नतीजों ने उन्हें सही साबित किया. न केवल उन्होंने राज्य में दूसरी बार सत्ता हासिल की, उन्होंने प्रदेश की 42 सीटों में से 33 कांग्रेस को दिलवाईं.

वहाँ चंद्राबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी को सिर्फ़ छह सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. लेकिन यह सिर्फ़ चंद्राबाबू नायडू भर की स्थिति नहीं थी. उन्होंने जिन लोगों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया था वे सब हाशिए पर चले गए. इसमें मायावती थीं और वामपंथी दल. चुनाव से पहले यह मोर्चा अपने आपको ‘किंग मेकर’ की भूमिका में देख रहा था लेकिन परिणामों ने उनके आकलनों को धो दिया.

आडवाणी को नकारा मतदाताओं ने

Image caption लालकृष्ण आडवाणी के लिए वर्ष कोई अच्छी ख़बर नहीं लेकर आया

इस चुनाव में मतदाताओं ने लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री की तरह स्वीकार करने से इनकार कर दिया और भाजपा को 138 सीटों की जगह सिर्फ़ 116 सीटें ही मिल सकीं.

इस तरह कांग्रेस और भाजपा के बीच 2004 के आम चुनावों में जो फ़ासला सिर्फ़ सात सीटों का था वह इस बार 68 सीटों का हो गया.

इन परिणामों ने भाजपा में चल रही उथल पुथल को सतह पर ला दिया और वर्ष के अंत तक लालकृष्ण आडवाणी को न केवल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना पड़ा, बल्कि राजनाथ सिंह को भी अध्यक्ष का पद छोड़कर एक अपरिचित से नेता नितिन गडकरी को कार्यभार सौंपना पड़ा.

एनडीए में शामिल भाजपा के कुछ साथियों का साथ छूटना भी उसके लिए भारी पड़ा. मसलन उड़ीसा में बीजू जनता दल ने भाजपा का साथ छोड़ा और राज्य की 21 सीटों में से 13 सीटें जीत लीं.

भाजपा को वर्ष 2004 में जहाँ सात सीटें मिली थीं इस बार भाजपा वहाँ खाता भी नहीं खोल सकी. कांग्रेस को इसका सीधा लाभ मिला और उसने पिछली बार की दो सीटों को बढ़ाकर सात कर लिया.

मुद्दे

राजनीतिक विश्लेषक अभी भी विश्लेषण कर रहे हैं कि कौन सी वजहें थीं जिनकी वजह से कांग्रेस को ऐसी जीत मिली जिसकी अपेक्षा वो ख़ुद नहीं कर रही थी.

कांग्रेस ने ख़ुद कहा कि यह स्थायित्व के लिए मिला वोट है लेकिन बहुत से विश्लेषक इसे लेकर एकमत नहीं होते क्योंकि गठबंधन की सरकारों का सिलसिला अभी ख़त्म होता नहीं दिख रहा है.

लेकिन इस बात पर दो मत नहीं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि ने सकारात्मक भूमिका निभाई, वहीं यूपीए चेयरमैन के रुप में सोनिया गांधी के कामकाज के ढंग ने भी लोगों को लुभाया.

वरिष्ठ पत्रकार मानिनी चटर्जी कहती हैं, “जब पिछले चुनावों के बाद यूपीए बना और सोनिया गांधी ने ख़ुद प्रधानमंत्री न बनकर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया तो लोगों को लगा था कि तालमेल मुश्किल होगा क्योंकि शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र वे ख़ुद हैं. लेकिन पिछले कार्यकाल में दोनों के बीच तालमेल से लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ.”

उनका कहना है, “मनमोहन सिंह की भले और ईमानदार आदमी की छवि ने भी बहुत फ़ायदा दिया तो सोनिया गांधी ने उन्हें जो इज़्ज़त दी उसने भी अच्छा संदेश दिया.”

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने मनमोहन सिंह पर सीधा हमला किया और लगता है कि यह भी उनके ख़िलाफ़ गया.

दूसरी ओर यूपीए सरकार की योजनाओं और कार्यों का भी असर चुनाव परिणामों पर पड़ा.

हाल ही में एक आकलन देखने में आया है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने किसानों के 60 हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़ माफ़ करने की घोषणा की थी और जिन राज्यों में इस पर ठीक तरह से अमल हुआ वहाँ चुनावों में कांग्रेस को फ़ायदा मिला.

मानिनी चटर्जी मानती हैं कि ग्रामीण रोजग़ार गारंटी क़ानून का भी लाभ चुनावों में मिला क्योंकि इसने पहली बार लोगों को रोज़गार का आश्वासन दिया.

Image caption मधु कोडा पर भ्रष्टाचार करके चार हज़ार करोड़ रुपए की संपत्ति जमा करने का आरोप है

उनका कहना है कि राहुल गांधी की बातें शुरु में बचपने की बातें लग रहीं थीं लेकिन उत्तर प्रदेश में 20 सीटों ने साबित किया कि उनके करिश्मे ने भी चुनाव परिणामों पर असर डाला.

लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान को वर्ष 2009 के चुनाव ने जिस तरह से हाशिए पर डाला है उसने इन नेताओं को मजबूर किया कि वे अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करें. हालांकि मुलायम सिंह का प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं था लेकिन वह पिछली बार की तुलना में काफ़ी कम सीटें जीत सके.

वर्ष के अंत में फ़िरोज़ाबाद में हुए उपचुनाव में मुलायम सिंह की बहू डिंपल यादव को जिस तरह से कांग्रेस के राज बब्बर ने मात दी उसने मुलायम सिंह को भी संकेत दिए हैं कि वे भी अपनी राजनीति पर नज़र डालें.

हालांकि मानिनी चटर्जी कहती हैं कि ये नेता ज़मीन से उठकर आए नेता हैं और इन सबको ज़मीनी राजनीति का ख़ासा अनुभव है इसलिए यह कहना की उनकी राजनीति ख़त्म हो रही है, ग़लत होगा और मौक़ा मिलने पर वे फिर उभरकर सामने आएँगे.

कुल मिलाकर वर्ष 2009 ने सकारात्मक और जनपरक राजनीति के प्रति लोगों के रुझान को रेखांकित किया और बहुत से क्षत्रपों का भ्रम दूर किया लेकिन इसी साल ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का उभार देखा और झारखंड में मधु कोड़ा की अकूत संपत्ति का पता भी दिया.

संबंधित समाचार

संबंधित इंटरनेट लिंक

बीबीसी बाहरी इंटरनेट साइट की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है