'बेरोज़गार' हुए उल्फ़ा प्रमुख परेश बरुआ

उल्फ़ा
Image caption उल्फ़ा 1979 से असम की स्वतंत्रता की लडा़ई लड़ रहा है.

भारत में प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन उल्फ़ा की सशस्त्र शाखा के प्रमुख परेश बरुआ को भारतीय रेलवे ने आख़िरकार नौकरी से निकाल दिया है.

बरुआ को छह जनवरी, 2010 को सरकारी नौकरी से निकाला गया है, हालाँकि वो जनवरी 1980 से ही ग़ैर-हाज़िर चल रहे थे. उन्होंने भारतीय रेलवे से आख़िरी बार दिसंबर 1979 में 370 रुपए का वेतन पाया था.

परेश बरुआ अप्रैल 1979 से यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम यानी उल्फ़ा के संस्थापक सदस्य और सशस्त्र शाखा के प्रमुख हैं.

परेश बरुआ को नौकरी से निकाले जाने पर पूर्वोत्तर सीमावर्ती रेलवे के प्रवक्ता एस हाजॉग का कहना है, "परेश बरुआ को नौकरी से निकाल दिया गया है और इस संबंध में एक नोटिस तिनसुकिया रेलवे स्टेशन पर लगा दिया गया, जहाँ वो आख़िरी बार काम पर आए थे. लेकिन मैं नहीं जानता हूँ कि जिन्हें निकाला गया है कि वो उल्फ़ा नेता परेश बरुआ ही हैं."

लेकिन परेश बरुआ के परिवार वालों ने इस बात की पुष्टि की है कि बर्ख़ास्त रेलवे कर्मचारी परेश बरुआ उल्फ़ा नेता ही हैं.

कूली से छापामार

परेश बरुआ के छोटे भाई मिशन बरुआ का कहना है, "बरतरफ़ी का पत्र हमारे घर पर आया है. ये सच है कि मेरे भाई ने 1978-79 में रेलवे में कुली के तौर पर काम किया था और वो तिनसुकिया स्टेशन पर कार्यरत थे."

मिशन बरुआ का कहना है कि भूमिगत होने से पहले उनके भाई ने बतौर खिलाड़ी नौकरी पाई थी और फ़ुटबॉल में गोलकीपर के रुप में रेलवे का प्रतिनिधित्व भी किया.

मिशन बरुआ कहते हैं, उस समय असम में बांग्लादेशी ग़ैर-क़ानूनी प्रवासियों के ख़िलाफ़ अभियान ज़ोरो पर था. उनके ख़िलाफ़ मुहिम चलाने वालों पर पुलिस की ज़्यादती से मेरे भाई बहुत ही परेशान थे और इसी के नतीजे में उन्होंने छापामार संगठन की स्थापना की. जिसने उनके जीवन को बदल दिया.

रहस्य है

लेकिन सबसे दिलचस्प बात है कि आख़िर इतने लंबे समय के बाद परेश बरुआ को क्यों निकाला गया है, ये मुद्दा अब भी रहस्यमय बना हुआ है.

रेलवे प्रवक्ता एस हाजॉग का कहते हैं कि बरुआ के काम से ग़ैर-हाज़िर रहने को मामला जब सामने आया तो उन्हें 31 दिसंबर, 2009 को नोटिस भेजा गया. जिसमें कहा गया था कि छह जनवरी, 2010 तक वो रेलवे अधिकारियों के सामने हाज़िर हों या फिर बरतरफ़ी का सामना करें.

प्रवक्ता का कहना है कि जब बरुआ हाज़िर नहीं हुए तो उन्हें बरतरफ़ किया गया, प्रवक्ता के अनुसार उनकी बरतरफ़ी में क़ानूनी तौर-तरीक़ों का पूरी तरह से पालन किया गया है.

लेकिन सबसे अहम सवाल ये है कि क्या क़ानूनी तौर-तरीक़े वाकई इतने लंबे होते हैं कि इतने बड़े अलगाववादी नेता को नौकरी से निकलाने में तीन दशक लग जाते हैं?

पिछले दो दशक से परेश बरुआ बांग्लादेश में छिपे हुए थे पर माना जाता है कि पिछले दिनों बांग्लादेश में उल्फ़ा के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई के बाद वो बांग्लादेश से भागकर दक्षिण एशिया के किसी दूसरे देश में रह रहे हैं.

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