'मुझ पर किसी का रिमोट कंट्रोल नहीं'

नितिन गडकरी
Image caption गडकरी महाराष्ट्र में मंत्री और भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं

(इस रविवार से एक नए कार्यक्रम, संडे के संडे, की शुरूआत हो रही है जिसमें हम हर हफ़्ते आपको नई-नई हस्तियों से मिलवाएँगे. ये इंटरव्यू इस श्रृंखला की पहली कड़ी है. ये कार्यक्रम आप रेडियो पर भी सुन सकते हैं. इसमें जानिए भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी को जिनसे बातचीत की बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख अमित बरुआ ने.)

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नवनियुक्त अध्यक्ष नितिन गडकरी का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका बहुत कम संबंध रहा है और वो ज़्यादातर समय तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) से जुड़े रहे हैं.

गडकरी ने माना कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति पर उन्हें भी आश्चर्य हुआ था. उन्होंने कहा, "पार्टी में मुझसे कहीं अधिक अनुभवी वरिष्ठ नेता हैं, फिर भी अध्यक्ष के रूप में मेरा चुनाव हुआ. इस पर मुझे भी आश्चर्य हुआ था."

गडकरी ने उन ख़बरों का खंडन किया जिनमें कहा गया था कि गडकरी की नियुक्ति के पीछे संघ का हाथ है. उन्होंने कहा, "संघ ने मेरी नियुक्ति की है, ये दुष्प्रचार है. संघ कभी भाजपा के राजनीतिक मसलों में हस्तक्षेप नहीं करता. मुझ पर किसी का रिमोट कंट्रोल नहीं है और मैं अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हूँ."

प्राथमिकताएँ

गडकरी ने कहा कि पार्टी के अध्यक्ष के रूप में उनकी प्राथमिकता तमिलनाडु, केरल, पंजाब, हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पार्टी का जनाधार बढ़ाने और युवाओं के बीच पैठ मज़बूत करना होगी.

उन्होंने कहा, "जिन-जिन राज्यों में हमारा शासन है, वहाँ हम अधिकतम युवाओं को रोजगार देने की कोशिश करेंगे. गुजरात, बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड इसका उदाहरण हैं कि वहाँ कितने युवाओं को रोजगार मिला है."

पाकिस्तान के साथ संबंधों पर गडकरी ने कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर देता, तब तक द्विपक्षीय बातचीत नहीं करनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान को मुंबई में 26/11 के हमलों के अभियुक्तों को भारत को सौंप देना चाहिए. इसके बाद ही पाकिस्तान के साथ बातचीत की जानी चाहिए."

गडकरी ने कहा कि वे अभी तक पाकिस्तान नहीं गए हैं, लेकिन अगर उन्हें पाकिस्तान जाने का मौका मिलेगा तो वे वहाँ ज़रूर जाएँगे.

मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं

अल्पसंख्यकों के बीच भाजपा की छवि के मसले पर गडकरी ने कहा कि ये कांग्रेस पार्टी की वोट बैंक की राजनीति है. उन्होंने कहा, "जात, पंथ की राजनीति में मेरा यकीन नहीं है. आज़ाद भारत में 62 में से 56 साल कांग्रेस का राज रहा है. मुसलमानों को आखिर क्या मिला. चाय की टपरी, पान-ठेला, ट्रक, ड्राइवर, क्लीनर. क्या मुस्लिम लड़के-लड़कियों को इंजीनियर, आईएएस नहीं बनना चाहिए."

उन्होंने कहा कि भाजपा आतंकवाद, आईएसआई, पाकिस्तान और लश्कर तैबा के ख़िलाफ़ है, मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं. गडकरी ने माना कि 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगे दुर्भाग्यपूर्ण थे, लेकिन ये भी कहा कि मीडिया के एक विशेष वर्ग ने नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया.

भाजपा अध्यक्ष ने सवाल किया, "दंगे क्या देश के दूसरे हिस्सों में नहीं हुए. महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र में भी दंगे हुए. लेकिन जिस तरह से नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया गया, वो दुर्भाग्यपूर्ण है."

गडकरी ने कहा कि 2002 के गुजरात दंगों के लिए जो भी दोषी हों उन्हें अदालत से सजा मिले, इसमें किसी को आपत्ति नहीं है, भले ही वो किसी भी धर्म या जाति का हो.

उन्होंने कहा कि धारा 370, समान नागरिक संहिता और राष्ट्रवाद भाजपा के एजेंडे में थे, हैं और रहेंगे. उन्होंने कहा कि दूसरे दलों के साथ गठबंधन के चलते भाजपा का अपना एजेंडा लागू करना संभव नहीं है, लेकिन जब भी पार्टी अपने बूते सत्ता में आएगी, अपना एजेंडा लागू करेगी.

हाल ही में दिल्ली से कथित तौर पर तीन पाकिस्तानी अपराधियों के फ़रार होने की घटना को गडकरी ने सुरक्षा में बड़ी चूक बताया.

कांग्रेस पर निशाना

उन्होंने कहा कि कंधार मामले पर कांग्रेस ने भाजपा की जमकर आलोचना की थी, जबकि हक़ीक़त ये है कि जिस बैठक में अगवा भारतीय नागरिकों को छुड़ाने के लिए चरमपंथियों को रिहा कराने पर सहमति बनी थी, उसमें कांग्रेस के प्रतिनिधि भी शामिल थे.

गडकरी ने कहा कि महंगाई के लिए मनमोहन सरकार की ग़लत आर्थिक नीतियां ज़िम्मेदार हैं. उन्होंने कहा, "हम लोकतांत्रिक तरीक़ों से सरकार की इन गलत नीतियों का विरोध करेंगे."

भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि नक्सलवाद पर सरकार वैसा काम नहीं कर रही जैसा कि उसे करना चाहिए. उन्होंने कहा कि जिन राज्यों में भाजपा का शासन है, वो नक्सलवाद के ख़िलाफ़ केंद्र का सहयोग करने के लिए तैयार हैं.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने तेलंगाना मुद्दे को सुलझाने के बजाय उसमें 'आग में घी डालने' का काम किया है. सभी पार्टियों को एक साथ बुलाकर इस मसले का समाधान निकाला जा सकता था.

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