हालात बेहतर हुए हैं: उमर अब्दुल्ला

उमर अब्दुल्ला
Image caption उमर अब्दुल्ला भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व में जब पिछले साल उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार की बागडोर संभाली थी तब राज्य की आंतरिक और राजनीतिक घटनाक्रमों और भारत-पाकिस्तान रिश्तों में उतार-चढ़ाव आ रहा था.

इन सबके बीच उमर अब्दुल्ला ने राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. उमर मानते हैं कि उनके सामने कई बड़ी चुनौतियाँ हैं और एक साल के शासन में उन्हें कई अहम सबक भी मिले हैं. उमर अब्दुल्ला से ख़ास बातचीत...

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के इतिहास में सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का क्या कोई अधिक बोझ है?

नहीं, कोई बोझ नहीं है.... शायद मीडिया की तरफ से ज़रूरत से ज़्यादा तवज्जो दी गई, लेकिन बोझ कतई नहीं है. लोगों को किसी भी नई हुकूमत से उम्मीदें तो होती ही हैं. 1996 में फ़ारूक़ अब्दुल्ला साहेब से उम्मीदें थी तो 2002 में मुफ़्ती साहेब से. फिर 2005 में आज़ाद (गुलाम नबी आज़ाद) से और अब हमसे उम्मीदें जुड़ी हैं. ये कोई नई बात नहीं है कि नई हुकूमत के साथ लोगों की नई उम्मीदें होती हैं.

आपके एक साल के शासन में सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या रही हैं और उनसे क्या सबक सीखने को मिला?

ज़ाहिर सी बात है की रियासत के अंदरूनी सुरक्षा हालत को ठीक रखना मुझे लगता है कि सबसे बड़ी चुनौती थी. बीच में माहौल को बिगाड़ने की भी कुछ लोगों ने कोशिश की, लेकिन आम तौर पर पिछले साल के मुक़ाबले इस साल हालात बेहतर हुए हैं.

एक साल की उपलब्धियाँ क्या रहीं ?

उपलब्धियों में आप देखें तो माहौल में बेहतरी हुई. 2009 में हमने कोशिश की थी कि आंतरिक सुरक्षा पहले के मुक़ाबले बेहतर हो. सुरक्षाबलों के फुटप्रिंट्स भी हम कुछ कम कर पाए. केंद्र की मदद से विकास कार्यों में तेज़ी आई है और उससे भी लोगों को फ़ायदा हुआ है.

विधानसभा चुनाव के पहले आप ये मान कर चल रहे थे कि आपकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य में खुद सरकार बना लेगी. लेकिन अब गठबंधन के कारण क्या कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है?

कठिनाइयाँ तो नहीं कहूँगा लेकिन गठबंधन सरकार की अपनी कुछ मजबूरियाँ होती हैं. लेकिन अगर आप देखें तो पिछली गठबंधन सरकारों के मुक़ाबले इस हुकूमत में तालमेल देखें तो ज़मीन-आसमान का फर्क है. पिछली हुकूमत में मंत्रिमंडल की बैठक शुरू होते ही लड़ाई शुरू हो जाती थी. हमें साथ मिलकर हुक़ूमत करते हुए एक साल हो गया है. 14 बार कैबिनेट की बैठक हुई है और एक बार भी झगड़ा नहीं हुआ. आम सहमति से फैसले किये जा रहे हैं और उन पर अमल भी हो रहा है.

आपकी अपनी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस और गठबंधन को लेकर क्या कभी नेतृत्व का संकट आया है?

जी नहीं. न तो तालमेल को लेकर कोई कमी है और न ही नेतृत्व को लेकर कोई संकट आया है.

सरकार चलाने में क्या आप अपने पिता फ़ारूक़ अब्दुल्ला से सलाह मशवरा करते हैं?

बिल्कुल, वो पिता होने के साथ-साथ मेरी पार्टी के सदर भी हैं. ज़ाहिर सी बात है पार्टी सदर का अपना रोल होता है. जिस तरह कांग्रेस पार्टी की अपनी लीडरशिप से बातचीत होती है उसी तरह हमारा भी सलाह मशवरा होता है.

आपको क्या लगता है कि फ़ारूक़ अब्दुल्ला का सही स्थान राज्य या केंद्र की राजनीति में है?

यह सवाल मेरे लिए नहीं है. इसका सही जवाब तो वो ही दे सकते हैं. वो बड़े अच्छे तरीके से केंद्र में एक मंत्री के रूप में काम कर रहे हैं. एक नया और चुनौतीपूर्ण महकमा उन्हें दिया गया है. आने वाले समय में पर्यावरण को बचाने के लिए उनके महकमे को बहुत काम करना है.

राज्य में इस समय की आंतरिक सुरक्षा स्थिति पर आपकी क्या टिप्पणी है?

सुरक्षा स्थिति की बात करें तो पिछले वर्षों के मुक़ाबले काफी बेहतरी आई है लेकिन अभी किसी तरह की चौकसी कम करने की गुंजाइश नहीं है. हमें होशियार रहना होगा. हालात बिगाड़ने की कोशिशों को नाकामयाब करना होगा. घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं. 2008 के मुकाबले 2009 में घुसपैठ में तेज़ी आई थी, लेकिन आतंकवाद इस समय पिछले 20 साल में सबसे कम है.

हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति में और सुधार आने पर सैनिकों में कुछ और कटौती कि जा सकती है, लेकिन इसके एक ही दिन बाद श्रीनगर में फिदाइन हमला हो गया. आपका क्या कहना है?

जी नहीं. श्रीनगर में फिदाइन हमला नहीं हुआ. मेरी मीडिया से शिकायत है कि वह गलत जानकारी न दे. ये आत्मघाती हमला नहीं था. हमने पहले से हासिल सूचना के आधार पर नाका लगाया था और पहले ही नाके पर ये दोनों चरमपंथी फंस गए और ऑपरेशन में मारे गए. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने बिल्कुल सही कहा है कि राज्य में हालात में बेहतरी आई तो सेना में कमी होगी.

अलगाववादियों के साथ गुपचुप वार्ता का सिलसिला शुरू हुआ है, आप इसका क्या भविष्य देखते हैं?

यह सवाल गृह मंत्री के लिए है. हमारा काम है वार्ता के लिए माहौल बनाना, जो हम कर रहे हैं. हमारा लक्ष्य है कि बातचीत में कोई रुकावट रियासत के हालात की वजह से न आए. हम कोशिश करते रहेंगे कि यह बातचीत चलती रहे और इसका कोई नतीजा निकल जाए.

क्या आप इन अलगाववादी नेताओं से खुद भी बात करना चाहेंगे?

मुझे इसमें कोई ऐतराज़ नहीं है. सामाजिक तौर पर मेरी मुलाक़ातें तो होती रहती हैं, लेकिन राजनीतिक बातचीत ज़रूरी है. लेकिन अलगाववादियों के मसले केंद्र से जुड़े हैं, राज्य से नहीं. बेहतर है वो केंद्र सरकार से बात करें.

दूसरे राजनीतिक दलों के साथ आपके कैसे संबंध हैं. ख़ासकर महबूबा मुफ्ती के साथ?

सबके साथ संबंध अच्छे हैं. महबूबा मुफ़्ती से भी रिश्ते बुरे नहीं हैं, उठना-बैठना, दुआ-सलाम रहती है. राजनीतिक तौर पर मैं उनका विरोध करता हूँ लेकिन निजी तौर पर कोई दुश्मनी नहीं है. उनके क्या इरादे हैं उस पर मैं कुछ कह नहीं सकता.

पाकिस्तान के साथ समग्र बातचीत रुकी हुई है, इसका प्रभाव भारत-पाकिस्तान संबंधों पर और ख़ासकर जम्मू-कश्मीर की समस्या के हल पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?

प्रभाव तो पड़ रहा है. ज़ाहिर सी बात है की अगर हम वार्ता नहीं करेंगे तो मसले का हल खोजने में नाकामयाब रहेंगे. हमने बार-बार कहा है कि बातचीत हो और एक साज़गार माहौल बने. लेकिन हमें इस चीज़ को भी नहीं भुलाना चाहिए कि मुंबई में 26/11 की जो घटना घटी उसके बाद माहौल इतना बिगड़ गया कि उसको साज़गार बनाने में पाकिस्तान को काफी कुछ करना होगा. भारत सरकार और यहाँ के लोगों की चिंताओं को समझकर चलना होगा.

आपके राजनीतिक लक्ष्य क्या हैं?

मेरा लक्ष्य है लोगों की सेवा करना, अपने रियासत और लोगों की सेवा करना. उनके लिए एक बेहतर कल हासिल करना.

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